धार्मिकपर्यावरणमध्य प्रदेशमनोरंजन

सावन आया, लेकिन कजरी और झूलों की रौनक हुई गुम

सिलवानी। सावन का महीना आते ही कभी गांवों की गलियां और बगीचे लोकगीतों, कजरी-मल्हार और झूलों की पींगों से गुलजार हो जाते थे। पेड़ों की डालियों पर झूले पड़ते थे और युवतियां व महिलाएं समूह में सावन के गीत गाते हुए झूला झूलती थीं। बारिश की फुहारों के बीच गूंजते लोकगीत सावन के मौसम को खास बना देते थे। लेकिन बदलती जीवनशैली और आधुनिकता के दौर में यह परंपरा अब धीरे-धीरे सिमटती जा रही है।
न झूले दिखते हैं, न सुनाई देती कजरी
पहले सावन लगते ही गांवों में आम, नीम और बरगद जैसे पेड़ों पर झूले डाल दिए जाते थे। महिलाएं और युवतियां सहेलियों के साथ झूला झूलते हुए कजरी और मल्हार गाती थीं। अब पेड़ों की संख्या कम होने के साथ ही लोगों की व्यस्तता भी बढ़ गई है। शहरों में कहीं-कहीं घरों या टैरेस पर झूले नजर आते हैं, लेकिन उनमें पहले जैसी सामूहिकता और उत्साह दिखाई नहीं देता।
बुजुर्गों की यादों में बसा सावन
सत्तर वर्ष से अधिक उम्र की बुजुर्ग महिलाएं आज भी पुराने सावन को याद करती हैं। उनका कहना है कि पहले सावन के दौरान घर-घर में अलग ही माहौल रहता था। महिलाएं एकत्र होती थीं, गीत गाती थीं और घंटों झूला झूलती थीं। सावन के गीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि आपसी मेल-मिलाप और सामाजिक जुड़ाव का माध्यम भी थे।
आधुनिकता के साथ कमजोर हुआ सामाजिक जुड़ाव
बदलते समय के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में भी जीवनशैली बदल गई है। पेड़ों की कमी, व्यस्त दिनचर्या, मोबाइल और मनोरंजन के आधुनिक साधनों ने पुरानी परंपराओं की जगह ले ली है। इसके साथ ही सामाजिक मेल-जोल भी पहले की तुलना में कम हुआ है। कभी त्योहारों के बहाने एक-दूसरे के घर पहुंचने और साथ मिलकर खुशियां मनाने की परंपरा थी, जो अब कई जगह औपचारिकता तक सीमित होती जा रही है।
परंपरा बचाने की जरूरत
नगर के कुछ सांस्कृतिक प्रेमी और सामाजिक संगठन समय-समय पर सावन मिलन जैसे कार्यक्रम आयोजित कर इन परंपराओं को जीवित रखने का प्रयास कर रहे हैं। हालांकि, बुजुर्गों के अनुसार जिस तरह सावन गांवों की चौपालों, पेड़ों की छांव और लोकगीतों के बीच जिया जाता था, उसकी बात ही अलग थी।
सावन आज भी आता है, बारिश भी होती है और हरियाली भी छाती है, लेकिन कजरी-मल्हार की वह मिठास और झूलों की सामूहिक रौनक अब पहले जैसी दिखाई नहीं देती। जरूरत है कि नई पीढ़ी को इन लोक परंपराओं से जोड़ा जाए, ताकि हमारी सांस्कृतिक विरासत केवल बुजुर्गों की यादों तक सीमित न रह जाए।

Related Articles

Back to top button