धार्मिकमध्य प्रदेश

आचार्यश्री विद्यासागर महाराज की सल्लेखना पूर्वक समाधि होने पर नगर रहा गमगीन

चलते-फिरते संत, युग दृष्टा, राष्ट्रहित चिंतक, इंडिया नही भारत बोलो का जयघोष करने की प्रेरणा देने वाले राष्ट्र संत को किया आम व खास ने नमन
बुधवारा बाजार में अखण्ड दिगंबर जैन समाज ने किया सर्व समाज भावपूर्ण विनयांजली सभा का आयोजन

सिलवानी । संस्कृत, प्राकृत सहित विभिन्न आधुनिक भाषाओं हिन्दी, मराठी, कन्नड़ आदि में विशेषज्ञ स्तर का ज्ञान वाले राष्ट्र संत, आचार्य प्रवर विद्यासागर महाराज की सल्लेखना पूर्वक समाधि हो जाने से नगर में अंचल में शोक की लहर छा गई। शोक स्वरुप नगर के बाजार बंद रहे व नागरिको ने राष्ट्र संत को नमन करते हुए अश्रू पूर्ण श्रद्वा सुमन अर्पित किए।
रविवार की रात्रि में बुधवारा बाजार स्थित पारसनाथ दिगंबर जैन मंदिर के समाने अखण्ड दिगंबर जैन समाज के द्वारा सर्व समाज भावपूर्ण विनयांजली सभा का आयोजन किया।
इस कार्यक्रम में हिंदु, मुस्लिम, ईसाई सहित अन्य समाज के लोगो ने शामिल होकर अपने श्रद्वासुमन अर्पित किए। भावपूर्ण विनयांजली सभा को विधायक देवेंद्र पटेल, संजय मस्ताना, छिदामीलाल जैन, मुस्लिम त्यौहार कमेटी के अध्यक्ष इल्याज ताज, फादर जॉन, शालिगराम सोनी, रामस्वरुप श्रीवास्तव, संदीप शर्मा, पारसनाथ दिगंबर जैन समाज के अध्यक्ष निर्मल बजाज, महामंत्री श्रीपाल जैन, तारण तरण दिगंबर जैन समाज के अध्यक्ष सवाई सेठ जयबाबू जैन, पुनीत समैया, राजेंद्र सोनी, आलोक रघुवंशी, अशोक जैन मल्लू भाई, सुनील जैन मेडीकल, छबीलचंद्र जैन, संजू बनारसी सहित अनेक वक्ताओ ने संबोघित किया। उन्होने अपने संबोधन में चलते-फिरते संत, युग दृष्टा, राष्ट्रहित चिंतक, इंडिया ही भारत बोलो का जयघोष करने की प्रेरणा देने वाले राष्ट्र संत आचार्यश्री विद्यासागर महाराज को सदी का महान स्ंत निरुपित किया तथा कहा कि उनकी कमी ना तो भरी जा सकती है और ना ही उन्हे कभी भूलाया जा सकता है।
वक्ताओ ने कहा कि सौ से अधिक शोधार्थियों ने उनके कार्य का मास्टर्स और डॉक्ट्रेट के लिए अध्ययन किया है। उनके कार्य में निरंजना शतक, भावना शतक, परीशह जाया शतक, सुनीति शतक और शरमाना शतक शामिल हैं। उन्होंने काव्य मूक माटी की भी रचना की है। विभिन्न संस्थानों में यह स्नातकोत्तर के हिन्दी पाठ्यक्रम में पढ़ाया जाता है। आचार्य विद्यासागर कई धार्मिक कार्यों में प्रेरणास्रोत रहे हैं। यहां पर वक्ताओ सहित उपस्थितो ने भी आचार्य विद्यासागर महाराज के दिवंगत होने पर उन्हे श्रद्वा सुमन अर्पित किए। कार्यक्रम का संचालन प्रवीण जैन ने किया।
अंतिम संस्कार श्रीफल व चंदन की लकड़ी से होता है।
पारसनाथ दिगंबर जैन समाज के अध्यक्ष निर्मल बजाज ने बताया कि जैन परंपरा में जैन संतों का अंतिम संस्कार श्रीफल और चंदन की लकड़ी से किया जाता है। जैन समाज में श्रीफल और चंदन को शुद्ध माना गया है। इनमें कीड़े नहीं लगते। जैन धर्म में अहिंसा का महत्व है। श्रीफल से अंतिम संस्कार का आध्यात्मिक महत्व है। श्रीफल एक ऐसा फल है जिसकी शिखा ऊर्ध्वगामी होती है। यही वजह है कि मोक्ष उत्सव में इसका प्रयोग होता है। उनका कहना है कि आचार्यश्री नियमों का पालन करने वाले थे। उनका खान पान बेहद सीमित था। वे तेल, चीनी और नमक तक का सेवन नहीं करते थे। ऐसे में उनका स्वास्थ्य अच्छा था। जैसे आचार विचार और नियम संयम होता हैए वैसा ही शरीर भी ढल जाता है।

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