मध्य प्रदेश

जब सड़कें बोलने लगती हैं…

दिव्य चिंतन : हरीश मिश्र, लेखक ( स्वतंत्र पत्रकार)
हर आंदोलन सत्ता के खिलाफ नहीं होता, लेकिन हर आंदोलन सत्ता के लिए एक संदेश जरूर होता है। लोकतंत्र में जब संवाद कमजोर पड़ता है, तब आक्रोश सड़कों पर उतरता है। इसलिए जिस तरह सरकारें बाढ़, महामारी और भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं के लिए आपदा प्रबंधन की विस्तृत रणनीति बनाती हैं, उसी तरह अब बढ़ते जनआंदोलनों के लिए भी संवाद और समाधान की राष्ट्रीय नीति बनाने का समय आ गया है।
भारत का लोकतांत्रिक इतिहास बताता है कि हर आंदोलन एक जैसा नहीं होता। जेपी आंदोलन और अन्ना हज़ारे आंदोलन व्यवस्था परिवर्तन, पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग लेकर खड़े हुए थे। उन्होंने व्यवस्था को चुनौती दी, लेकिन लोकतांत्रिक विमर्श को भी नई दिशा दी। दूसरी ओर, ऐसे आंदोलन भी देखने को मिले जिनमें लंबे समय तक सड़कें जाम रहीं, जनजीवन प्रभावित हुआ और सरकार को घुटनों पर लाने की रणनीति प्रमुख दिखाई दी। लोकतंत्र में विरोध का अधिकार पूर्णतः वैध है, लेकिन जब आंदोलन का उद्देश्य समाधान से हटकर केवल टकराव और ठहराव बन जाए, तो उसका नैतिक आधार कमजोर होने लगता है। लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जब सरकारें समय पर संवाद नहीं करतीं, मांगों को टालती रहती हैं और समस्याओं के समाधान में देरी होती है, तब असंतोष उग्र रूप लेता है। इसलिए हर आंदोलन की जिम्मेदारी केवल आंदोलनकारियों पर नहीं डाली जा सकती। कई बार मौन सत्ता भी आंदोलनों को उग्र बनाने में अनजाने में भूमिका निभाती है।
आज छात्रों से लेकर किसानों, कर्मचारियों और विभिन्न सामाजिक समूहों तक असंतोष के स्वर सुनाई दे रहे हैं। यह केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक शासन की गुणवत्ता का भी प्रश्न है।
यदि संवाद की संस्थागत व्यवस्था नहीं बनेगी, तो हर नया विवाद सड़क पर पहुंचेगा और प्रशासन अंततः पुलिस के सहारे समाधान खोजने को मजबूर होगा।
समय की मांग है कि केंद्र और राज्य सरकारें ‘आंदोलन संवाद आयोग’ जैसी स्वतंत्र व्यवस्था पर गंभीरता से विचार करें। ऐसा तंत्र, जो आंदोलन के शुरुआती चरण में ही प्रतिनिधियों से बातचीत करे, विवाद के मूल कारणों का अध्ययन करे और सरकार को समयबद्ध समाधान सुझाए। इससे न केवल टकराव कम होगा, बल्कि सरकार की संवेदनशीलता पर जनता का भरोसा भी बढ़ेगा।
लोकतंत्र की मजबूती विरोध को दबाने में नहीं, बल्कि विरोध को सुनने में है। और आंदोलन की सफलता सरकार को झुकाने में नहीं, बल्कि समाज को साथ लेकर समाधान तक पहुँचने में है।
क्योंकि जब सरकारें सुनना छोड़ देती हैं, तब सड़कें बोलने लगती हैं और जब सड़कें ही संवाद का स्थायी मंच बन जाएं, तो समझ लेना चाहिए कि लोकतंत्र चेतावनी दे रहा है…!

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