बीजामृत से बीजोपचार किसानों के लिए वरदान, कम लागत में बेहतर उत्पादन की राह

ब्यूरो चीफ: भगवत सिंह लोधी
पन्ना। कृषि में बढ़ती लागत और रासायनिक बीजोपचार के विकल्प की तलाश के बीच प्राकृतिक खेती का महत्वपूर्ण घटक बीजामृत किसानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। कृषि महाविद्यालय पन्ना के कीटशास्त्र विभाग के डॉ. द्वारका ने बताया कि बीजामृत एक सूक्ष्मजीव युक्त प्राकृतिक घोल है, जो बीजों को रोगों से बचाने, अंकुरण क्षमता बढ़ाने तथा पौधों की प्रारंभिक वृद्धि को मजबूत बनाने में मदद करता है।
उन्होंने बताया कि बीजामृत में मौजूद लाभकारी जीवाणु बीजों की सतह पर सक्रिय होकर फफूंद एवं अन्य रोगजनकों के प्रभाव को कम करते हैं तथा जड़ों के विकास को प्रोत्साहित करते हैं। किसान रूपेन्द्र सिंह ने भी किसानों से इस तकनीक को अपनाने की अपील की है।
100 किलो बीज के लिए ऐसे तैयार करें बीजामृत
डॉ. द्वारका के अनुसार 100 किलोग्राम बीज के उपचार के लिए 5 किलोग्राम देशी गाय का ताजा गोबर, 5 लीटर देशी गाय का गौमूत्र, 50 ग्राम चूना, 1 किलोग्राम मेड़ या बरगद के पेड़ के नीचे की मिट्टी तथा 20 लीटर स्वच्छ पानी की आवश्यकता होती है।
बीजामृत तैयार करने के लिए सबसे पहले 5 किलोग्राम गोबर को सूती कपड़े में बांधकर 20 लीटर पानी में 12 घंटे तक लटकाया जाता है। वहीं 50 ग्राम चूने को 1 लीटर पानी में घोलकर रातभर रखा जाता है। अगले दिन गोबर की पोटली को अच्छी तरह निचोड़कर उसका अर्क निकाल लिया जाता है। इसके बाद मिट्टी, गौमूत्र और चूने का घोल मिलाकर मिश्रण को अच्छी तरह हिलाया जाता है। इस प्रकार तैयार बीजामृत बीजोपचार के लिए तैयार हो जाता है।
बीजोपचार और रोपाई में भी लाभकारी
डॉ. द्वारका ने बताया कि बीजों को बीजामृत में अच्छी तरह लपेटकर छाया में सुखाने के बाद बुवाई करनी चाहिए। दलहनी फसलों के बीजों को केवल कुछ मिनट तक घोल में डुबोना पर्याप्त होता है। वहीं धान, सब्जियों एवं अन्य रोपाई वाली फसलों के पौधों की जड़ों को रोपाई से पहले 15 से 30 मिनट तक बीजामृत में डुबोने से बेहतर परिणाम प्राप्त होते हैं।
अंकुरण बढ़ाने और रोग नियंत्रण में सहायक
विशेषज्ञों के अनुसार बीजामृत में अनेक पौध-विकास प्रोत्साहक जीवाणु एवं जैव सक्रिय तत्व मौजूद होते हैं, जो अंकुरण क्षमता बढ़ाने, जड़ों की वृद्धि तेज करने तथा बीज एवं मृदा जनित रोगों से सुरक्षा प्रदान करने में सहायक हैं। इससे फसल की शुरुआती बढ़वार मजबूत होती है और किसान कम लागत में बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं।
डॉ. द्वारका ने कहा कि “स्वस्थ बीज ही अच्छी फसल की नींव है।” ऐसे में बीजामृत द्वारा बीजोपचार न केवल खेती की लागत कम करता है, बल्कि प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देते हुए मिट्टी की जैविक गुणवत्ता और पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण योगदान देता है। उन्होंने किसानों से बुवाई से पहले इस सरल, सस्ती और प्रभावी तकनीक को अपनाने की अपील की है।



