कुल्हाड़ी में जब तक लकड़ी का बैट नहीं लगेगा तब तक लकड़ी कटना नामुमकिन है

रिपोर्टर : कुन्दनलाल चौरसिया
गौरझामर । प्रायः ऐसा कहा जाता है कि जब तक कुल्हाड़ी में लकड़ी का बेट नहीं लगेगा तब तक लकड़ी कटना कठिन है यदि हम इसी बात को दक्षिण वन मंडल के वन परिक्षेत्र गौरझामर के जंगलों पर प्रतिपादित करें तो यह सत्य साबित होता है कहना ना होगा कि जिस तेजी से जंगलों का ह्रास हो रहा है उससे पर्यावरण को व्यापक खतरा उत्पन्न होता जा रहा है। जंगल की इस अवैध व अंधाधुंध कटाई में कहीं न कहीं कुल्हाड़ी में लकड़ी का बैट लगा हुआ है लकड़ी के इस बैंट ने भ्रष्टाचार के चलते यहां के हरे-भरे वेश कीमती सागौन के घने जंगलों को वीरान बना दिया है । वन रक्षकों व संबंधित अधिकारियों की वन माफियाओं से मिलीभगत के चलते आज जंगलों में सागौन के पेड़ कम अन्य प्रजाति के पेड़ बहुतायत में देखे जाते हैं वन माफियाओं द्वारा अवैध रूप से रोज काटे जा रहे जंगलों के हरे-भरे सागौन के पेड़ों के कारण वन विभाग की मुश्किलों को आसान कर दिया है वन विभाग द्वारा कुछ सालों के अंतराल में कूप कटाई के काम तेजी से किए जाते थे वन माफियाओं के कारण अब वन विभाग को कूप कटाई की रस्म अदायगी की औपचारिकताएं मात्र करना पड़ती है वन परीक्षेत्र गौरझामर द्वारा जल जंगल जमीन की तरफ कोई भी ध्यान मुस्तैदी से नहीं दिया जा रहा है। विशाल वन अमले की तैनाती के बावजूद जंगल की बेतहाशा कटाई आखिर कहां से और कैसे हो रही है ? गौरझामर एवं आसपास के गांव में घर घर आरा मशीन चल रही हैं और कटी हुई सागौन की लकड़ी से तरह-तरह के फर्नीचर व ऐशो आराम के सामान धड़ल्ले से दिनदहाड़े बनाए जा रहे हैं। सागौन से बने हुए इन अवैध फर्नीचर व अन्य कीमती सामानों को परिवहन के लिए रसीदें आखिर कौन मुहैया करा रहा है? इसमें कहीं ना कहीं वन विभाग में ढोल की पोल दिखाई दे रही है। भारतीय जनता पार्टी के शासन काल में पर्यावरण को बनाए रखने में कोई भी दिलचस्पी दिखाई नहीं दे रही है यदि लोगों द्वारा वन विभाग को आईना दिखाया जाता है तो वह इसे देखना मुनासिब नहीं समझते लकड़हारो एवं जंगलों से जलाऊ लकड़ी बीन कर लाने वाले लोगों से जब पूछा जाता है कि तुम यह लकड़ी कहां से और कैसे लाए हो तो उनका कहना होता है कि हमें जंगल में लकड़ी काटने की कोई जरूरत नहीं रहती वहां इतने सागौन के कटे हुए झौरा, पेड़ के ऊपरी भाग, पड़े रहते हैं कि हमें सहज में ही लकड़ी उपलब्ध हो जाती है उनका कहना है कि जिस तरह से जंगलों में सागौन के पेड़ के झौरा पड़े हुए मिलते हैं उससे बन विनाश तेजी से हो रहा है इसे सख्ती से रोका जाना नितांत आवश्यक है गंभीर चिंता का विषय तो यह है कि हमारे पूर्वजों ने हमें घने जंगल हरा भरा परिक्षेत्र दिया था आने वाली पीढ़ी को क्या हम हरे-भरे जंगलों के स्थान पर वीरान रेगिस्तान उजड़े वनो को देकर जाएंगे सत्तर से लेकर नब्बे के दशक में जिन जगलो में आर पार देखने की गुंजाइश नहीं थी जहां सूर्य की किरणें धरती पर नहीं पहुंच पाती थी वहां आज सूर्य की तेज किरणों के कारण लपटें लग रही हैं पर्यावरणविद जंगलों को बचाने के लिए कारगर कदम शीघ्र उठाएं जिससे शेष बचे हुए गिने-चुने सागौन के पेड़ों को इतिहास बनने से बचाकर रखा जा सके । यहां हम यदि बैदवारा काछी पिपरिया के घने चंदन वन का उदाहरण दें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी जहां कुछ दशकों में ही यहां के हरे-भरे बेशकीमती कट चंदन के पेड़ रातों-रात गायब हो गए आज वहां एक भी चंदन का पेड़ नहीं है बैदवारा का यह चंदन वन आज इतिहास बनकर रह गया है।



