संसार और सन्यास जीवन की दो महत्वपूर्ण घटनाएं
रिपोर्टर : फ़ारूक़ मंसूरी
बम्होरी। संसार और सन्यास जीवन की दो महत्वपूर्ण घटनाएं हुआ करती है,जिनके जीवन में विरक्ती का भाव आ जाता है,वह फिर संसार शरीर और भोगों की ओर न देखकर अन्तर्मुखी हो जाया करता है। उपरोक्त उदगार निर्यापक मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने बम्होरी में चल रहे पंचकल्याणक महा महोत्सव के पांचवे दिवस दीक्षा कल्याणक के अवसर पर व्यक्त किये।
उन्होंने कहा दीक्षा एक घटना है, जो अन्तर्मुखी व्यक्ति के जीवन में ही घटती है,महाराजा आदि कुमार का दरबार लगा हुआ है,उनके समक्ष स्वर्ग की सुंदर अप्सरा नीलांजना का नृत्य चल रहा है कि अचानक बेहोश होकर गिर पड़ती है और मृत्यू को प्राप्त हो जाती है हालांकि देव तत्क्षण हू बहू नीलांजना को वंहा खड़ा कर देते है, लेकिन नीलांजना का मरण देखकर आदि कुमार को अपने आत्मनिरंजन की सुध आ जाती है,और वह दीक्षा लेकर वन की ओर प्रस्थान कर देते है। मुनि श्री ने कहा कि जंहा विरक्ती की भावना प्रवल होती है, वहा राग पराजित हो जाता है, आदिकुमार हम सभी जागकर पुरुषार्थ में लगें बिषय भोगों को यदि हम स्वेच्छा से छोड़ दें तो बहूत अच्छा है, चिता जले उसके पूर्व हमारी चेतना का दीप प्रज्वलित हो जाऐ तो बहूत अच्छा है,अन्यथा मरने के बाद तो सब कुछ छूटने बाला ही है। उन्होंने कहा कि सर्वश्रेष्ठ तो यही है कि जीवन में संयम लें दीक्षा लें और पिच्छिका धारण कर अपने जीवन को सार्थक करें। लेकिन यदि यह संभव नहीं हो पा रहा है, तो सदाचरण कर पिच्छीधारिओं की अनुमोदना कर आधापापी के इस जीवन से मुक्त होंना चाहिये। जीवन में वैभव को नहीं वैराग्य को महत्व दैना चाहिये।
प्रातः कालीन वेला में भगवान का अभिषेक एवं शांतिधारा संपन्न हुई। मंच पर मुनि श्री महासागर जी, मुनि श्री निषकंप सागर जी ऐलक श्री निश्चयसागर जी महाराज विराजमान थे। इस अवसर पर प्रतिष्ठाचार्य विनय भैयाजी के निर्देशन में राग और बैराग्य के दृश्यों को दर्शाया गया। राजा नाभिराय और माता मरुदेवी सहित सभी प्रजाजन उनको वन जाने से रोकते है, राग के समक्ष वैराग्य की जीत होती है और आदि कुमार दीक्षा लेकर वन की ओर प्रस्थान कर देते है। सोमवार को भगवान को कैवल्यज्ञान होकर समवसरण में विराजमान हो जाऐंगे। समवसरण से ही मुनिसंघ की देशना होगी।



