प्राचीन ऐतिहासिक गौडवाना शासन काल की धरोहर गौडझामर का किला, इसी से नगर का नाम गौरझामर पडा

रिपोर्टर : कुंदनलाल चौरसिया
गौरझामर । मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र के हृदय स्थल सागर जिले के प्राचीन बावन गढो मे से एक गढ ऐतिहासिक गौडझामर नगर अंग्रेज शासन काल के पूर्व गौड राजाओ की रियासत रहा है प्राचीन धरोहर के रुप मे आज यह विशाल किला नगर के मध्य करन्जुआ नदी के तट पर स्थित है भले ही पुरातत्व विभाग इस विरासत को संरक्षण मे लेकर सुरक्षा का दम्भ भर रहा हो लेकिन हकीकत सामने है कुछ दशक पूर्व पुरातत्व विभाग ने इस किले कि खुदाई कराई थी इस बृहद खनन से किले के अन्दरुनी ढके वैभव को खोद निकाला है बुजुर्ग लोग बताते है की गौरझामर के इस किले का स्वरूप साठ व सत्तर के दशक तक ठीकठाक यानि अपना पूरा वैभव लिये हुए था लोग बताते है की इसके उत्तर दिशा के प्रमुख प्रवेश व्दार बुर्ज के पास बीचो बीच बडा व मजबूत नक्काशीदार व्दार तथा आजू बाजू दो छोटे व्दार हुआ करते थे जो बेहद आकर्षक थे जो अब नही है शनैशनै खंडहर मे तब्दील होते इस ऐतिहासिक किले को पुरातत्व विभाग बचाने की नाकाम कोशिश कर रहा है लोगो का कहना है यदि किले के अन्दर तब इतवारा बाजार लगाने की अनुमति नही दी गई होती और शासकीय हाई स्कूल नही खोलने दिया जाता तो आज गौरझामर की यह विरासत इस हालत मे खंडहर की बजाय पूरी तरह सुरक्षित होती, फिलहाल अतीत की यादगार के रुप मे जो अवशेषी किला विधमान है उसको कडी सुरक्षा की आवश्यकता है पुरातत्व विभाग ने इसकी खुदाई मे काफी कुछ दफन भूमिगत संरचना को ढूढने मे सफलता प्राप्त की है जो किले अंदर दिग्दर्शन से स्पष्ट हैं, 52 गढो में से एक गढ़ गौरझामर को पूर्व में उजड़ गढ़ के नाम से जाना जाता था यहां गोंड शासको का राज हुआ करता था गौरझामर का नाम सबसे पुराना नाम पहले गौड शासन काल में ऊजरगढ था फिर इसका नाम बदलकर गौड झामर हो गया गुलाम भारत में अंग्रेजी शासन काल के दौरान इस नगर का नाम गौरझामर पड़ा गौड शासन काल में तब इस रियासत के अंतिम राजा रतनसिंह गौड़ थे जिसका उल्लेख व नाम ओरछा की शिलालेख में दर्ज हैं गौरझामर गुगवारा गांव की बीच से निकली करंजुआ नदी जो दोनों नगरों को विभाजित करती है इसी नदी के तट पर गौरझामर का प्राचीन ऐतिहासिक किला शानोशोकत के साथ खडा है जो अनेकों दन्तकथाओं सत्य कथाओं से भरा पड़ा है किले की वैभवशाली स्वरूप को देखने से लगता है कि यह कभी काफी समृद्ध शाली राजशाही दरबार रहा है जो आज भी पुरात्वशेष के रुप मे पूरे शानो शौकत के साथ सीना ताने खड़ा प्राचीन गौरव को प्रदर्शित कर रहा है पुरातत्व विभाग द्वारा किले की देखरेख व जीर्णोध्दार ठीक से नहीं करने के कारण यह धीरे-धीरे खंडहर में बदलता जा रहा है उल्लेखनीय है कि किले की चारों दिशाओं में चार बारहमासी कुए बावड़ी हैं जो आज भी अथाह जल से भरे हुए हैं, पुराने समय में किले के निर्माण के समय बताते हैं की सुरक्षा की दृष्टि से राजा महाराजा किले से बाहर जाने के लिए किले के अन्दर गुप्त मार्ग बनाकर रखा करते थे गौरझामर की किले में भी ऐसा ही एक गुप्त मार्ग करन्जुंआ व सुनारनदियो के नीचे से भूमिगत अनीरा बाबा की पहाड़ी का जाता है जिसके अवशेष आज भी विद्यमान हैं बताते हैं कि किले की अंदरूनी दफन बनावट को उजागर करने के लिए पुरातत्व विभाग द्वारा एक दशक पूर्व वृहद खुदाई कराई गई थी जिसमें इसके भूमिगत दबे हुए हिस्से को खोज निकाला गया था किला आज भी सैलानियों पर्यटकों के लिए देखने लायक है इसका यदि सही बंदोबस्त किया जाता है तो यह विरासत को लंबे समय तक संजोकर रखा जा सकता है।



