
आचार्य श्री गोपी राम (ज्योतिषाचार्य) जिला हिसार हरियाणा मो. 9812224501
✦••• जय श्री हरि •••✦
🧾 आज का पंचांग 🧾
रविवार 25 जनवरी 2026
25 जनवरी 2026 दिन रविवार को माघ मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि है। आज अंचला सप्तमी का भी व्रत है। इस सप्तमी को विधान सप्तमी या आरोग्य सप्तमी भी कहा जाता है। आज जैन लोगों का मर्यादा महोत्सव नामक व्रत भी है। आज भगवान सूर्य देवता की पूजा अर्चना करने से सूर्य ग्रहण काल में किए गए जप के समान सिद्धि मिल जाती है। सूर्य देवता धन और प्रतिष्ठा के कारक ग्रह माने जाते हैं, इसलिए जीवन में धन एवं प्रतिष्ठा की वृद्धि होती है। आज रविवार भी है, अतः यह संयोग और भी प्रभावी हो जाता है। आज सूर्य उदय से पहले स्नान कर लेना चाहिए इससे संपूर्ण माघ मास स्नान का पुण्य मिल जाता है। आज रवि योग एवं यायीजययोग भी है। आप सभी सनातनियों बंधुओं को “रथ सप्तमी अथवा अंचला सप्तमी के पावन व्रत” की बहुत-बहुत हार्दिक शुभकामनायें एवं अनन्त- अनन्त बधाइयां।।
भगवान सूर्य जी का मंत्र : ऊँ घृणि सूर्याय नम: ।।
🌠 रविवार को की गई सूर्य पूजा से व्यक्ति को घर-परिवार और समाज में मान-सम्मान की प्राप्ति होती है। रविवार के दिन उगते हुए सूर्य को देव को एक ताबें के लोटे में जल, चावल, लाल फूल और रोली डालकर अर्ध्य करें।
*इस दिन आदित्य ह्रदय स्रोत्र का पाठ करें एवं यथा संभव मीठा भोजन करें। सूर्य को आत्मा का कारक माना गया है, सूर्य देव को जल देने से पितृ कृपा भी मिलती है। *रविवार के दिन भैरव जी के दर्शन, आराधना से समस्त भय और संकट दूर होते है, साहस एवं बल की प्राप्ति होती है। रविवार के दिन जी के दर्शन अवश्य करें ।
रविवार के दिन भैरव जी के मन्त्र ” ॐ काल भैरवाय नमः “ या ” ॐ श्री भैरवाय नमः “ की एक माला जाप करने से समस्त संकट, भय दूर होते है, रोगो, अकाल मृत्यु से बचाव होता है, मनवांछित लाभ मिलता है।
🔮 शुभ हिन्दू नववर्ष 2025 विक्रम संवत : 2082 कालयक्त विक्रम : 1947 नल
🌐 कालयुक्त संवत्सर विक्रम संवत 2082,
✡️ शक संवत 1947 (विश्वावसु संवत्सर), चैत्र
☮️ गुजराती सम्वत : 2081 नल
👸🏻 शिवराज शक 352
☸️ काली सम्वत् 5126
🕉️ संवत्सर (उत्तर) क्रोधी
☣️ आयन – उत्तरायण
🌧️ ऋतु – सौर बसंत ऋतु
⛈️ मास – माघ मास
🌗 पक्ष – शुक्ल पक्ष
📅 तिथि – रविवार माघ माह के शुक्ल पक्ष सप्तमी तिथि 11:10 PM तक उपरांत अष्टमी
✏️ तिथि स्वामी – सप्तमी के देवता हैं चित्रभानु। सप्तमी तिथि को चित्रभानु नाम वाले भगवान सूर्यनारायण का पूजन करने से सभी प्रकार से रक्षा होती है। यह मित्रवत, मित्रा तिथि हैं।
💫 नक्षत्र – नक्षत्र रेवती 01:35 PM तक उपरांत अश्विनी
🪐 नक्षत्र स्वामी – रेवती नक्षत्र का स्वामी ग्रह बुध है, और इस नक्षत्र के देवता पूषा हैं।
⚜️ योग – सिद्ध योग 11:45 AM तक, उसके बाद साध्य योग
