सांसद खेल प्रतियोगिता–2, मैदान में लोकतंत्र…

दिव्य चिंतन : हरीश मिश्र, लेखक ( स्वतंत्र पत्रकार )
कल सांसद खेल प्रतियोगिता– 2 का शुभारंभ विदिशा में पार्षदों के बीच गाली-गलौज, झूमा-झटकी के साथ हुआ।
मैं हमेशा विदिशा के विकास और वहां के जनप्रतिनिधियों का प्रशंसक रहा हूं, लेकिन कल का दृश्य निराश करने वाला था। लोकतंत्र में निंदनीय है।
इसके ठीक उलट रायसेन है। यहां नगर पालिका के पार्षद, पार्षद पति, मुख्य नगर पालिका अधिकारी और कर्मचारी—सब मिलकर विकास से खेलते हैं, खेल बिगाड़ते नहीं।
यहां मतभेद हैं, मनभेद नहीं, झगड़े फाइल में ही सुलझ जाते हैं।
हमारे यहां तालमेल का स्तर यह है कि मुख्य नगर पालिका अधिकारी का स्थानांतरण हो चुका है, लेकिन उनका स्वच्छता अभियान अब भी जारी है।
हमारे लोकप्रिय विधायक प्रतिनिधि भी सद्भावना से खेलते हैं, सबको बारी-बारी से खेलने का मौका देते हैं।
आशा की किरण किसी एक के आंगन में नहीं, हर पार्षद के आंगन में पहुंचती है।
एक साल पहले उपाध्यक्ष पति ने बगावत का दीप जलाया था, वह भी श्रीराम की कृपा से परिसर में टिमटिमा रहा है।
यहां व्यवस्था अच्छी है—
जो ज़्यादा गदर करता है, उसे डल्लू के लड्डू ज़्यादा खाने को मिलते हैं।
पार्षद पतियों को दो-दो लड्डू पैकेट मिलते हैं क्योंकि वे घर और नगर—दोनों संभालते हैं।
यहां कलदार के विवाद भी श्रीराम की कृपा से समाप्त हो जाते हैं। सबका साथ सबका विकास हो रहा है।
खाटू श्याम के दरबार में मत्था टेक कर आए पार्षद इतने प्रसन्न हैं कि विकास की गति भले ही धीमी हो, मुस्कान खिली हुई है।
और हां—
हमारे यहां पार्षद तमाशा नहीं करते,
वे विकास पर चर्चा करते हैं। हमें गर्व है कि हमारे पार्षद विदिशा के पार्षदों से अच्छे हैं।



