मध्य प्रदेश

कुछ छात्रावासों में मिलती है बच्चों को -सूखी रोटी, दाल में पानी!

हरीश मिश्र ‘वृक्ष मित्र’ लेखक ( स्वतंत्र पत्रकार )
यह शिकायत नहीं, उन बच्चों की व्यथा है, जो परिवार से दूर छात्रावासों में रहकर गरीबी से लड़ने और भविष्य संवारने के सपने देखते हैं।
जिले के कुछ छात्रावासों में बच्चों को सूखी रोटी और पानी जैसी पतली दाल मिलने की शिकायतें विचलित करती हैं। सवाल है, मोहन सरकार में बच्चों के भोजन के लिए बजट की कमी नहीं है, बावजूद उनकी थाली में पौष्टिक भोजन क्यों नहीं पहुंच रहा?
इनमें कोई बच्चा अनाथ है, किसी के सिर से मां का साया उठ चुका है, तो किसी के परिवार के पास दो वक्त की रोटी जुटाने तक के पैसे नहीं। छात्रावास उनके लिए सिर्फ रहने की जगह नहीं, बेहतर भविष्य की उम्मीद है।
विडंबना देखिए, जिन बच्चों का भविष्य संवारने के लिए सरकारी धन खर्च होता है, उन्हीं के हिस्से का भोजन खाकर कुछ छात्रावास अधीक्षक तंदुरुस्त हो रहे हैं और बच्चे कुपोषण का शिकार।
बच्चे शिकायत भी नहीं कर पाते। उन्हें डर रहता है कि कहीं उनकी थोड़ी-सी सुविधा भी न छिन जाए। उनकी चुप्पी को संतोष समझना व्यवस्था की सबसे बड़ी भूल है।
भूखे पेट शिक्षा और बेहतर भविष्य के सपने देखना आसान नहीं। सरकारी योजनाओं की सफलता बजट खर्च होने में नहीं, उसका लाभ जरूरतमंद बच्चों तक पहुंचने में है। बच्चों की थाली में भोजन की गुणवत्ता ही व्यवस्था की संवेदनशीलता की असली परीक्षा है।
प्रशासन को चाहिए कि छात्रावासों में अचानक निरीक्षण कर भोजन की गुणवत्ता, निर्धारित मेन्यू और राशन के उपयोग की जांच करे। बच्चों से बिना दबाव के संवाद हो और जहां अनियमितता प्रमाणित हो, वहां जिम्मेदारी तय कर कठोर कार्रवाई की जाए।
आखिर इन बच्चों ने गरीबी तो विरासत में पाई है, क्या इन्हें भूख से मुक्ति  मिलेगी ? जब भूख से मुक्ति मिलेगी तभी वह पढ़ पाएंगे।

*आनंदम्*
खुशियां बांटने में ही है सच्चा आनंद
आनंदम् परिवार एवं फोर्ट क्लब, रायसेन द्वारा प्रतिवर्ष नवरात्रि में कन्या छात्रावास की बेटियों को भोजन कराया जाता है। वहीं, ‘बस एक कदम और सोशल वेलफेयर फाउंडेशन’ तथा रायसेन जिला विकास समिति द्वारा सर्दियों में बच्चों को ऊनी वस्त्र वितरित किए जाते हैं।
ये केवल भोजन कराने और वस्त्र बांटने के कार्यक्रम नहीं हैं, बल्कि बच्चों के प्रति अपनत्व, संवेदनशीलता और सामाजिक जिम्मेदारी निभाने के जीवंत उदाहरण हैं।
समाज के अन्य सामाजिक संगठनों को भी इस दिशा में आगे आना चाहिए। जन्मोत्सव, त्योहारों और विशेष अवसरों पर छात्रावासों में जाकर बच्चों के साथ खुशियां बांटें, उनके बीच बैठकर भोजन करें, उनकी समस्याओं और जरूरतों को समझें तथा एक पालक की भूमिका निभाएँ।
उत्सव की सार्थकता केवल अपने परिवार के साथ खुशियां मनाने में नहीं, बल्कि उन बच्चों को भी अपनेपन का अहसास कराने में है, जिन्हें समाज के स्नेह और सहयोग की जरूरत है।

रायसेन कलेक्टर रोहित सिसोनिया का कहना है कि हम छात्रावासों में बच्चों से संवाद करेंगे, पालक के रूप में उनकी समस्याओं को समझेंगे और औचक निरीक्षण के माध्यम से व्यवस्था में सुधार का प्रयास करेंगे। इस पहल में समाज और सामाजिक संगठनों का सहयोग अपेक्षित है।

Related Articles

Back to top button