⚡ प्रथम करण : गर 11:58 AM तक
✨ द्वितीय करण : वणिज 11:10 PM तक, बाद विष्टि
🔥 गुलिक काल : रविवार को शुभ गुलिक काल 02:53 पी एम से 04:17 पी एम
🤖 राहुकाल (अशुभ) – सायं 4:51 बजे से 6:17 बजे तक। राहु काल में शुभ कार्य करना वर्जित माना गया है।
⚜️ दिशाशूल – रविवार को पश्चिम दिशा की यात्रा नहीं करनी चाहिये, यदि अत्यावश्यक हो तो पान एवं घी खाकर यात्रा कर सकते है।
🌞 सूर्योदयः – प्रातः 06:55:00
🌅 सूर्यास्तः – सायं 05:36:00
👸🏻 ब्रह्म मुहूर्त – 05:26 ए एम से 06:19 ए एम
🌟 अभिजित मुहूर्त – 12:12 पी एम से 12:55 पी एम
✡️ विजय मुहूर्त – 02:21 पी एम से 03:03 पी एम
🐃 गोधूलि मुहूर्त – 05:52 पी एम से 06:19 पी एम
💧 अमृत काल – 11:15 ए एम से 12:49 पी एम
🗣️ निशिता मुहूर्त –12:07 ए एम से 01:00 ए एम, 26 जनवरी
❄️ रवि योग – 07:13 ए एम से 01:35 पी एम
⭐ सर्वार्थ सिद्धि योग – 01:35 पी एम से 07:12 ए एम, 26 जनवरी
🚓 यात्रा शकुन-इलायची खाकर यात्रा प्रारम्भ करें।
👉🏼 आज का मंत्र-ॐ घृणि: सूर्याय नम:।
💁🏻♀️ आज का उपाय-विष्णु मंदिर में पिताम्बर चढ़ाएं।
🌳 वनस्पति तंत्र उपाय-बेल के वृक्ष में जल चढ़ाएं।
⚛️ *पर्व एवं त्यौहार – अंचला सप्तमी/ मर्यादा महोत्सव (जैन)/ आरोग्य सप्तमी/ रथ सप्तमी/भानु सप्तमी/ नर्मदा जयन्ती/ ब्रह्म सावर्णि मन्वादि/ भद्रा/ पञ्चक/ गण्ड मूल/ सर्वार्थसिद्धियोग/ रवियोग/ आडल योग/ विडाल योग/ राष्ट्रीय मतदाता दिवस, भारत रत्न से सम्मानित मदर टेरेसा सम्मानित दिवस, (भारतीय मार्क्सवादी विचारक) मानबेन्द्र नाथ राय स्मृति दिवस, राष्ट्रीय फ्लोरिडा दिवस, हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी जन्म दिवस, भारतीय पर्यटन दिवस, जागतिक कृष्टरोग निर्मूलन दिवस, चुनाव आयोग (Election Commission of India) स्थापना दिवस ✍🏼 *तिथि विशेष – सप्तमी तिथि को आँवला त्याज्य बताया गया है। सप्तमी तिथि मित्रप्रद तिथि मानी जाती है। इतना ही नहीं यह सप्तमी तिथि एक शुभ तिथि भी मानी जाती है। इस सप्तमी तिथि के स्वामी भगवान सूर्य देवता हैं। यह सप्तमी तिथि भद्रा नाम से विख्यात मानी जाती है। यह सप्तमी तिथि कृष्ण पक्ष में मध्यम फलदायीनी मानी जाती है। इस सप्तमी तिथि को सुबह सर्वप्रथम स्नान करके भगवान सूर्य को सूर्यार्घ देकर उनका पूजन करना चाहिये। उसके बाद आदित्यह्रदयस्तोत्रम् का पाठ करना चाहिये। इससे जीवन में सुख, समृद्धि, हर्ष, उल्लास एवं पारिवारिक सुखों कि सतत वृद्धि होती है। सप्तमी तिथि में भगवान सूर्य की पुजा करने से सभी मनोकामनाओं की पूर्ति होती है।
🌷 Vastu tips 🌸
हाथ में सूर्य पर्वत और सूर्य रेखा क्या बताती है हथेली में अनामिका यानी रिंग फिंगर के ठीक नीचे स्थित स्थान को सूर्य पर्वत कहा जाता है। यह पर्वत अगर उभरा हुआ और साफ हो, तो इसे शुभ संकेत माना जाता है। सूर्य पर्वत से निकलकर जो रेखा हृदय रेखा की ओर जाती है, वही सूर्य रेखा कहलाती है। इसी रेखा से सरकारी नौकरी और प्रशासनिक सफलता का अंदाजा लगाया जाता है।
