तीन देवियो की है ये कहानी, सुह्जनी धाम से है विख्यात- ज्वारे दर्शन करने निकला
भक्तिभाव का जन सैलाब, 600 वर्षो से परिवार कर्ता आ रहा माता की आराधना
ब्यूरो चीफ : मनीष श्रीवास
जबलपुर । जबलपुर के समीप मझौली अन्तर्गत आने वाले ग्राम सुह्जनी की है । 600 वर्षो से सपरिवार करता आ रहा है माता की आराधना ।
ज्वारे विसर्जन के दौरान पण्डा ब्रजलाल रजक से जब हुई माता सुह्जनी स्थापना की आराधना के साथ इस स्थान का क्या है मुख्य महत्व ।
तीन देवियों की कहानी, गाव की जुबानी- हर घर की सेवा व पूजा अर्चना का पालन करते हैं सभी गाव वासी ।
विजयादशमी पर्व के ज्वारे विसर्जन में दर्शन करने निकला भक्तिभाव का जन सैलाब ।
नवरात्री पर्व के 11 ग्यारस एकादशी को सुबह भोर भय की जाती हैं माता की आराधना पूजा के साथ वही विसर्जित की परम्परा।
सुह्जनी स्थापना धाम की है ये कहानी-
सत्य किस्सा, सुहजनी वाली माता का स्थान मध्य प्रदेश के जबलपुर जिला सीमा अन्तर्गत मझौली के समीप सुहजनी ग्राम में विगत कई वर्ष पूर्व से विराजित हो रही है सुहजनी वाली माता की स्थापना कैसे शुरू हुई जानते हैं गाव वालो की जुबानी-
एक समय का चमत्कार है की,,
सुहजनी ग्राम के गरीब झारिया परिवार के एक बुजुर्ग प्रतिदिन सुबह 3 बजे के दौरान महुआ की फसल आने पर प्रतिदिन जंगल जाकर महुआ बीनने का कार्य करते थे। उन्होंने एक दिन देखा की जंगल में एक महुआ के पेड़ पर तीन कन्या झूला झूल रही है । इस भीषण जंगल में तीन कन्या को देख कर उनको बड़ा आश्चर्य हुआ। जैसे ही बुजुर्ग ने उन तीनों कन्याओं से पूछा की बिटिया आप लोग इस जंगल में कहां से आई हो। तब माता रूपी तीनों कन्या ने जवाब दिया कि बुजुर्ग दादा हम लोग यही पास के गांव से हैं हम महुआ बीनने आते हैं और हमे झूला झूलना अच्छा लगता है । अगर आप हम तीनो बहिनों को रोज इसी महुआ के पेड़ में झूला झूलाओगे तो हम आपको रोज एक टोकरी भर के महुआ देंगे । इस बात को सुन कर बुजुर्ग के मन में एक ख्याल आया कि फ्री में एक टोकरी महुआ रोज मिलेगा । तत्काल बुजुर्ग दादा ने कन्याओं को झूला झूलाने के लिए हा कर दी । और इस बात को लेकर कन्याओं ने बुजुर्ग से एक शर्त रखी दी की ये हम तीनो की ये बात आप किसी को मत बताना । रोज आना हमे झूला झूलाना और एक टोकरी महुआ ले जाना । उसी दिन से क्रम रोज चलने लगा । बुजुर्ग दादा रोज जाकर महुआ के पेड़ में तीनों कन्याओं को झूला झूलाता और तीनों कन्या रोज़ एक भरी टोकरी महुआ दादा को देती बिन मेहनत के टोकरी महुआ लेकर दादा गांव आता उसे बेच कर अच्छा पैसा कमाता,किंतु गांव के अन्य लोग दादा से ईर्षा करने लगे, क्योंकि बुजुर्ग दादा एक बड़ी टोकरी महुआ जल्दी जंगल से गांव ले आता और अन्य लोगो को महुआ लाने में काफी दिक्कत होती थी । वही वक्त ज्यादा लगता था । क्योंकि एक एक महुआ बीनना बड़ी मेहनत का काम था, जंगल में जंगली जानवर भी बहुत होते थे, तभी गांव के किसी, व्यक्ति ने गांव के लोगो से बुजुर्ग दादा को किसी दूसरे का महुआ चोरी करने का आरोप लगा दिया, गांव के लोगों ने, बुजुर्ग दादा से, महुआ चोरी करने की सत्यता जांनि चाही, बुजुर्ग दादा ने तीना कन्या की बात गांव वालो को बता दी । उन्होँने बताया कि तीन कन्या किसी गांव से महुआ बीनने आती हैं, में उनको झूला झूलाता हूँ और वो