प्राचीन परम्परा को आज भी निभा रहे कस्बा सांचेत ग्रामवासी
रिपोर्टर : सतीश मैथिल
सांचेत । रायसेन तहसील का सवसे बड़ा कस्बा सांचेत जिसकी आवादी करीब छह हजार के लगभग है और यहा पर प्रति वर्ष एक ही स्थान पर गाय के गोबर से बने हो कंडे से सैकड़ों वर्ष से होली बाले टपपुआ पर होली जलाई जाती है और आज भी यहा की ये परम्परा को लोग बखूबी निभा रहे हैं
कंडों की होली जलाएं और जंगल बचाएं
रंगों का पर्व होली अगले 4 मार्च आने को है इसके पूर्व होलिका दहन होगा। इसलिए यह वक्त है कंडों की होली के बारे में याद दिलाने और इससे जोड़ने का।
पिछले कई वर्षों की तरह हम इस साल भी गोबर के कंडों से होली जलाएं और गाय, पर्यावरण तथा जंगल की रक्षा करें गोशालाओं को स्वाबलंबी बनाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। पिछले सालों में विभिन्न समाजों, संस्थाओं, व्यापारिक प्रतिष्ठानों, महिलाओं, बुजुर्गों, युवाओं ने गोबर के कंडों से बनी होली जलाकर बड़े पैमाने पर इसका प्रतिसाद किया है। इस अभियान से सैकड़ों टन लकड़ियां जलने और हजारों किलो कार्बन हवा में घुलने से बचा है। इस उत्साह का ही परिणाम है कि अकेले रायसेन जिले के सांचेत में ही इस बार होलिका दहन के लिए हजारों कंडे बनकर तैयार हैं।
महाअभियान में अपना योगदान दें।
सांचेत के पूर्व सरपंच देवकिशन शर्मा का कहना है कि जैसा मैंने खुद देखा है और सुना भी है कि पिछले कई साल में इस इस अभियान के पर्यावरण संरक्षण की दिशा में सार्थक परिणाम भी आए हैं । हजारों पेड़ कटने से बचे हैं तो वहीं पर्यावरण को भी नुकसान से काफी हद तक बचाया जा सका है। कंडों की होली से जंगलों को जिंदगी मिलेगी इसलिए सभी लोगों को इसमें अपना योगदान देना चाहिए।
साहू समाज के जिला अध्यक्ष केशराम साहू ने वताया की
होलिका पर्यावरण की मित्र बन जाएगी। अगर लोग पेड़ काटने वालों को रोकें और होलिका पूजन के लिए कंडों का उपयोग करें तो यह होलिका, पर्यावरण की मित्र बन जाएगी। हमें लोगों को जागरुक करना होगा साथ ही सामूहिक होलिका दहन से लोगों में प्रेम-सद्भाव बढ़ाने की दिशा में सराहनीय प्रयास भी करने होंगे।
पूर्व जनपद सदस्य अमर सिंह भदौरिया ने बताया कि कंडे की होली के यह हैं फायदे,
दो होलिका में होता है एक पेड़ स्वाहा
एक पेड़ में करीब 4 से 5 क्विंटल लकड़ी होती है
एक होलिका में करीब दो से ढाई क्विंटल लकड़ी जलती है
दो होलिका में 1 पेड़ स्वाहा हो जाता है।
ऐसे वृक्षों को कंडो की होली से बचा सकते हैं।
सामूहिक होली से भी पर्यावरण का संरक्षण हो सकता है
हर घर से कंडे एकत्र करके गांव के सिर्फ एक होली जलाते हैं। इस प्राचीन परंपरा का निर्वाह अब भी रायसेन जिला के सांचेत कस्बा में किया जा रहा है।
पूर्व जनपद बलवंत सिंह भदौरिया ने बताया कि कस्बा में प्राचीन काल से कंडों की होली जलाने की परंपरा अब भी कायम है। इसमें खास बात यह है कि प्रत्येक घर से लोग कंडे लाकर होलिका में शामिल करते हैं।
पूरे गांव की एक ही स्थान पर होलिका जलाई जाती है। सामाजिक सद्भाव और बुराई को जलाने के प्रतीक होली पर्व की वास्तवित अवधारणा को ग्रामीण यहां चरितार्थ करते हैं। सभी वर्ग के लोग मिल-जुलकर एक-दूसरे को गले लगाते हुए होली की शुभकामनाएं देते हैं। होलिका की आग सुबह अपने घर ले जाकर पूजन किया जाता है और कंडों की आग में बाटी-भरता बनाया जाता है।
ग्राम के लोग पलाश के फूलों से प्राकृतिक रंग बनाकर होली में उपयोग करते हैं। शहर के नजदीक होने के बावजूद सांचेत कस्बा में प्राचीन परंपरा का निर्वाह करने के प्रति लोगों में अब भी रुझान है। ग्राम की एकता और प्राकृतिक महत्व को देखते हुए पूरे गांव की एक ही होलिका का दहन करना कारगर साबित हो रहा है। कंडों की होलिका जलाने के प्रति अब शहरों के लोग भी जागरूक हो रहे हैं। इस तरह सांचेत में होली मनाने की प्राचीन परंपरा का महत्व आधुनिक दौर में भी बना हुआ है।



