भाजपा की ना और कांग्रेस की हां के बीच सिहोरा जिला मुद्दे पर चुनावी संग्राम जारी
रिपोर्टर : सतीश चौरसिया
उमरियापान । जहाँ अन्य विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर की बयान बाजियों की गिरफ्त में है वही सिहोरा विधानसभा चुनाव इन मुद्दों से अलग सिहोरा के सम्मान के नाम पर लड़ा जा रहा है। सिहोरा जो कभी मध्य प्रदेश की सबसे बड़ी तहसील होने का गौरव रखती थी अब वहां के वासियों ने सिहोरा जिला को सिहोरा जिला की अस्मिता के साथ जोड़ लिया है। परिणाम यह है कि अब संपूर्ण सिहोरा में संपूर्ण देश और राष्ट्र के किसी भी विषय का कोई असर होता नहीं दिख रहा है यहां अब केवल अपनी मातृभूमि सिहोरा के खोए अस्तित्व के लिए ही वोट पड़ने की संभावनाएं दिख रही है।
सिहोरा की चुनावी माहौल को देखें तो एक तरफ भाजपा राष्ट्रीय बिंदुओं को उठाकर चुनाव को मोदी शिवराज में केंद्रित करने का प्रयास कर रही है वही कांग्रेस सिहोरा को जन्मभूमि कर्मभूमि बताते हुए उसके सम्मान की रक्षा की दुहाई देती हुई दिख रही है।
क्या है वास्तविकता-
सिहोरा के इतिहास को देखें तो सिहोरा कभी प्रदेश ही नहीं देश की सबसे बड़ी तहसील होने का गौरव रखती थी। कालांतर में बहोरीबंद, ढीमरखेड़ा और मझौली के इससे विखंडित होने के कारण इसका अस्तित्व जाता रहा। तब तत्कालीन सत्ता में रही कांग्रेस ने वर्ष 2001 में सिहोरा को जिला बनाने की घोषणा की और 2003 तक जिला बनाने की संपूर्ण प्रक्रिया को पूर्ण कर लिया। लेकिन 1 अक्टूबर 2003 की कैबिनेट में मंजूरी मिलने के बाद लगी विधानसभा की आचार संहिता के चलते सिहोरा जिला की अंतिम अधिसूचना जारी नहीं हो पाई और उसके बाद मध्य प्रदेश में आई भाजपा की सरकार की सरकार ने सिहोरा जिले के मुद्दे को कांग्रेस का मुद्दा मानकर सदैव इससे किनारा किया। वहीं अब सिहोरावासी मान रहे हैं कि अगर 2003 में सिहोरा जिला बन गया होता तो आज सिहोरा की स्थिति कुछ और होती।