*सरकारी नौकरी के मजबूत योग कब बनते हैं अगर किसी व्यक्ति की दोनों हथेलियों में सूर्य रेखा सीधी, गहरी और बिना कटाव के हो तो उसके सरकारी नौकरी पाने के योग प्रबल माने जाते हैं। ऐसी रेखा यह दर्शाती है कि सूर्य ग्रह मजबूत है और व्यक्ति को शासन या सत्ता से सहयोग मिल सकता है। ऐसे लोग अधिकारी, प्रशासनिक पदों या प्रभावशाली जिम्मेदारियों तक पहुंच सकते हैं। ❇️ *जीवनोपयोगी कुंजियां* ⚜️ क्या आपने कभी हरश्रृंगार को ऐसे प्रयोग कर देखा है?
🍃 हर श्रंगार के पत्ते ,
*एक कांच के गिलास में पानी में भिगो दें।
*हरसिंगार का नाम (निकटेंथस अर्बोर ट्राइस्टिस-होम्योपैथिक ) एक आयुर्वेदिक जड़ी बूटी भी वह औषधि है। *इसका पेड़ पारिजात का पेड़ कहलाता है यह वही पेड़ है जिसको श्री कृष्ण भगवान स्वर्ग से लेकर के आए थे।
*यह एक होम्योपैथिक दवाई भी है, *इसके पत्ते बहुत फायदा करते हैं ।
*सुबह उठकर इस पानी को पी ले और फिर इसमें और पानी भर दें । *ताजी हल्दी का एक ,आधा इंच का टुकड़ा भी काटकर इसमें रखें।
*एक बार के पत्ते 1 दिन आसानी से चल जाते हैं ।सर्दियों में दो-तीन दिन भी चल सकते हैं । *ऐसे में पत्ते का रंग बदलने लगता है ।
*यह हड्डियों के लिए रामबाण औषधि है। 💉 आरोग्य संजीवनी 💊
“मौत को छोड कर हर मर्ज की दवाई है कलौंजी” कलयुग में धरती पर संजीवनी है कलौंजी, अनगिनत रोगों को चुटकियों में ठीक करती है।
*पहले जान ले कि ये किन-किन रोगों में सहायक है?
*डायबिटीज: प्रतिदिन 2 ग्राम कलौंजी के सेवन के परिणामस्वरूप तेज हो रहा ग्लूकोज कम होता है। इंसुलिन रैजिस्टैंस घटती है,बीटा सैल की कार्यप्रणाली में वृद्धि होती है तथा ग्लाइकोसिलेटिड हीमोग्लोबिन में कमी आती है। *मिर्गी: 2007 में हुए एक अध्ययन के अनुसार मिर्गी से पीड़ित बच्चों में कलौंजी के सत्व का सेवन दौरे को कम करता है।
*उच्च रक्तचाप: 100 या 200 मि.ग्रा. कलौंजी के सत्व के दिन में दो बार सेवन से हाइपरटैंशन के मरीजों में ब्लड प्रैशर कम होता है। *रक्तचाप (ब्लडप्रेशर) में एक कप गर्म पानी में आधा चम्मच कलौंजी का तेल मिलाकर दिन में 2 बार पीने से रक्तचाप सामान्य बना रहता है। तथा 28 मि.ली. जैतुन का तेल और एक चम्मच कलौंजी का तेल मिलाकर पूर शरीर पर मालिश आधे घंटे तक धूप में रहने से रक्तचाप में लाभ मिलता है। यह क्रिया हर तीसरे दिन एक महीने तक करना चाहिए।
*गंजापन: जली हुई कलौंजी को हेयर ऑइल में मिलाकर नियमित रूप से सिर पर मालिश करने से गंजापन दूर होकर बाल उग आते हैं। 📚 गुरु भक्ति योग 🕯️
