धार्मिक

Today Panchang आज का पंचांग बुधवार, 23 जुलाई 2025

आचार्य श्री गोपी राम (ज्योतिषाचार्य) जिला हिसार हरियाणा मो. 9812224501
जय श्री हरि
🧾 आज का पंचांग 🧾
बुधवार 23 जुलाई 2025
23 जुलाई 2025 दिन बुधवार को श्रावण मास के कृष्ण पक्ष कि चतुर्दशी तिथि है। आज पवित्र श्रावण मास का मास शिवरात्रि व्रत भी है। आज चतुर्दशी को मासशिवरात्रि के इस महान पर्व पर कुछ आप भी प्राप्त करें। तो आज आप पहला उपाय करें, कि किसी भी शिव मंदिर में जाकर शिवलिंग पर पञ्चामृत से स्वयं अभिषेक करें। इससे आपकी कोई विशिष्ट मनोकामना की पुर्ति हों जाएगी‌। दुसरा आज आंवले के जड़ में घी का दीपक में एक चुटकी हल्दी डालकर जला दें। जिसकी भी शादी में विलम्ब हो रहा है तो वह नहीं होगा अर्थात शीध्र ही विवाह का योग बन जाएगा। आप सभी सनातनियों को “मासशिवरात्रि व्रत” की बहुत – बहुत हार्दिक शुभकामनाएं एवं अनन्त – अनन्त बधाईयाॅं।।
ॐ एकदन्ताय विद्महे वक्रतुंडाय धीमहि तन्नो बुदि्ध प्रचोदयात ।।
☄️ दिन (वार) – बुधवार के दिन तेल का मर्दन करने से अर्थात तेल लगाने से माता लक्ष्मी प्रसन्न होती है धन लाभ मिलता है।
बुधवार का दिन विघ्नहर्ता गणेश का दिन हैं। बुधवार के दिन गणेश जी के परिवार के सदस्यों का नाम लेने से जीवन में शुभता आती है।
बुधवार के दिन गणेश जी को रोली का तिलक लगाकर, दूर्वा अर्पित करके लड्डुओं का भोग लगाकर उनकी की पूजा अर्चना करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
🔮 शुभ हिन्दू नववर्ष 2025 विक्रम संवत : 2082 कालयक्त विक्रम : 1947 नल
🌐 कालयुक्त संवत्सर विक्रम संवत 2082,
👸🏻 शिवराज शक 352_

✡️ शक संवत 1947 (विश्वावसु संवत्सर), चैत्र
☮️ गुजराती सम्वत : 2081 नल
☸️ काली सम्वत् 5126
🕉️ संवत्सर (उत्तर) क्रोधी
☣️ आयन – दक्षिणायन
☂️ ऋतु – सौर वर्षा ऋतु
☀️ मास – श्रावण मास
🌒 पक्ष – कृष्ण पक्ष
📆 तिथि – बुधवार श्रावण माह के कृष्ण पक्ष चतुर्दशी तिथि 02:29 AM तक उपरांत अमावस्या
🖍️ तिथि स्वामी :- चतुर्दशी तिथि के स्वामी भगवान भोलेनाथ जी है। प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मासिक शिवरात्रि मनाई जाती है । चतुर्दशी को चौदस भी कहते हैं। चतुर्दशी तिथि के स्वामी भगवान शिव हैं।
💫 नक्षत्र – नक्षत्र आद्रा 05:54 PM तक उपरांत पुनर्वसु
🪐 नक्षत्र स्वामी – आर्द्रा नक्षत्र का स्वामी ग्रह राहु है।आर्द्रा नक्षत्र के देवता रूद्र माने गए हैं। ये आंधी व तूफान के स्वामी हैं। यह भगवान शिव का रूप हैं।
⚜️ योग – व्याघात योग 12:33 PM तक, उसके बाद हर्षण योग
प्रथम करण : विष्टि – 03:31 पी एम तक
द्वितीय करण : शकुनि – 02:28 ए एम, जुलाई 24 तक चतुष्पाद
🔥 गुलिक काल : – बुधवार को शुभ गुलिक 11:10 से 12:35 बजे तक ।
⚜️ दिशाशूल – बुधवार को उत्तर दिशा में दिशा शूल होता है ।इस दिन कार्यों में सफलता के लिए घर से सुखा / हरा धनिया या तिल खाकर जाएँ ।
🤖 राहुकाल : – बुधवार को राहुकाल दिन 12:35 से 2:00 तक । राहु काल में कोई भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिए |
🌞 सूर्योदयः- प्रातः 05:19:00
🌄 सूर्यास्तः- सायं 06:39:00
👸🏻 ब्रह्म मुहूर्त : 04:15 ए एम से 04:56 ए एम
🌇 प्रातः सन्ध्या : 04:36 ए एम से 05:37 ए एम
🌟 अभिजित मुहूर्त : कोई नहीं
🔯 विजय मुहूर्त : 02:44 पी एम से 03:39 पी एम
🐃 गोधूलि मुहूर्त : 07:17 पी एम से 07:38 पी एम
