मध्य प्रदेश

शहीद-ए-आजम अशफाक उल्ला खान ने अंग्रेजों की नाक में किया था दम, 27 साल की उम्र में हुए थे शहीद : एड. चांद मियां

ब्यूरो चीफ : शब्बीर अहमद
बेगमगंज ।
शहीद-ए-आजम अशफाक उल्ला खान की यौमे पैदाइश पर सामाजिक संस्था इस्लाही मिल्लत कमेटी द्वारा एक कार्यक्रम आयोजित किया गया जिसमें उनकी जिंदगी के बारे में बुद्धिजीवियों द्वारा प्रकाश डाला गया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि वरिष्ठ अधिवक्ता चांद मियां ने बताया कि
अंग्रेजी शासन से देश को आजाद कराने के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले अशफाक उल्ला खान की आज 122 वीं जयंती है। अशफाक उल्ला खां भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के प्रमुख क्रान्तिकारियों में से एक थे। भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास में बिस्मिल और अशफाक की भूमिका निर्विवाद रूप से हिन्दू-मुस्लिम एकता का बेजोड़ उदाहरण है। अशफाक उल्ला खां का जन्म 22 अक्टूबर 1900 में उत्तर प्रदेश में शाहजहांपुर जिले के ‘शहीदगढ़’ में हुआ था। उनके पिता का नाम पठान शफीक उल्लाह खान और माता का नाम मजहूरुन्निशा था। पुलिस विभाग में कार्यरत शाफिक उल्लाह खान के 4 बेटों में सबसे छोटे थे अशफाक। परिवार के सभी लोग सरकारी नौकरी में थे, लेकिन अशफाक बचपन से ही देश के लिए कुछ करना चाहते थे। वह स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ कविता भी लिखते थे, उन्हें घुड़सवारी, निशानेबाजी और तैराकी का भी शौक था।
रिटायर्ड शिक्षक सैयद आबिद हुसैन तालिब ने उनकी जिंदगी के विभिन्न पहलुओं पर रोशनी डालते हुए बताया की शहीद अशफाक ने 25 साल की उम्र में अपने क्रांतिकारी साथियों के साथ मिलकर ब्रिटिश सरकार की नाक के नीचे से सरकारी खजाना लूट लिया था। इस घटना के बाद से पूरी ब्रिटिश सरकार को मुंह की खानी पड़ी थी। इस घटना को ‘काकोरी कांड’ से जाना जाता है। जिसके लिए ब्रिटिश शासन ने उनके ऊपर अभियोग चलाया और 19 दिसम्बर सन 1927 को उन्हें फैजाबाद जेल में फांसी पर लटका दिया गया। उनकी याद में उप्र फैजाबाद जेल में अमर शहीद अशफाक उल्ला खां द्वार बना हुआ है।
सपा जिला अध्यक्ष मुन्ना अली दाना ने अपने उद्बोधन में कहा कि शहीद अशफाक उल्ला खान ने काकोरी काण्ड में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। शहीद अशफाक उल्ला खान पं रामप्रसाद बिस्मिल के काफी करीब थे। मैनपुरी षड़यंत्र के मामले में शामिल रामप्रसाद बिस्मिल से उनकी दोस्ती हुई और वे भी क्रांति की दुनिया में शामिल हो गए। पहली ही मुलाकात में बिस्मिल अशफाक से बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने उन्हें अपनी पार्टी ‘मातृवेदी’ का सक्रिय सदस्य बना लिया। दोनों अच्छे दोस्त होने के साथ ही अच्छे शायर भी थे। उनका उर्दू तखल्लुस उपनाम ‘हसरत’ था। उर्दू के अतिरिक्त वे हिन्दी व अंग्रेजी में आलेख व कविताएं करते थे। अशफाक-उल्ला-खान की रचना ‘कस ली है कमर अब तो, कुछ करक दिखाएंगे, आज़ाद ही हो लेंगे, या सर ही कटा देंगे’ काफी चर्चित है।
कार्यक्रम में अन्य वक्ताओं ने भी अपने विचार व्यक्त करते हुए लोगों में देशभक्ति की भावना को जगाया अंत में आभार अध्यक्ष हाफिज मो. इलयास ने व्यक्त किया।

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