शिक्षक पढ़ा रहे हैं या सिर्फ हाजिरी लगा रहे हैं ?

शिक्षक दिवस पर सबसे बड़ा सवाल
हरीश मिश्र “वृक्ष मित्र”, लेखक ( स्वतंत्र पत्रकार )
शिक्षक दिवस पर हर साल शिक्षकों का सम्मान होता है। फूल दिए जाते हैं, मालाएं पहनाई जाती हैं, भाषण होते हैं और शिक्षक को राष्ट्र निर्माता बताया जाता है। लेकिन सवाल है…क्या केवल एक दिन सम्मान देने से शिक्षक का सम्मान बचा रह सकता है ?
आजादी के पहले और बाद शिक्षक समाज में आदर के पात्र रहे हैं। अभिभावकों को विश्वास था कि उनका बच्चा विद्यालय गया है तो पढ़कर ही लौटेगा। शिक्षक केवल नौकरी नहीं करता था, वह भविष्य गढ़ता था। आज सरकारी विद्यालयों की व्यवस्था पर सवाल हैं और शिक्षकों की भूमिका भी सवालों के घेरे में है।
आखिर सरकार को शिक्षक की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए सेल्फी, ई-अटेंडेंस और शिक्षक पात्रता परीक्षा जैसी व्यवस्थाओं की जरूरत क्यों पड़ी ?
क्या शिक्षक स्वयं यह भरोसा नहीं दिला सकते थे “हम समय पर विद्यालय पहुंचेंगे, पूरी ईमानदारी से पढ़ाएंगे और अपनी उपस्थिति का प्रमाण देने के लिए किसी निगरानी व्यवस्था की जरूरत नहीं पड़ने देंगे।”
शिक्षक संगठनों को भी स्वयं से पूछना चाहिए कि वे किस काले कानून का विरोध कर रहे हैं…निगरानी का या उस अविश्वास का, जिसकी नौबत ही नहीं आनी चाहिए थी ? और यदि शिक्षक बच्चों को गंभीरता से पढ़ाएंगे, अपने विषय पर लगातार पकड़ बनाए रखेंगे, तो परीक्षा देने से डर कैसा ?
यहां एक और गंभीर सवाल खड़ा होता है। मध्य प्रदेश के शिक्षा मंत्री राव उदय प्रताप सिंह ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि वे व्यक्तिगत रूप से ऐसे 500 शिक्षकों को जानते हैं जो स्कूल नहीं जाते और उनकी जगह किराए के व्यक्ति को लगा रखा है।
यदि संवैधानिक पद पर बैठे जिम्मेदार व्यक्ति को ऐसा कहना पड़ा है तो सवाल केवल उन 500 शिक्षकों का नहीं है। सवाल यह है कि क्या व्यवस्था इतनी कमजोर है कि शिक्षक विद्यालय जाने के बजाय अपनी जगह किसी और को भेज सकता है ?
और यदि यह कथन सही है तो उससे भी बड़ा सवाल— ऐसे शिक्षक बच्चों का भविष्य गढ़ रहे हैं या शिक्षा व्यवस्था के भरोसे को तोड़ रहे हैं ?
बेशक, हर सरकारी शिक्षक लापरवाह नहीं है। आज भी हजारों शिक्षक ऐसे हैं जिनके लिए अध्यापन नौकरी नहीं, मिशन है। सवाल उन शिक्षकों से नहीं, बल्कि उस व्यवस्था से है जिसमें अच्छे और लापरवाह शिक्षक एक ही तराजू पर दिखाई देने लगते हैं।
शिक्षक की पहचान उसका वेतन नहीं, उसकी कक्षा तय करती है। उसकी उपस्थिति, रजिस्टर नहीं, उसके विद्यार्थी बताते हैं।
उनका सम्मान, समारोह नहीं बल्कि उनका आचरण तय करता है।
आदर्श शिक्षक वह नहीं जो शिक्षक दिवस पर सम्मानित हो जाए। आदर्श शिक्षक वह है जिसके कारण उसके विद्यार्थी जीवनभर कहें
“हम जो कुछ हैं, उसमें हमारे शिक्षक का बड़ा योगदान है।”
इस शिक्षक दिवस पर समाज और शिक्षकों…दोनों को स्वयं से पूछना चाहिए… हमारे विद्यालयों में शिक्षक पढ़ा रहे हैं या केवल उपस्थित हो रहे हैं ?
कक्षा में शिक्षक का इंतजार विद्यार्थी करते हैं या शिक्षक घंटी का ? शिक्षक अपने अधिकारों के प्रति जितने सजग हैं क्या अपने कर्तव्यों के प्रति भी उतने ही सजग हैं ?
और सबसे बड़ा सवाल
यदि शिक्षक को उसके कर्तव्य की याद दिलाने के लिए सरकार को निगरानी और परीक्षा की व्यवस्था करनी पड़े, तो शिक्षक दिवस पर सम्मान किसका होना चाहिए…शिक्षक का या उस व्यवस्था का, जो उसे काम करने के लिए बाध्य करती है ?
आज सेल्फी , ई-अटेंडेंस और परीक्षा है। कल यदि शिक्षक अपने आचरण में सुधार नहीं लाए तो क्या व्यवस्था को इससे भी आगे जाना पड़ेगा ? क्या वह दिन भी आएगा जब शिक्षक के विद्यालय आने-जाने और गतिविधियों पर नजर रखने के लिए तकनीक को उसके शरीर तक पहुंचाने की कल्पना करनी पड़े ? अर्थात शिक्षक के शरीर पर चिप लगानी पड़े । ऐसी नौबत आने से पहले शिक्षक समाज को स्वयं सोचना होगा। शिक्षक होना केवल सरकारी नौकरी में आना नहीं है। यह राष्ट्र के भविष्य के प्रति जिम्मेदारी है।
इस शिक्षक दिवस पर उन शिक्षकों को नमन, जो अपनी जिम्मेदारी को नौकरी नहीं, राष्ट्र निर्माण का दायित्व समझते हैं। और जो इस दायित्व से दूर हैं, उनसे केवल इतना आग्रह…
सम्मान मांगने से पहले ऐसा आचरण कीजिए कि समाज स्वयं आपको सम्मान देने के लिए खड़ा हो जाए।
“यह सवाल उन शिक्षकों के लिए नहीं है जो अपने कर्तव्य को पूजा समझकर निभा रहे हैं। ऐसे शिक्षक ही इस पेशे की प्रतिष्ठा हैं। सवाल उनसे है, जिनके कारण पूरी शिक्षक बिरादरी को संदेह की नजर से देखा जाने लगा है।



