तीन साल में गिरी हुई छत के सरिये भी नहीं हटा पाए जिम्मेदार, अभिभावकों को सता रही चिंता
काछी कानाखेड़ा स्कूल की 3 साल पहले गिर गई थी छत, फिर भी उसी भवन में पढ़ने को मजबूर हैं बच्चे
रिपोर्टर : शिवकुमार साहू
सलामतपुर । सरकार द्वारा शिक्षा के स्तर में सुधार के लिए करोड़ों रुपए खर्च कर तमाम तरह के प्रयास किए जा रहे हैं। इसके बावजूद अब भी बच्चे टूटे-फूटे बरसों पुराने जर्जर भवन में डर के साए में पढ़ाई करने को मजबूर हैं। ऐसा ही एक मामला जिले के विश्व प्रसिद्ध नगरी सांची नगर परिषद के वार्ड काछी कानाखेड़ा स्थित शासकीय प्राथमिक शाला भवन का सामने आया है। यहां स्कूल भवन के एक हिस्से की छत 3 साल पहले भरभरा कर गिर गई थी।
यह तो गनीमत थी कि यह हादसा रात के समय हुआ था नहीं तो बड़ी घटना भी हो सकती थी। 3 साल बीतने के बाद भी शासन -प्रशासन का इस ओर कोई ध्यान नहीं गया है। अब भी इसी भवन में बच्चे पढ़ाई करने को मजबूर हैं, जबकि गिरी हुई छत के लोहे के सरिए नीचे लटक रहे हैं। ऐसे में छोटे बच्चे घायल भी हो सकते हैं। ग्रामीणों ने बताया कि कई चार गांव वालों ने भी शासन-प्रशासन से इस मामले की शिकायत की है लेकिन अभि तक कोई निराकरण नहीं हुआ है। वहीं स्कूल के शिक्षकों द्वारा भी विभाग की इस स्थिति से अवगत करा दिया गया है। मगर जिम्मेदारों द्वारा इस ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
क्षतिग्रस्त भवन के पास ही लगती है आंगनबाड़ी
काछी कानाखेड़ा प्राथमिक शाला के पास ही आंगनबाड़ी भी लगती है। जिसमें गांव के छोटे छोटे बच्चे भी आते हैं। टूटी हुई छत से लोहे के सरिये इतने नीचे लटके हुए हैं कि अगर बच्चे सावधानी नहीं वर्ते तो गंभीर रूप से घायल भी हो सकते हैं। शासन-प्रशासन को चाहिए कि कम से कम इन लोहे के सरियों को ही कटवा दिया जाए ताकि कोई अनहोनी न हो सके। लेकिन प्रशासन के आला अधिकारी अपने गैर जिम्मेदाराना रवैये के चलते 3 वर्ष बीत जाने के बाद भी गिरी हुई छत के बाहर निकले हुए सरिये भी नही करवा पाई है। अब सवाल यह उठता है कि जब स्कूल के एक हिस्से की छत गिर गई है तो बाकी के हिस्से में स्कूल की कक्षाएं क्यों लगाई जा रही हैं। ऐसे में बच्चे डर के में पढ़ाई करने को मजबूर हैं। कोई बड़ी दुर्घटना कभी भी हो सकती है।
दूसरी और ग्रामीणों को भी अपने बच्चों को स्कूल भेजने में डर लगता है। ग्रामीणों का कहना है कि जब स्कूल के एक हिस्से को छत गिर गई तो बाकी हिस्से की भी कोई गारंटी नहीं कि छत कब गिर जाए।
दोषियों पर होना चाहिए कार्रवाई
काछी कानाखेड़ा प्राथमिक शाला भवन लगभग 30 वर्ष पहले बनाया गया होगा। स्कूल की छत का हिस्सा गिरने के बाद भी अन्य हिस्से में कक्षाएं लगाना बच्चों की जान के साथ खिलवाड़ करना है। जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होना चाहिए।
हादसा हुआ तो कौन होगा जिम्मेदार
3 साल पहले स्कूल भवन के एक हिस्से की छत गिर चुकी है जिसकी शिकायत आता अधिकारियों से लेकर मंत्री जी से तक कर चुके हैं। कई बार स्कूल के शिक्षक भी जिला शिक्षा अधिकारी को इस मामले से अवगत करा चुके हैं लेकिन कोई भी सुनवाई नहीं हो रही है। जबकि इसी क्षतिग्रस्त भवन में स्कूल की कक्षाएं निरंतर लग रही है। कहीं किसी दिन कोई बड़ा हादसा ना हो जाए। रिंकू कुशवाह, स्थानीय ग्रामीण काछी कानाखेड़ा
ग्रामीणों ने शासन-प्रशासन से शिकायत की लेकिन निराकरण नहीं हुआ
डेढ़ साल पहले अम्बाड़ी गांव में स्कूल की दीवार गिरने से हो चुकी है बच्ची की मौत
क्षतिग्रस्त छत के सरिये इस तरह से नीचे लटके हुए हैं।
बच्चों को भेजने में लग रहा डर
हमारे बच्चों को स्कूल भेजने में डर लगता है कि कहीं फिर से स्कूल की छत ना गिर जाए। 3 वर्ष पहले भी छत गिरते समय बढ़ा हादसा हो सकता था। वो तो गनीमत रही थी कि छत रात के समय गिरी थी। अगर यही हादसा दिन के समय होता तो कई बच्चों की जान भी जा सकती थी। जानकारी होने के बाद भी जिम्मेदार अधिकारी इस ओर ध्यान नहीं दे रहे हैं। लक्ष्मी पाल, काछी कानाखेड़ा।
काछी कानाखेड़ा प्राथमिक शाला में बच्चे अपनी जान जोखिम में डालकर पढ़ रहे हैं। लेकिन शिक्षा विभाग ने डेढ़ वर्ष पूर्व ही हुए ग्राम अम्बाड़ी के हादसे से सबक नहीं लिया है। जिसमें 21 अप्रैल 2022 को शासकीय प्राथमिक शाला अम्बाड़ी स्कूल की बाउंड्री वाल गिरने से एक बच्ची की दर्दनाक मौत हो गई थी। घटना के बाद पूरा के पूरा जिला प्रशासन मौके पर पहुंच गया था। 2 शिक्षकों को सस्पेंड भी किया गया था। कहीं हमेशा की तरह छोटे कर्मचारियों को हो बलि का बकरा बनाया गया था। शिक्षकों का कहना है कि उन्होंने कई बार वरिष्ठ अधिकारियों को भवन की जर्जर हालत के बारे में लिखित में दिया है। अभी तक कोई भी जवाब नहीं आया है। जिस शिक्षा के मंदिर में छात्र अपनी नींव गढ़ ही जर्जर स्थिति में है। ऐसे में छात्रों पर कभी भी अनहोनी घटना होने से इंकार नहीं किया जा सकता है। यह बात हम नहीं बल्कि जर्जर भवन की दीवार सिलिंग खुद बयां करती नजर आ रही है। इसका एक नमूना काछी कनाखेड़ा की प्राथमिक शाला है। जहां जिम्मेदारों द्वारा इस ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा है और किसी बड़ी अनदेखी के इंतजार में बैठे हैं।




