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ओबीसी एससी एसटी आरक्षण बिन, अधूरी है नारी की वंदना

ब्यूरो चीफ : भगवत सिंह लोधी
दमोह । हाल ही में संसद में नारी शक्ति वंदन अधिनियम के नाम से बिल पारित किया गया है जिसमें इस बिल के पक्ष में 454 और विरोध में मात्र दो वोट ही पढ़े हैं। साथ ही यह बिल राज्यसभा में भी पारित हो गया है। सभी को यह मालूम तो होगा ही कि इस बिल में ऐसा क्या है जो सुर्खियों में बना हुआ है। जो पास होने के बावजूद भी राजनीति में बयान बाजी जारी है। दरअसल यह बिल लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं को 33% आरक्षण का प्रावधान रखा है। यानी कि 543 लोकसभा सीटों में से 181 महिलाओं को लोकसभा की सीटें आरक्षित हो जाएंगी। अब हम बात करते हैं जो ऊपर लिखा ओबीसी, एससी, एसटी के बिना कैसे अधूरी है नारी वंदना, यह हम तर्कों के साथ समझेंगे।देश में लगातार जातिगत जनगणना की मांग और संख्या अनुपात के हिसाब से हिस्सेदारी की मांग बढ़ रही है। तीनों वर्गों के गैर राजनैतिक संगठन इसकी मांग कर रहे हैं। यदि इस बिल में तीनों वर्गों को आरक्षण नहीं होगा तो शायद ही इन वर्गों की महिलाएं संसद तक पहुँच पाएगीं। ओबीसी वर्ग की महिलाएं तो फिर भी 181 में 10, 20 सीटों पर राजनैतिक दल टिकिट दे भी देंगे लेकिन मुझे नहीं लगता कि एससी एसटी वर्ग को यह लाभ मिल पाएगा। इसका उदाहरण हम ग्रामीण क्षेत्रों में जातीय मतभेद, छुआछूत और आर्थिक स्थिति से समझ सकते हैं। आज भी भारत में एससी एसटी वर्ग में आर्थिक स्थिति का सुधार न के बराबर हुआ है,जिससे उस क्षेत्र में महिलाएं लोगों से रेगुलर नहीं मिल सकती हैं। इन वर्गों की स्थिति सुधरी भी है तो उनके यंहा जो पहले से इस वर्ग के पुरुष राजनीति में है या विधायक, मंत्री, सांसद हैं। अब ऐसे में जब पुरुष ही नेता हैं तो वो कैसे चाह सकते हैं कि उनकी जगह उनकी महिलाएं आगे आएं क्योकि सत्य यही है कि आज भी देश में पितृसत्ता हावी है।एक उदाहरण हम पंचायती राज के चुनाव से भी जोड़ सकते हैं, पंचायती राज चुनाव में महिलाओं को 33% आरक्षण पहले से ही है जो देश भर में 15 लाख नेत्री क्षेत्रिय सरकार चला रही हैं। लेकिन जब हम बारीकी से और ग्राउंड रिपोर्ट करेंगे तो वो महिलाएं सिर्फ नाम के लिए बस सरपंच, जनपद सदस्य, जिला पंचायत सदस्य बनी हैं बाकी तो सत्ता को उनके पति ही चला रहे होते हैं। अब हम बात करेंगे एससी, एसटी महिलाओं या पुरुषों की, दरअसल आरक्षण होने के कारण जैसे तैसे पंचायती राज के चुनाव में इन दो वर्गों के लिए चुनाव लड़ने मिल जाता है और जीत जाने के बाद इनकी सत्ता ऊंची जाति के लोग ही चलाते हैं। यह तो सिर्फ हस्ताक्षर करने के लिए बने होते हैं। ऐसी कई खबरें आती हैं स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर कि इस पंचायत के दलित सरपंच को झंडा फहराने नहीं मिला क्योंकि वहां जातिवाद हावी हो जाता है। अब ऐसे में विचार कीजिए कि यदि लोकसभा और विधानसभा में इन तीनों वर्गों की महिलाओं को आरक्षण नहीं दिया गया। तो उनको ऊँची जाति, जातीय बाहुल्यता, छुआछूत और आर्थिक कमजोरी का सामना नहीं करना पड़ेगा क्या ? यदि इन महिलाओं को अलग से आरक्षण मिलता है तो फिर जरूरी है कि लोगों को ना चाहते हुए भी इन को अपना सांसद, विधायक चुनना ही पड़ेगा। हाल ही में मध्यप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती सपा से सांसद डिंपल यादव समेत अन्य पार्टियों ने ओबीसी वर्ग की महिलाओं को आरक्षण देने की मांग की है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र भी लिखा है। अब जिम्मेदारी बनती है कि हर पार्टी के नेता सरकार से यह मांग करें कि इन वर्गों को आरक्षण दिया जाना चाहिए। इस बात को हम एक उदाहरण के साथ समझ सकते हैं। जैसे कि राहुल गांधी ने संसद में मुद्दा उठाया कि 90 सचिव में से सिर्फ 3 सचिव ओबीसी वर्ग से हैं तो फिर कैसे मान लिया जाए कि जब यह बिल लागू किया जाएगा तो इसमें एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग की महिलाओं के साथ न्याय होगा। क्योंकि सच्चाई तो यह भी है कि देश की पूरी आबादी में से अनुमानित 52 % से ज्यादा तो ओबीसी वर्ग ही है। तो क्या ओबीसी वर्ग सिर्फ वोट देने के लिए बना है ? बल्कि सच्चाई तो यह है कि देश का यही वो श्रापित वर्ग है जिनकी महिलाओं ने हजारों साल की गुलामी इस तरह झेली है कि कभी नारियों को पढ़ने नहीं दिया, तो कभी आँचल का कर लिया, तो कभी घूंघट ढकवाया, तो कभी दासी बनाकर रखा, तो कभी देवदासी बनाया तो कभी सती करवाया, तो कभी विधवाओं को अपना जीवनसाथी चुनने नहीं दिया। इसलिए यदि सरकार वाकई नारी वंदना करना चाहती है तो इन वर्गों की महिलाओं के लिए भी जरूरी है कि आरक्षण देना चाहिए। तभी हम हजारों साल के इस श्राप का पश्चाताप कर पाएंगे।

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