मध्य प्रदेश

कलेक्टर बदले, उधार बाकी!

हरीश मिश्र ‘वृक्ष मित्र’ लेखक ( स्वतंत्र पत्रकार )
कलेक्टर बदलना प्रशासनिक प्रक्रिया है, लेकिन क्या कुर्सी बदलने से जनता के प्रति जवाबदेही भी बदल जाती है ? सोमवार को टीएल बैठक पहले भी होती थी, अब भी होगी। मंगलवार को जनसुनवाई पहले भी होती थी, आगे भी होगी। कैलेंडर के पन्ने पलटेंगे, अधिकारी बदलेंगे, लेकिन उन चेहरों का क्या होगा, जो हर मंगलवार अपनी समस्याओं की गठरी उठाए कलेक्ट्रेट पहुँचते हैं ?
पूर्व कलेक्टर अरुण विश्वकर्मा सहज और सरल स्वभाव के अधिकारी रहे। चेहरे पर मुस्कान और फरियादियों की बात सुनने का धैर्य उनकी पहचान रही। कोई पीड़ित अपनी समस्या लेकर आता, तो वे उसे धैर्यपूर्वक सुनते। फिर कंधे पर हाथ रखकर कहते “चिंता मत करो दादा, आपकी समस्या का समाधान हो जाएगा।”
इन शब्दों में उस पीड़ित को सिर्फ आश्वासन नहीं, उम्मीद दिखाई देती। उसे लगता कि उसकी पीड़ा समझने वाला कोई तो है। वह दुआएँ देता हुआ लौट जाता।
लेकिन प्रशासन में संवेदना और समाधान के बीच एक फाइल चलती है। किसी की बात ध्यान से सुन लेना मानवीय गुण है, मगर उसकी समस्या का निराकरण करना प्रशासनिक दायित्व। पहला भरोसा जगाता है, दूसरा भरोसे को कायम रखता है।
यहीं से जनसुनवाई की असली कहानी शुरू होती है। मंगलवार बीतता, सप्ताह गुजरता और फिर अगला मंगलवार आ जाता। वही दादा काँपते पैरों से कलेक्ट्रेट की सीढ़ियाँ चढ़ता। साहब उसे देखकर मुस्कराते “अरे दादा! फिर आ गए ?”
दादा के मन में फिर उम्मीद जागती…साहब मेरा दर्द जानते हैं, अब तो काम हो ही जाएगा।
फिर वही भरोसा मिलता “परेशान मत हो, मैं हूँ ना! तुम्हारा दर्द मुझ पर उधार है। समस्या का समाधान हो जाएगा।”
दादा लौट जाता। उसे विश्वास हो जाता कि साहब ने उसकी पीड़ा को अपना समझ लिया है। लेकिन उसका दर्द कभी जाँच में अटकता, कभी प्रतिवेदन में। समस्या जस की तस रहती, लेकिन हर मंगलवार साहब का आश्वासन जरूर मिलता।
परसों खबर आई कि कलेक्टर अरुण विश्वकर्मा का स्थानांतरण हो गया। अब जबलपुर में नर्मदा की लहरों के बीच नया अरुणोदय होगा। रायसेन में नए कलेक्टर रोहित सिसोनिया ने पदभार संभाल लिया है। स्वागत, परिचय और औपचारिकताओं के बाद प्रशासन अपनी नियमित गति से आगे बढ़ेगा।
लेकिन एक सवाल नए कलेक्टर के सामने भी है…पिछली जनसुनवाइयों में मिले आश्वासनों का हिसाब अब कौन लेगा ? जिन समस्याओं के समाधान का भरोसा दिया गया, उनमें कितनी हल हुईं? कितनी जिंदगियाँ फाइलों में उलझी हैं और कितने फरियादी आज भी उसी मंगलवार की प्रतीक्षा कर रहे हैं?
पुराने कलेक्टर का तबादला हो गया, लेकिन उनके कार्यकाल में सामने आई जनसमस्याएँ जस की तस हैं। प्रशासन किसी एक अधिकारी का नाम नहीं, एक सतत व्यवस्था है। इसलिए जरूरी है कि नई जिम्मेदारी सँभालने वाला अधिकारी केवल नई शिकायतें न सुने, बल्कि लंबित शिकायतों की समीक्षा भी करे।
यह नए कलेक्टर के लिए चुनौती से अधिक एक अवसर है। यदि वे लंबित प्रकरणों का समयबद्ध निराकरण सुनिश्चित करें, तो जनसुनवाई, जो महज साप्ताहिक रस्म बनकर रह गई है, जवाबदेह प्रशासन का माध्यम बन सकती है।
आखिर जनता कलेक्टर के चेहरे से नहीं, अपने काम के परिणाम से प्रशासन को पहचानती है। अधिकारी की मुस्कान से संबल जरूर मिलता है, लेकिन जिंदगी तब बदलती है, जब वर्षों से अटका काम पूरा होता है, अन्याय का निराकरण होता है और फरियादी को बार-बार दफ्तरों के चक्कर नहीं लगाने पड़ते।
जनसुनवाई का अर्थ केवल जनता को सुनना नहीं, उसकी समस्या को समाधान तक पहुँचाना है।
कुर्सी पर बैठने वाले अधिकारी बदल सकते हैं, लेकिन जनता के प्रति प्रशासन का दायित्व नहीं बदलता। दादा को हर मंगलवार नया आश्वासन नहीं चाहिए। उसे अपनी समस्या का समाधान चाहिए, अपने दर्द से मुक्ति चाहिए।
क्योंकि तबादले से अधिकारी की जगह बदलती है, जनता की समस्या की जिम्मेदारी नहीं!
हर पीड़ित की अपनी समस्या है, हर दुःखी की अपनी पीड़ा। किसी को न्याय की उम्मीद है, किसी को वर्षों से अटके काम के पूरा होने का भरोसा। इस मंगलवार भी वे उम्मीद भरी निगाहों से उसी कुर्सी को देखेंगे। कुर्सी वही होगी, लेकिन जनहित की समस्याएँ सुनने वाले अधिकारी रोहित सिसोनिया होंगे।
अब उनके सामने अवसर है कि वे पुराने आश्वासनों को परिणाम में बदलें और जनसुनवाई को जनता के विश्वास का माध्यम बनाएँ। जनता को नए सपने दिखाने से अधिक जरूरी है कि उसके पुराने सपने और संकल्प पूरे हों।
कुर्सी नई उम्मीद लेकर आई है। अब इंतजार सुनवाई का है।

Related Articles

Back to top button