धार्मिक

छठ व्रत का पारण कब होगा ?

आचार्य श्री गोपी राम (ज्योतिषाचार्य) जिला हिसार हरियाणा मो. 9812224501
🔮 छठ व्रत का पारण कब होगा?
🌷 छठ पूजा का महापर्व चतुर्थी तिथि यानी 28 अक्टूबर को प्रारंभ हो गया है। 30 अक्टूबर 2022 रविवार के दिन मुख्य व्रत रखा जाएगा और अगले दिन सोमवार को इस व्रत का पारण होगा। छठ महापर्व पर षष्ठी तिथि के दिन डूबते सूर्य की पूजा करते हैं और अगले दिन सप्तमी को उगते सूर्य की पूजा करते हैं। पूजा के साथ ही सूर्य को अर्घ्‍य भी अर्पित किया जाता है। आओ जानते हैं आचार्य श्री गोपी राम से दिल्ली टाइम के अनुसार व्रत पारण का समय।
➡️ षष्ठी तिथि प्रारम्भ- 30 अक्टूबर 2022 को सुबह 05:49 से षष्ठी तिथि प्रारंभ।
➡️ षष्ठी तिथि समाप्त- 31 अक्टूबर 2022 को सुबह 03:27 पर षष्ठी तिथि समाप्त।
⚛️ छठ संध्या पूजा मुहूर्त 30 अक्टूबर 2022 रविवार के दिन का : सूर्यास्त समय छठ पूजा के दिन- शाम 05:38.
🔳 छठ उषा पूजा एवं पारण मुहूर्त 31 अक्टूबर 2022 सोमवार के दिन का।
🔳 सूर्योदय समय छठ पारण के दिन- प्रात: 06:32.
🔳 सूर्यास्त समय छठ पारण के दिन- शाम 05:37.
🌞 31 अक्टूबर को सुबह उगते हुए सूर्य की पूजा करने के बाद अर्घ्‍य दिया जाएगा और इसके बाद महिलाएं कच्चा दूध पीकर व्रत का पारण करेंगी यानी व्रत खोलेंगी। थोड़ा सा प्रसाद ग्रहण करके भी व्रत खोला जा सकता है।
🤷🏻‍♀️ कौन है छठ मैया : शास्त्रों में माता षष्ठी देवी को भगवान ब्रह्मा की मानस पुत्री माना गया है। इन्हें ही मां कात्यायनी भी कहा गया है, जिनकी पूजा नवरात्रि में षष्ठी तिथि के दिन होती है। षष्ठी देवी मां को ही पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में स्थानीय भाषा में छठ मैया कहते हैं। छठी माता की पूजा का उल्लेख ब्रह्मवैवर्त पुराण में भी मिलता है। एक अन्य मान्यता के अनुसार, इन्हें सूर्यदेव की बहन भी माना गया है।
👉🏼 क्यों करते हैं छठ माता की पूजा : छठ पूजा का व्रत महिलाएं अपनी संतान की रक्षा और पूरे परिवार की सुख शांति का वर मांगाने के लिए करती हैं। मान्यता अनुसार इस दिन निःसंतानों को संतान प्राप्ति का वरदान देती हैं छठ मैया।
🗣️ क्या है छठ पूजा की पौराणिक कथा : पौराणिक कथा अनुसार मनु स्वायम्भुव के पुत्र राजा प्रियव्रत को कोई संतान नहीं थी। महर्षि कश्यप ने यज्ञ करवाया तब महारानी मालिनी ने एक पुत्र को जन्म दिया परंतु वह शिशु मृत पैदा हुआ। तभी माता षष्ठी प्रकट हुई और उन्होंने अपना परिचय देते हुए मृत शिशु को आशीष देते हुए हाथ लगाया, जिससे वह जीवित हो गया। देवी की इस कृपा से राजा बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने षष्ठी देवी की आराधना की। तभी से पूजा का प्रचलन प्रारंभ हुआ।

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