तंत्र मार्ग मे नव साधक अक्सर भैरवी को लेकर भ्रमित हो जाते हैं । तंत्र में भैरवी शब्द दो अलग-अलग स्तरों पर प्रयुक्त होता है, और दोनों का क्षेत्र, उद्देश्य और स्वरूप भिन्न है। पहली है महाविद्या भैरवी – दस महाविद्याओं में छठी – जो एक दैवी तत्त्व है। वह शक्ति जो उग्रता, तप, तेज और आन्तरिक शुद्धि के माध्यम से साधक के अहं, जड़ता और मानसिक आलस्य को भस्म करती है। महाविद्या भैरवी की उपासना मंत्र, यंत्र, ध्यान और भाव के स्तर पर होती है। वहाँ भैरवी एक आराध्य है – जिसकी ओर साधक उन्मुख होता है, जिससे वह शक्ति प्राप्त करता है, और जिसके तेज में स्वयं को परिष्कृत करता है।
*इसके विपरीत, वामाचार में जिस भैरवी की चर्चा होती है, वह कोई प्रतीकात्मक देवी-मूर्ति नहीं, बल्कि साक्षात् मानवीय देह में जाग्रत शक्ति-तत्त्व है। यहाँ भैरवी कोई “पूज्य वस्तु” नहीं, बल्कि साधना की सहभागी, साधन और कभी-कभी स्वयं साधना बन जाती है। यह भैरवी-स्त्री कोई जन्मजात श्रेणी नहीं, बल्कि दीक्षा, साधना और आन्तरिक रूपान्तरण से उत्पन्न अवस्था है। महाविद्या भैरवी जहाँ तेज का आदर्श रूप है, वहीं वामाचार की भैरवी उस तेज का जीवित अवतरण है। एक में शक्ति का ध्यान होता है, दूसरे में शक्ति का प्रत्यक्ष संचार।
*इसीलिए दोनों को एक-दूसरे का विकल्प समझना भूल है। महाविद्या भैरवी तंत्र के दैवी शिखर का प्रतिनिधित्व करती है, जबकि वामाचार की भैरवी तंत्र की प्रयोगशाला में उतर चुकी शक्ति है। महाविद्या भैरवी साधक को भीतर से तैयार करती है, तपाती है, दृढ़ बनाती है; और वही परिपक्वता आगे चलकर वामाचार में भैरवी-तत्त्व को धारण करने योग्य बनाती है। इस प्रकार एक मार्ग है और दूसरी अवस्था। एक शक्ति का स्वरूप है और दूसरी शक्ति का प्रवाह। *तांत्रिक दृष्टि में भैरव चेतना है – स्थिर, साक्षी और कालातीत। भैरवी उसकी क्रिया-शक्ति है – गतिशील, उग्र और परिवर्तनकारी। शिव यदि केवल प्रकाश है, तो भैरवी वह विमर्श है जिसमें प्रकाश स्वयं को अनुभव करता है। इसी कारण शास्त्र कहते हैं कि शक्ति के बिना शिव “शव” मात्र है। वामाचार इस सिद्धान्त को दर्शन तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उसे देह और अनुभव के स्तर पर उतार देता है।
*भैरवी का उदय तब होता है जब स्त्री केवल सामाजिक पहचान, नैतिक सीमाओं और मानसिक संकोचों से बाहर निकलकर स्वयं को साधना का माध्यम बना देती है। उसका शरीर यंत्र बन जाता है, उसकी श्वास मंत्र और उसकी चेतना मंडल। यहाँ स्त्री को देवी इसलिए नहीं कहा जाता कि उसकी पूजा की जाए, बल्कि इसलिए कि उसमें शक्ति को धारण करने और प्रवाहित करने की क्षमता जाग्रत हो चुकी होती है। यही कारण है कि परम्पराओं में कहा गया है – पूर्ण भैरवी स्वयं चलती-फिरती साधना है। *वामाचार का मूल साहस यही है कि वह जिन तत्वों को समाज ने वर्जित, भयावह या अपवित्र माना है – काम, मृत्यु, रक्त, श्मशान, नशा – उन्हें ही साधन बना देता है। भैरवी इन सभी ध्रुवों को एक साथ धारण करती है। वह न काम से भागती है, न मृत्यु से, न भय से। वह इन तीनों को जाग्रति के ईंधन की तरह उपयोग करती है। इसीलिए भैरवी को कुंडलिनी की उग्र अवस्था कहा गया है – जो पुराने संस्कारों को तोड़ती है, अहं को जलाती है और साधक को सुरक्षित भ्रमों से बाहर खींच लाती है।
