मध्य प्रदेश

शिक्षक दिवस : रचनात्मकता, मौलिकता ही खो रही, आंकड़ों की दौड़ चल रही

सिलवानी । शिक्षक दिवस शिक्षकों के सम्मान का दिवस है जो उन्हें उनकी शिक्षण अवधि में किए गए रचनात्मक, मौलिक प्रयोगों के लिए दिया जाता है।आज शिक्षक से पूछा जाए कि क्या रचनात्मक किया तो जवाब एक दम से नहीं मिल पाएगा, वह शिक्षक पुरानी यादों में खो कर ही उत्तर खोजेगा जिसे वह भूल गया है, क्योंकि वर्तमान में रचनात्मकता, मौलिकता ही खो रही है, तो अभी कैसे बता पाएगा ? उसका सबसे बड़ा कारण डिजिटिलाइजेशन है ! जो काम एक पारंगत आई टी प्रोफेशनल का होना था उस काम में शिक्षक लगा हुआ है।आंकड़ों की भरमार में ऑनलाइन एंट्रीज करते करते वह अपनी कक्षा में पाठ्यक्रम को कैसे पूरा कर रहा है ? यह एक आश्चर्य का विषय है ? आप कह सकते हैं,यह तो एक शिक्षक कर लेगा बाकी ? तो फिर कितने स्कूल हैं जहां एक से अधिक शिक्षक हैं ?अगर अतिथि शिक्षक हैं तो वह तो इन आंकड़ों को क्यों भरेंगे।शिक्षक ने शिक्षण विधियों, अपने विषयों का अध्ययन किया है न कि वह मास्टर डाटा संग्रह कर्ता के रूप में भर्ती हुआ है न यह उसका सपना रहा था।एक दो जगह, एक दो महीने ही यह काम हो तो भी ठीक मगर पूरी साल हर दिन ऑनलाइन आंकड़े जुटाना, तरह तरह की परीक्षाओं जैसी योजनाओं को लागू करना, एक शिक्षक की मजबूरी हो गया है। हर शिक्षक जब सुबह शाला जाकर घंटी बजाता है, बच्चों को पंक्ति में खड़ा कर प्रार्थना करवाता है, बाद में बच्चों से बात करता है, तब तक वह अपने मस्तिष्क में आज की पाठ्य योजना बना रहा होता है मगर जैसे ही मोबाइल खोलता है,आदेश की पीडीएफ खोलते ही उसे कुछ अतिरिक्त रजिस्टर निकालने होते हैं, जिसके साथ शुरू होती है उसकी दिनचर्या कि जल्द से जल्द कोई न कोई डाटा फीड करे, उसके छात्र इंतजार में कक्षा में बैठे बैठे दरवाजे को ताक रहे होते हैं, क्योंकि सर ने उनसे कल शाम को छुट्टी करते समय उन्हें बोला था कि आज एक प्रयोग करेंगे, घर से कुछ सहायक सामग्री जरूर लाएं, बच्चे वह सामग्री लाए हैं उस सामग्री को बार बार बस्ते से निकालते हैं फिर बस्ते में रख लेते हैं ! इतने से ही खैर नहीं होती एक नया आदेश आता है, साथ में कॉल भी कि फलाने एप पर आपके स्कूल के सामने लाल निशान लगा है, क्योंकि आपने जिले के औसत से कम इंट्री की है, खैर आगे तो अभी कहानी बहुत बाकी है।जिन्हें शालाओं में आकर कठिन बिंदुओं को सरल कर शिक्षक को समझाना था उनको डाकिया बना दिया है, वह अब खुद भूल गए कि किस काम को नियुक्त किए गए हैं। आज से बीस पच्चीस साल पहले जब जन शिक्षक किसी गांव में पहुंचता था तो जो बच्चे उस दिन स्कूल नहीं आए हुए होते थे, उनकी बाइक के पीछे बस्ता लेकर दौड़ कर आ जाते थे कि आज सर आए हैं, क्लास में कुछ नया बताएंगे, आज के जन शिक्षक को बच्चे स्कूल की जाँच करने वाले समझते हैं बच्चे ही क्यों शाला के सभी शिक्षक भी और है भी यही।जबकि यह पद या अन्य अकादमिक पद केवल योजनाओं की मॉनिटरिंग में लगे हुए कर्मचारी ही हैं, यह शिक्षक तो बिल्कुल भी नहीं हैं, क्योंकि इनका पुस्तक, छात्र, विषय अध्ययन, अध्यापन का दूर दूर तक रिश्ता खत्म हो चुका है।शिक्षकों पर पहरे भी हर दिन बहुत बढ़ते जा रहे हैं, उनकी अविशेषताएं बताना खुद के गले में फांसी का फंदा डालना होगा।धन्य है व्हाट्सएप जिस पर जिले से लेकर स्थानीय कार्यालय के ग्रुप्स पर मेसेज को इस तरह से मेनी फॉरवर्ड किया जाता है कि शिक्षक को झक मार कर, डस्टर, चॉक को रखकर, कोई न कोई एप खोलना ही पड़ेगा, भले उसका मन कितना भी कक्षा कक्ष की ओर दौड़ रहा हो।जब शिक्षक का विभाग ही शिक्षक के अंतर्मन को नहीं पढ़ पा रहा तो समाज उसकी पीड़ा क्या समझेगा ? शिक्षक को अवसर ही नहीं मिल पा रहा कि वह अपना सर्वश्रेष्ठ दे पाए, इन सब परिस्थितियों के बाद भी शिक्षक अपने मूल कर्तव्य को निभा रहे हैं, उनको कभी सम्मान देने की दूर की बात उनकी सराहना भी नहीं की जाती, अन्य नवनियुक्त शिक्षक कैसे प्रेरित हो पाएंगे ?(एक शिक्षक की कलम से)

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