🌌 सायाह्न सन्ध्या : 07:17 पी एम से 08:20 पी एम
💧 अमृत काल : 08:32 ए एम से 10:02 ए एम
🗣️ निशिता मुहूर्त : 12:07 ए एम, जुलाई 24 से 12:48 ए एम, जुलाई 24
🚓 यात्रा शकुन-हरे फ़ल खाकर अथवा दूध पीकर यात्रा पर निकलें।
👉🏼 आज का मंत्र-ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं स: बुधाय नम:।
💁🏻‍♀️ आज का उपाय-किसी बटुक को कांस्य पात्र भेंट करें।
🪵 वनस्पति तंत्र उपाय-अपामार्ग के वृक्ष में जल चढ़ाएं।
⚛️ पर्व एवं त्यौहार – मास शिवरात्रि/भद्रा/ अमावस्या प्रारम्भ उ. रात्रि 02.28/ स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आज़ाद जयन्ती, भारतीय स्वतंत्रता सेनानी बाल गंगाधर तिलक जयन्ती, स्वतंत्रता सेनानी लक्ष्मी सहगल जयन्ती, भारतीय गायिका वसुंधरा पंडित स्मृति दिवस, फ़िल्म निर्देशक महमूद पुण्य तिथि, राष्ट्रीय वेनिला आइसक्रीम दिवस, भव्य दादी दिवस, राष्ट्रीय हॉट डॉग दिवस, आकाशवाणी स्थापना दिवस, राष्ट्रीय प्रसारण दिवस (National Broadcasting Day)
✍🏼 तिथि विशेष – चतुर्दशी तिथि को शहद त्याज्य होता है। चतुर्दशी तिथि को एक क्रूरा तिथि मानी जाती है। इतना ही नहीं चतुर्दशी तिथि को उग्रा तिथि भी माना जाता है। यह चतुर्दशी तिथि रिक्ता नाम से विख्यात मानी जाती है। यह चतुर्दशी तिथि शुक्ल पक्ष में शुभ और कृष्ण पक्ष में अशुभ फलदायिनी मानी जाती है। इस चतुर्दशी तिथि के देवता भगवान शिवजी हैं।।
🗺️ Vastu tips 🗽
वास्तु शास्त्र की मानें तो मोगरा ऐसा पौधा है जिसकी खुशबू मन को सुकून देती है। साथ ही आसपास की नकारात्मकता भी दूर कर देती है और घर का माहौल ठीक हो जाता है। वास्तु शास्त्र में मोगरे के पौधे को सौभाग्य बढ़ाने वाला माना गया है। यह पौधा घर की सुंदरता तो बढ़ाता ही है साथ घर में पॉजिटिव एनर्जी भी लाता है। मोगरे का संबंध शुक्र और चंद्रमा से है। चूंकि शुक्र प्रेम, आर्कषण और ऐश्वर्य का प्रतीका है और चंद्रमा मन और शांति का प्रतीक होता है। यही कारण है कि इस पौधे से घर में प्रेम बढ़ता है और मन शांत रहता है।
किस दिशा में लगाना चाहिए?
वास्तु शास्त्र में कहा गया है कि मोगरे के पौधे को अगर सही दिशा में लगाए जाए तो ज्यादा प्रभावी होता है। इसलिए इस पौधे को उत्तर-पश्चिम में लगाना बेहद शुभ है। इस दिशा को घर में तालमेल के संबंध से जोड़ा जाता है। अगर घर में यह दिशा नहीं समझ आ रहा तो आप इसे घर के मुख्य द्वार पर भी लगा सकते हैं।
🗝️ जीवनोपयोगी कुंजियां ⚜️
सोने से पूर्व आवश्यक रूप से परमात्मा के सामने बैठकर अपनी दिनचर्या उसे सुनाएँ | यदि कोई भूल की हो, किसी का दिल दुखाया हो या पीड़ा पहुंचाई हो तो शमा मांगे | सोते समय TV या इन्टरनेट का उपयोग न करें |
परमात्मा से गुड नाईट कर के सोयें | सोते समय कोई चिंता या किसी की याद न हो | परमात्मा की स्मृति में सोयें | नींद नहीं आ रही है तो इसकी भी चिंता न करें | मन ही मन कोई भजन गुनगुनाएं |आप को नींद कब आ जाएगी पता भी न पड़ेगा |
सुबह को जल्दी उठकर परमात्मा की याद में कम से कम 30 मिनट बैठें | फिर निवृत होकर व्यायाम करें व् सैर को जाएँ |
दिन में एक घंटे से ज्यादा न सोयें अन्यथा रात्रि को नींद गहरी नहीं आएगी | शारीरिक श्रम की आदत डालें | शरीर थका होता है तो नींद अच्छी आती है |