कन्या मुझे टोकरी भर महुआ देती है। सभी को दादा की बात झूठ लगी। भला 3 बजे रात को इस भीषण जंगल में छोटी कन्या कैसे आएगी। आस पास के गांव में पता किया गया। जानकारी मिली की अन्य किसी गांव की तीन बालिका 3, बजे रात में जंगल जाकर महुआ नही बीनती, बुजुर्ग दादा को गांव वालों ने दवाब दिया । तब जाकर एक दिन बुजुर्ग दादा ने खुद को सच साबित करने के लिए गांव वालो को उस महुआ के पेड़ के पास ले गया, जहां तीनों कन्याओं को झूला झूलाता था, किंतु उस दिन ना तीनों कन्या आई । और न झूला मिला पर एक टोकरी महुआ पेड़ के पास भरा जरूर मिला। तब गांव वालों को लगा बुजुर्ग दादा सच बोल रहा है पर सभी लोगो ने उन तीनो कन्या को जंगल में खोजा परंतु तीनों कन्या अदृश्य हो गई। गांव वाले घर वापिस लौट आए ।
अब बुजुर्ग दादा प्रतिदिन महुआ के पेड़ के पास जाता उसे एक टोकरी में भरा हुआ महुआ मिलता। किंतु तीन कन्या नही मिलती । दादा के आत्मिक देवी भाव जागृत हो गए वह तीनों कन्याओं के स्वरूप को पुनः दर्शन करने की लालसा लेकर प्रार्थना करने लगा तब माता ने उसे स्वप्न में दर्शन दिया की दादा हम तीन देवी है, महालक्ष्मी महाकाली, महासरस्वती,,
जो विष्णु वराह के क्षेत्र में स्थान चाहते हैं,, इसलिए हमने ये लीला की है। अब तुम और गांव वाले हमारे दर्शन करना चाहते हो तो महुआ के पेड़ के पास से हमारे पैर की मिट्टी लाकर थोप लो थाप लो, जहां पर हम झूला झूलते थे और हर नवरात्रि में गांव वालों से एक-एक मुट्ठी मिट्टी लेकर हम तीनो बहिनों की मूर्ति का निर्माण कर स्थापना करो।
बुजुर्ग दादा ने माता से प्रार्थना की, मुझे या गांव के किसी प्रतिमा बनाना नहीं आती, पुन: माता ने बुजुर्ग दादा को सपना दिया कि दादा आप कलकत्ता जाओ वहां पर एक बंगाली मूर्तिकार आपको मेरी मूर्ति बनाना सिखा देगा तब दादा, कलकत्ता गया,, जैसे ही दादा स्टेशन पर पहुंचा है तभी एक मूर्तिकार उसे लेने आ गया मूर्तिकार ने बोला कि दादा मुझे आज माता ने स्वप्न दिया है कि आप आ रहे हो आपको 15 दिवस के अंदर मूर्ति बनाना सिखा दू तब दादा ने मूर्ति बनानी सीखी दादा, कलकता से गांव, लौटकर आया तो गांव वालों से इक एक मुट्ठी मिट्टी देकर प्रतिमा का निर्माण किया और गांव के माल गुजार के घर पर जिसे बखरी भी कहते हैं मूर्ति स्थापित होने लगी तब से लेकर आज तक सुहजनी वाली माता के तीनो विग्रह की प्रतिमा कई साल पूर्व से एक ही स्वरूप में बन रही है, हर साल की एक सी बनना स्वयं में बड़ा चमत्कार है,, एक खास बात जिस स्थान से ग्यारस के दिन पंडा काली का रूप रख कर आता है। वह वही स्थान है जहां पर महुआ के पेड़ की मिट्टी लाई गई थी जहां पर तीनों माता के झूला झूलती थी तीनो माताओं पैर नीचे की मिट्टी लाकर थोपी गई थी, वही से काली बनकर पंडा सुहजानी बाली माता की मूर्ति के स्थान तक जाता है फिर वही पर काली माता का समापन होता है उक्त स्थान पर हजारों लाखों लोगो की मनो कामना पूर्ण होती हैं,, मैंने अपनी स्वयं के अनुभव में पाया की वैष्णो माता का विग्रह ही नौ दिन के लिए सुहजनी में विराजित होता है मुझे भी उनकी कृपा बहुत बार प्राप्त हुई है, भगवती की कृपा प्रेरणा से मैं माता का कथा आप सभी के समक्ष रख रहा हूं जो श्रद्धा भाव से माता के दर्शन करेगा उसे निश्चय ही लाभ होगा ।




