मध्य प्रदेश

स्टाफ नर्सों के बिना चल रहा सुल्तानगंज अस्पताल, प्रसूता महिलाओं के लिए बना रेफर सेंटर

80 गांवों की एक लाख आबादी प्रभावित, गर्भवती महिलाओं को बेगमगंज, सागर और रायसेन किया जा रहा रेफर; ग्रामीणों ने दी अनिश्चितकालीन धरने की चेतावनी
ब्यूरो चीफ : शब्बीर अहमद
बेगमगंज । शासन द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने के दावे सुल्तानगंज सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की बदहाल व्यवस्था के सामने पूरी तरह खोखले साबित हो रहे हैं। करीब 80 गांवों और एक लाख की आबादी के लिए जीवनरेखा माने जाने वाले इस अस्पताल में पिछले एक माह से एक भी स्टाफ नर्स उपलब्ध नहीं है। नतीजतन प्रसव कराने पहुंचने वाली गर्भवती महिलाओं को बिना उपचार के ही बेगमगंज, सागर और जिला अस्पताल रायसेन रेफर किया जा रहा है। इससे गरीब, मजदूर और किसान परिवारों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
जानकारी के अनुसार अस्पताल में पदस्थ एक स्टाफ नर्स का एक माह पूर्व स्थानांतरण हो गया, जबकि दूसरी स्टाफ नर्स अपने बच्चे की देखभाल के लिए एक वर्ष के अवकाश पर हैं। इसके बाद से अस्पताल में प्रसव सेवाएं पूरी तरह ठप हो गई हैं। प्रतिदिन इलाज के लिए आने वाली गर्भवती एवं धात्री महिलाओं को अस्पताल से ही वापस भेज दिया जाता है।
इस गंभीर समस्या से नाराज ग्रामीण शनिवार दोपहर बड़ी संख्या में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचे और मेडिकल ऑफिसर डॉ. रत्नप्रभा पटेल एवं डॉ. संजय मीणा को ज्ञापन सौंपा। ग्रामीणों ने मांग की कि तत्काल स्टाफ नर्सों की पदस्थापना कराई जाए और इसकी जानकारी वरिष्ठ अधिकारियों को भेजी जाए। साथ ही चेतावनी दी कि यदि शीघ्र व्यवस्था नहीं हुई तो अस्पताल परिसर में अनिश्चितकालीन धरना-प्रदर्शन शुरू किया जाएगा।
ग्रामीण शिवम् राजा यादव,जय गुप्ता का कहना है कि अस्पताल से जुड़े अधिकांश गांवों के लोग आर्थिक रूप से कमजोर हैं। निजी अस्पतालों में इलाज कराना उनके लिए संभव नहीं है। ऐसे में हर मरीज को रेफर करना शासन की स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
पिपलिया बिचौली निवासी गर्भवती महिला नेहा अहिरवार और गोरखी निवासी रेखा ने बताया हम गरीब परिवारों से हैं,अस्पताल जांच और इलाज करवाने आते हैं।पर नर्स नहीं मिलती तो बाहर जाकर इलाज निजी अस्पतालों में करवाते हैं।
मेडिकल ऑफिसर डॉ. रत्नप्रभा पटेल ने बताया कि अस्पताल में स्टाफ नर्सों की कमी की जानकारी वरिष्ठ अधिकारियों को भेज दी गई है और जल्द वैकल्पिक व्यवस्था कराने का प्रयास किया जा रहा है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब एक लाख आबादी की स्वास्थ्य सेवाएं केवल दो स्टाफ नर्सों पर निर्भर थीं, तो उनके हटते ही वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की गई? आखिर कब तक गरीब ग्रामीण इलाज के नाम पर केवल रेफरल की पीड़ा झेलते रहेंगे?

Related Articles

Back to top button