नींद न आने का एक कारण यह भी है की सोने का समय है रात्रि के 11 बजे से पूर्व | इसके पश्चात सोते हैं तो निद्रा चक्र बिगड़ जाता है | में अपने अनुभव से कहता हूँ कि शैया पर जाने के 5 मिनट के अन्दर नींद आ जाती है | अगर देरी से सोते हैं तो कुछ ज्यादा समय लगता है व् नींद डिस्टर्ब हो जाती है व् गहरी नहीं आती |
🩸 आरोग्य संजीवनी 💊
प्राथमिक सिर दर्द ये सिर दर्द सीधे मस्तिष्क या सिर की संरचनाओं से नहीं होते, बल्कि वे स्वयं एक बीमारी के रूप में होते हैं। इसके मुख्य प्रकार हैं:
माइग्रेन यह तीव्र और अक्सर एक तरफा सिर दर्द होता है, जिसमें तेज धड़कन जैसी दर्द होती है। इसके साथ मतली, उल्टी, और प्रकाश या आवाज़ के प्रति संवेदनशीलता हो सकती है। माइग्रेन के दर्द में कई घंटे से लेकर दिनों तक दर्द बना रह सकता है।
टेंशन टाइप सिर दर्द यह सबसे सामान्य प्रकार का सिर दर्द है, जिसमें सिर के दोनों ओर दबाव या कसाव जैसा महसूस होता है। यह तनाव, थकान, और मानसिक दबाव की वजह से होता है।
क्लस्टर सिर दर्द यह बहुत ही तेज़ और तीव्र सिर दर्द होता है, जो आमतौर पर एक तरफ आंख के पास या आसपास होता है। यह कुछ हफ्तों या महीनों तक लगातार हो सकता है।
माध्यमिक सिर दर्द यह सिर दर्द किसी अन्य बीमारी या समस्या के कारण होता है, जैसे:
साइनसाइटिस : नाक के आसपास के साइनस की सूजन की वजह से।
उच्च रक्तचाप : बहुत तेज़ सिर दर्द का कारण बन सकता है।
सिर में चोट : कोई दुर्घटना या चोट लगने के बाद।
मस्तिष्क संक्रमण या ट्यूमर: बहुत गंभीर मामलों में।
सिर दर्द में बरतनी चाहिए सावधानियां
सिर दर्द की समस्या से निपटने के लिए कुछ महत्वपूर्ण सावधानियां और उपाय हैं जो हर प्रकार के सिर दर्द में मददगार होते हैं।
🌹 गुरु भक्ति योग 🌸
कांवड़ यात्रा की परंपरा और इतिहास बहुत प्राचीन और आध्यात्मिक महत्व से भरी हुई है। यह परंपरा सीधे तौर पर भगवान शिव, पवित्र गंगा नदी और श्रावण मास से जुड़ी हुई है। नीचे विस्तार से जानिए कि कांवड़ यात्रा की शुरुआत कैसे हुई और इसका इतिहास क्या है शिव पुराण, स्कंद पुराण और अन्य ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है।
🪅🪅समुद्र मंथन की कथा:~🪅🪅
जब देवताओं और दैत्यों ने मिलकर समुद्र मंथन किया था, तब हलाहल विष निकला। उस भयानक विष को जब कोई धारण नहीं कर पाया, तब भगवान शिव ने उसे पी लिया।
विष को पी लेने से उनका शरीर अत्यंत गर्म हो गया। इस गर्मी को शांत करने के लिए देवताओं और भक्तों ने पवित्र गंगाजल अर्पित किया।
‌ तभी से मान्यता बनी कि गंगाजल शिव को शीतलता प्रदान करता है, और उसे अर्पित करने से भक्तों को पुण्य की प्राप्ति होती है।
👣👣👣👣पहली कांवड़ यात्रा:~ 👣👣👣👣👣
मान्यता है कि भगवान परशुराम ने सर्वप्रथम गंगाजल लाकर शिवलिंग पर चढ़ाया था। तभी से गंगाजल लाकर भगवान शिव पर अर्पित करने की परंपरा शुरू हुई, जिसे “कांवड़ यात्रा” कहा गया।
कांवड़ यात्रा एक विशेष धार्मिक पदयात्रा है जो श्रावण मास में भगवान शिव की आराधना हेतु होती है। इसमें श्रद्धालु पवित्र गंगाजल को हरिद्वार, गंगोत्री, या गौमुख से लाकर अपने स्थानीय शिवलिंग पर अर्पित करते हैं। ये श्रद्धालु “कांवड़िए” कहलाते हैं, और अपने कंधे पर कांवड़ (एक बांस जिसमें दोनों तरफ कलश लटकते हैं) रखकर कई सौ किलोमीटर की यात्रा करते हैं। यह यात्रा विशेष रूप से उत्तर भारत में अत्यंत लोकप्रिय है।
🤔🤔इसकी पौराणिक उत्पत्ति क्या है?
