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राहुल गांधी! अनंत यात्रा ” बपौती ” से ” पनौती ” तक…

दिव्य चिंतन : हरीश मिश्र : लेखक ( स्वतंत्र पत्रकार ) स्वरदूत क्रमांक ९५८४८१५७८१
राहुल गांधी की अनंत यात्रा बपौती से पनौती तक सतत् जारी है। राजनैतिक दल किसी परिवार की बपौती नहीं होते। लेकिन कांग्रेस में बपौती का, पांव के अंगूठे से राजतिलक किया जाता है। इसीलिए कांग्रेस अपने विरोधी दल, भाजपा और उसके शीर्ष नेतृत्व को एक दशक से चुनौती नहीं दे पा रही है।
भाजपा यह मानती है यह छोटी पनौती उसके लिए शुभ है। ज्योतिष शास्त्रों के अनुसार छोटी पनौती जन्म राशि से चौथे और अष्टम भाव में शनि के आगमन से लगती है । यह केवल ढैय्या वर्ष की होती है। लेकिन कांग्रेस को विरासत में ऐसी पनौती मिली जिससे उसे छुटकारा ही नहीं मिल रहा। इतिहास में बड़े-बड़े राजकुमार इसी कारण असफल होते देखे गए हैं क्योंकि वह चांदी की चम्मच लेकर पैदा होते हैं।
राहुल गांधी ! भोले हैं, सहज हैं, सरल हैं। वह चांदनी रात में, चांदनी चौक में, चांदी की चम्मच लेकर राजमहल में पैदा हुए। विरासत में खानदान का नाम और शोहरत तो मिल सकती है ,लेकिन नेतृत्व करने का गुण नहीं मिल सकता। वे न जनता की तकलीफों को समझते हैं, न भावनाओं को और ना ही हवा के रुख को। राहुल राजनीति के लिए नहीं बने। उनके अंदर नेतृत्व क्षमता की कमी है । वह संगठन के निष्ठावान कार्यकर्ताओं की उपेक्षा करते हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी राजमहल के चौकीदारों को पद देकर सम्मानित करते हैं ।
वे दिमाग की जगह दिल का प्रयोग करते हैं। संगठन का महत्त्व नहीं समझते अथवा उसके अनुरूप अपनी योजनाएं नहीं बना पाते ।उनकी स्वयं की प्रगति शून्य है और कांग्रेस के लिये बड़ी पनौती बन गए हैं।
राजनीति में भोला व्यक्ति नेतृत्व क्षमता के अभाव में बड़ी पनौती बन जाता है। ऐसी पनौती का उपचार एक ही है कि संगठन का नेतृत्व, दल के किसी योग्य व्यक्ति के हाथों में सौंपा जाए।
इस तथ्य को खिलाड़ियों की टीम के माध्यम से स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। कोई भी खिलाड़ी अपने आप में बहुत अच्छा हो सकता है, किन्तु टीम की मजबूती इतने भर से नहीं बनती । उसमें हर स्थान पर खेलने वाले खिलाड़ी चाहिए । यही नहीं उन्हें परस्पर ताल-मेल बैठाने, एक-दूसरे के पूरक और सहायक बनने का उच्च स्तरीय अभ्यास भी आवश्यक है। दल भी एक टीम है। टीम में टोली-भावना का विकास नेतृत्वकर्ता ही पैदा करता है। टीम के हर सदस्य को खेलना पड़ता है, तभी टीम जीतती है । संगठन में खेल भावना को सतत् विकसित किया जाना आवश्यक है नहीं तो नेतृत्व का अभाव दल की प्रगति में सदा रुकावट बना ही रहेगा। दल की जीत नेतृत्व के आधार पर ही होती है। जिस दल का नेतृत्व ही अपने संगठन के लिए पनौती कारक हो, उस दल को कोई नहीं जिता सकता।

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