*भैरवी-चक्र इसी दर्शन का चरम प्रयोग है। यहाँ भोग और योग अलग नहीं रहते। यौन-ऊर्जा को नष्ट नहीं किया जाता, बल्कि उसे ऊर्ध्वगामी किया जाता है। देह का चरम अनुभव साधना का द्वार बनता है, न कि पतन का कारण। लेकिन यह मार्ग अत्यन्त अनुशासन, दीक्षा और गुरु-अनुग्रह की माँग करता है। क्योंकि जहाँ शक्ति तीव्र होती है, वहाँ जोखिम भी उतना ही गहरा होता है। अनियंत्रित वासना यहाँ साधना नहीं, विनाश बन सकती है। *भैरवी बनना इसलिए कोई रोमांटिक या रहस्यमयी कल्पना नहीं है। यह एक कठिन व्रत है। यह स्त्री को साधक, साधन और साध्य – तीनों एक साथ बना देता है। उसका शरीर जितना अधिक शक्ति का माध्यम बनता है, उतना ही वह मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक आघातों के लिए भी खुला हो जाती है। इसी कारण प्राचीन परम्पराएँ इस मार्ग को गोपनीय रखती थीं और केवल अत्यन्त परिपक्व साधकों को ही इसकी अनुमति देती थीं।
*दार्शनिक स्तर पर भैरवी-भैरव का सम्बन्ध अद्वैत का जीवित रूप है। यह पुरुष-स्त्री का सम्बन्ध नहीं रह जाता, बल्कि चेतना और ऊर्जा का मिलन बन जाता है। यहाँ प्रश्न और उत्तर अलग नहीं रहते। भैरवी का प्रश्न ही भैरव का उत्तर बन जाता है। यही विज्ञानभैरव का रहस्य है – जहाँ साधना किसी दूर के लक्ष्य की खोज नहीं, बल्कि इसी क्षण में घटित होने वाली पहचान बन जाती है। *अन्ततः वामाचार में भैरवी का लक्ष्य भोग नहीं, बल्कि ब्रह्मानन्द है। भय का लय, काम का रूपान्तरण और मृत्यु-बोध का अतिक्रमण। जब साधक इन तीनों को झेलने की क्षमता प्राप्त कर लेता है, तब भैरवी शक्ति उसे भैरव-चेतना में स्थापित कर देती है। यही पूर्णता है। यही वह अवस्था है जहाँ स्त्री-पुरुष, पवित्र-अपवित्र, जीवन-मृत्यु जैसे सारे द्वन्द्व विलीन हो जाते हैं।
*_भैरवी इसलिए देवी भी है और मानव-शक्ति का तकनीकी पद भी। वह स्मरण कराती है कि मुक्ति कहीं बाहर नहीं है। वही देह, वही श्वास, वही कामना – यदि जाग्रत हो जाए – तो वही शिव का द्वार बन जाती है। यही वामाचार का सबसे गहरा और सबसे कड़वा सत्य है।
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⚜️ सोमवार और शुक्रवार कि सप्तमी विशेष रूप से शुभ फलदायी नहीं मानी जाती बाकी दिनों कि सप्तमी सभी कार्यों के लिये शुभ फलदायी मानी जाती है। सप्तमी को भूलकर भी नीला वस्त्र धारण नहीं करना चाहिये तथा ताम्बे के पात्र में भोजन भी नहीं करना चाहिये। सप्तमी को फलाहार अथवा मीठा भोजन विशेष रूप से नमक के परित्याग करने से भगवान सूर्यदेव कि कृपा सदैव बनी रहती है।


