द्वारकाधीश ने चार मुट्ठी चावल में सुदामा जी के लिए त्रिलोक की संपदा दे दी : पंडित अभिषेक शास्त्री

सिलवानी । नगर के वार्ड एक रानीपुरा रोड में चल रही श्रीमद् भागवत महापुराण के सप्तम दिवस रविवार को कथा व्यास अभिषेक शास्त्री ने बताया कि भगवान श्री कृष्ण के 16108 विवाह हुए विवाह के बाद में सुदामा चरित्र बतलाया गया सुदामा चरित्र के माध्यम से बताया गया आपकी चाहे व्यक्ति के जीवन में चाहे जैसी परिस्थिति आ जाए पर व्यक्ति को भगवान का भजन करना नहीं छोड़ना चाहिए, भगवान श्री कृष्ण ने सुदामा जी महाराज की कितनी परीक्षा ली उसके बाद भी सुदामा जी महाराज ने भगवान का भजन करना नहीं छोड़ा कथा के माध्यम से बताया गया है हर इंसान को ब्राह्मण की सेवा करना चाहिए तीनों लोगों का पालन करता द्वारकाधीश किस तरह से ब्राह्मण की सेवा करते हैं जब सुदामा जी महाराज ने द्वारकाधीश के लिए चार मुट्ठी चावल दिया तो द्वारकाधीश वह चार मुट्ठी चावल में सुदामा जी महाराज के लिए त्रिलोक की संपदा दे दी आगे जाकर के गुरु की महिमा बतलाई गई कि व्यक्ति को अपने जीवन में गुरु अवश्य बनाना चाहिए गुरु के बिना जीवन अधूरा है गुरु के बिना भगवान की प्राप्ति भी नहीं होती है आगे जाकर के कलयुग का वर्णन किया गया कैसा घोर कलयुग आएगा आगे जाकर के कलयुग में मनुष्य की आयु केवल 12 वर्ष रहेगी जब ऐसा घोर कलयुग आएगा जो व्यक्तियों से घोर कलयुग में अपना उद्धार करना चाहता है तो अपने उद्धार के लिए मंत्र एक ही उपाय है कि कलयुग में रहकर मानव तन प्राप्त करने के बाद में व्यक्ति भगवान का भजन करें आगे जाकर के बताया गया है की परीक्षित जी महाराज ने 7 दिन बैठकर के गंगा के तट पर यही भगवान की श्रीमद् भागवत महापुराण की कथा को श्रवण किया और जब 7 दिन तक बैठकर गंगा के तट पर परीक्षित जी महाराज ने इस कथा को श्रवण किया इस गंगा में स्नान किया तो परीक्षित जी महाराज का उद्धार हो गया।
रविवार को समापन के पूर्व मंदिर परिसर में पंडित प्रशांत मुखरैया के आचार्यत्व में पूर्णाहुति हवन किया गया। अंत में भोजन प्रसादी भंडारे किया गया।
अंत में आयोजक सिंहवाहनी दरबार के पंडा विनोद वर्मा एवं मंदिर समिति ने सभी दानदाताओ और श्रद्धालुओ का आभार व्यक्त किया।