कांवड़ यात्रा का संबंध समुद्र मंथन से जुड़ी उस घटना से है जब भगवान शिव ने हलाहल विष पीकर संसार को बचाया था। इससे उनका शरीर अत्यधिक गर्म हो गया था, जिसे शांत करने के लिए देवताओं ने गंगाजल अर्पित किया। तभी से यह परंपरा बन गई कि श्रावण मास में गंगाजल लाकर शिवलिंग पर चढ़ाना परम पुण्य माना जाता है। सबसे पहले यह कार्य भगवान परशुराम ने किया था, ऐसा लोकमत है।
प्रशासनिक आयोजन में बदल गई है। आज यह विश्व की सबसे बड़ी पैदल तीर्थयात्राओं में से एक बन चुकी है, जिसमें करोड़ों लोग भाग लेते हैं और सरकार को इसके लिए विशेष प्रबंध करने पड़ते हैं।
वर्तमान में बदलता स्वरूप कांवड़ यात्रा में आज जहां एक ओर भक्ति भाव है, वहीं दूसरी ओर प्रदर्शन, ध्वनि प्रदूषण, सड़क जाम और अनुशासनहीनता जैसे कई व्यवहारिक समस्याएं भी हैं। कहीं-कहीं यह एक धार्मिक कर्तव्य की जगह उत्सव, फैशन और शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बनती जा रही है। इसका स्वरूप सत्संग, संयम और साधना से हटकर बाहरी रूपों की ओर अधिक झुक गया है।
संत रामपाल जी महाराज का दृष्टिकोण संत रामपाल जी महाराज कांवड़ यात्रा के आध्यात्मिक पक्ष को शास्त्रों के आधार पर उजागर करते हैं। वे बताते हैं कि गंगाजल अर्पण से शिव प्रसन्न होते हैं — यह धारणा शास्त्रों में प्रत्यक्ष रूप से प्रमाणित नहीं है। गीता अध्याय 16 के श्लोक 23–24 के अनुसार कोई भी पूजा विधि यदि शास्त्र के विरुद्ध है, तो वह निरर्थक है। उन्होंने बताया कि गंगाजल चढ़ाने से मोक्ष नहीं मिलता, बल्कि शास्त्रानुकूल भक्ति से ही मुक्ति संभव है।
वास्तविक शिव आराधना क्या है? संत रामपाल जी महाराज स्पष्ट करते हैं कि “शिव” का वास्तविक अर्थ है –कल्याणकारी परमात्मा, और वे केवल काल देवता नहीं, बल्कि पूर्ण ब्रह्म कबीर साहेब ही हैं। कबीर साहेब स्वयं शिवरूप में प्रकट होकर संसार को सही भक्ति मार्ग बताते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि केवल गंगा जल चढ़ाकर नहीं, बल्कि पूर्ण सतगुरु से नाम दीक्षा लेकर, नशा-मुक्त, सत्य और संयमपूर्ण जीवन जीकर ही आत्मा का कल्याण संभव है।
परंपरा से आगे सत्य की ओर कांवड़ यात्रा श्रद्धा का प्रतीक है, लेकिन अगर इसे आध्यात्मिक जागरूकता के साथ न जोड़ा जाए, तो यह केवल एक परंपरा बनकर रह जाएगी। संत रामपाल जी महाराज का संदेश है कि हर धार्मिक कार्य शास्त्र विधि से होना चाहिए, तभी वह लाभकारी है। हमें केवल बाहरी कर्मकांड नहीं, बल्कि तत्त्वज्ञान, सतगुरु की शरण और सच्चे नाम की भक्ति अपनानी चाहिए, तभी परमेश्वर प्रसन्न होंगे और आत्मा को मुक्ति मिलेगी।
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⚜️ चतुर्दशी तिथि को भगवान शिव का ज्यादा-से-ज्यादा पूजन, अर्चन एवं अभिषेक करना करवाना चाहिये। सामर्थ्य हो तो विशेषकर कृष्ण पक्ष कि चतुर्दशी तिथि को विद्वान् वैदिक ब्राह्मणों से विधिवत भगवान शिव का रुद्राभिषेक करवाना चाहिये। आज चतुर्दशी तिथि में भगवान् शिव का रुद्राभिषेक यदि शहद से किया करवाया जाय तो इससे मारकेश कि दशा भी शुभ फलदायिनी बन जाती है। जातक के जीवन कि सभी बाधायें निवृत्त हो जाती है और जीवन में सभी सुखों कि प्राप्ति सजह ही हो जाती है।

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