नर्मदा नदी बरमान मे प्रतिमाओं के विसर्जन हेतु सम्मानजनक व्यवस्था बनायें

प्रशासन एवं कलेक्टर नरसिहपुर से की गई मांग
गौरझामर । हिंदु सनातन धर्माबलम्बियो के पुनीत पावन व परम्परागत वार्षिक धार्मिक त्यौहार नवरात्रि मे दुर्गा जी व गणेशोत्सव मे गणेश जी की प्रतिमाओं को पूर्णाहूति के बाद नदी तालाबो मे विसर्जन करने का धार्मिक विधान प्राचीन काल से ही चला आ रहा है। इसी मान्यता व परम्परा को मानते हुए श्रृध्दालु नर्मदा नदी मे प्रतिमाओ को बिसर्जन करने गौरझामर, सुरखी, सागर, देवरी, महाराजपुर आदि स्थानो से सैकडो की संख्या मे बाजे गाजे डीजे के साथ धूम-धाम से बरमान घाट ले जाते है लेकिन देखा जाता है कि बरमान मे प्रतिमाओ के सम्मान जनक विसर्जन मे पुलिस व प्रशासन व्दारा अडंगे डालकर प्रतिमाओ को विसर्जन करने नही दिया जाता, यहां पुलिस व्दारा न्यायालय के आदेश की दुहाई दी जाती है जिसमे कहा जाता है की कैमिकल व प्लास्टर आफ पेरिस आदि से बनी हुई मूर्तियो के जल मे विसर्जन से पानी दूषित होता है, इसमे लोगो का कहना है की बरमान के मुख्य घाट पर अब प्रतिमाओ के विसर्जन व प्रवाहित करने की परम्परा को पूरी तरह बन्द करके वहां पर अब प्रतिमाओ को सिर्फ विसर्जन करने की व्यवस्था बनाई जावे, इसके लिये घाट पर क्रेन के माध्यम से तराजु बनाकर उस पर एक एक करके प्रतिमा को रखकर पहले सम्पूर्ण रूप से डुबाकर विसर्जन किया जावे तत्पश्चात तुरन्त ही उसे निकाल कर नदी में बहाने प्रवाहित करने की बजाय डम्फर मे रखते जावे फिर डम्फर मे एकत्र सभी विसर्जित हुई प्रतिमाओ को कही अच्छी जगह पर ले जाकर डम्फर को खाली कर दिया जावे। इस तरह प्रतिमाये धार्मिक भक्ति भावना से विसर्जित भी हो जावेगी और नदी का पानी भी दूषित नही होगा, देखा जाता है की कोर्ट के आदेश का पालन यहां पर लकीर के फकीर बनकर किया जाता है जबकि उसका हल या विकल्प नही खोजते, जिससे सांप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे, कलेक्टर सागर व नरसिहपुर से आग्रह है की वह इस बार सुझाये गये प्रयोग को जरुर ही अमल मे लाये जिससे मूर्तियो का विसर्जन धार्मिक भक्ति भावना से हो सके इसमें हर साल मूर्ति विसर्जन मे आ रही परेशानी से मुक्ति मिलेगी और बरमान घाट की रोनकता चहल पहल नई व्यवस्था से वापस आ जावेगी। यहां बतादें की सभी मूर्तियो मे व्याप्त भक्ति की शक्ति प्राण प्रतिष्ठा भजन कीर्तन अनुष्ठान व नौ दिनो का तेज प्रताप को नदियो मे विसर्जन करके किया जाता है जो अनादिकालीन धार्मिक परम्परा है जिसका धार्मिक विधि से सम्मान होना आवश्यक है। अधिकारी इस ओर शीघ्र ध्यान देकर इस पर अमल करे ।



