शैलकलाविद् स्व पंडित रमाशंकर मिश्र की पुण्यतिथि पर विशेष : भारतीय आर्य, प्राकृतिक पूजक थे

दिव्य चिंतन : हरीश मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार रायसेन
पुत्र को अपने पिता से विरासत में कुछ ना कुछ अवश्य मिलता है। मुझे अपने पिता जी स्वर्गीय पंडित रमाशंकर मिश्र शैलकलाविद्, पुरातत्वविद से विरासत में उनके द्वारा आर्य सभ्यता के शोध पत्र, समाचार पत्रों में प्रकाशित उनके लेखों की कतरन और कलम मिली। आज उनकी पुण्यतिथि पर उनके शोध कार्यों का पुण्य स्मरण कर आर्यों की विरासत पर गौरवान्वित महसूस कर रहा हूं।
उन्होंने आर्यों, मनुजात पूर्वजों के विषय में प्रागैतिहासिक साक्ष्य सूत्र एकत्रित कर यह मत स्थापित किया था कि मनु से लेकर आदि मानव सभ्यता का उदयकाल मध्य मेखला ( सतपुड़ा, विंध्याचल और अरावली ) क्षेत्र में हुआ था।
उन्होंने ” भारत इटली: पाषाण कालीन संदर्भ” ग्रंथ में यह साक्ष्य
सूत्र रायसेन क्षेत्र में पाषाण पर उकेरी गई शैल कला के शोध, अंवेषण के द्वारा स्थापित किया था। उन्हें शैल शिल्प कला पर शोध करने की प्रेरणा भारत के राष्ट्रपति महामहिम स्व डॉ. शंकर दयाल शर्मा से प्राप्त हुई थी। डॉ. शर्मा ने मेरे पूज्य पिता जी से कहा था ” आपके द्वारा खोजे गए शैल चित्रों से स्पष्ट होता है कि वैदिक आर्य संस्कृति का उद् विकास प्रागैतिहास काल में हो चुका था।”
उन्हें शोध के दौरान रायसेन जिले के ग्राम पनगमा में शिलाखंडों पर चक्रव्यूह की तीन आकृतियां मिलीं थीं। जिनकी रचना महाभारत काल से पूर्व तब की गई थी जब पाण्डव अज्ञात वास में विचरे थे। इटली के पुराविद् डॉ फोसाटी के शैलकला शोध ग्रंथ का अध्ययन कर यह मत स्थापित किया कि इटली की बाल्कामोनिका घाटी के शिलाखंड पर चक्रव्यूह तथा जो अन्य आर्य प्रतीक चिन्ह मिलते हैं,वे महाभारत काल के बाद के हैं।
रायसेन क्षेत्र की शिलाखंडों पर उकेरे गये आर्य प्रतीक चिन्ह, चित्रों में बिन्दु, थाप, पदचिन्ह, धनुषबाण, ओंकार, सूर्य, सविता, परिधि, चक्र, चक्रव्यूह, घुड़सवारी, स्वास्तिक, फूल, पादप, मोर, प्रभामंडल एवं लिपि के चिन्ह मिलते हैं। उन्होंने शोध उपरांत सिद्ध किया कि 50 हजार ई. पू. यूरोप हिमाच्छादित था । यूरोप पहुंचे आर्य, प्रतीकों और चिन्हों को अपनी स्मृतियों में ले गए थे, जिन्हें उनके द्वारा बाल्कामोनिका घाटी के शिलाखंडों पर उकेरा गया। उनके अनुसार महाभारत युद्ध कि विभीषिका उपरांत आर्य पलायन कर संभवतः इटली पहुंचे थे।
रायसेन क्षेत्र में 8395 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में शैलकला के चित्र मिलते है। विंध्याचल पर्वत की श्रेणी में शिलाखंडों पर मानव निर्मित शैल चित्र कला के रेखांकन मिलते हैं। भारतीय आर्य, प्राकृतिक पूजक थे। सूर्य, चंद्रमा, वायु , अग्नि आदि शक्तियों की पूजा और यज्ञ उनके द्वारा किए जाते थे।
पुरा धरोहर के लोक व्यापीकरण के उद्देश्य 1993 में तात्कालीन कलेक्टर अनिल कुमार जैन, एसडीएम आशुतोष अवस्थी,जिला पुरातत्व संघ के सचिव स्वर्गीय रमाशंकर मिश्र, सदस्य राजीव चौबे, अनंत गंगोला, पुरातत्व अधिकारी डॉक्टर दिनेश माथुर, नायब तहसीलदार रामाकांत तिवारी, आर के श्रोत्रीय, तहसीलदार एस के उपाध्याय, डिप्टी कलेक्टर नागेंद्र मिश्र, जनसंपर्क अधिकारी अशोक मनवानी, जिला कोषालय अधिकारी ओ पी गुप्ता के संयुक्त प्रयासों से रायसेन में संग्रहालय तो स्थापित हुआ था । लेकिन शैलकला संरक्षण और
लोकव्यापी करण का कार्य बंद हो गया।
इस दिशा में तात्कालीन कलेक्टर लोकेश जाटव ने प्रयत्न प्रारंभ किए । लेकिन शासकीय प्रक्रिया के तहत स्थानांतरण होने के कारण धरोहर संरक्षण के सपने बिखर गए। वास्तविक रूप से पिताजी द्वारा पुरातत्व क्षेत्र में किया गया, शोध कार्य आज भी अधूरा है। यहां के शिलाखंडों पर उकेरी गई रचनाओं को इंतज़ार है कि कोई इतिहासकार, शैलकलाविद्, पुराविद् आए और आर्य विरासत की उपेक्षित अहिल्या का उद्धार करे।

राष्ट्रपति महामहिम स्व डॉ शंकरदयाल शर्मा जी के साथ परमपूज्य स्व पंडित रमाशंकर मिश्र।



