पहले टूटेगा कौन… आमरण अनशन या सत्ता का मौन ?

दिव्य चिंतन : हरीश मिश्र, ( लेखक स्वतंत्र पत्रकार )
लोकतंत्र में आमरण अनशन किसी सामाजिक कार्यकर्ता की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी लोकतांत्रिक ताकत है।
7, रेस कोर्स रोड का नाम बदलकर लोक कल्याण मार्ग इसलिए रखा गया था कि प्रधानमंत्री के आधिकारिक आवास का पता भारतीय संस्कृति और जनकल्याण की भावना का प्रतीक बने। किंतु विडंबना तब होती है, जब आम आदमी, छात्र और किसान की आवाज़ लोक कल्याण मार्ग तक पहुँच ही नहीं पाती…जब सत्ता को अपने ही नागरिकों का दर्द दिखाई नहीं देता; जब संवाद के द्वार बंद हो जाते हैं और व्यवस्था केवल सुनने का अभिनय करती है। तब कोई सत्याग्रही…चाहे वह अन्ना हज़ारे हों या सोनम वांगचुक…अपने शरीर को ही देश की पीड़ा का संदेशवाहक बना लेता है।
यही सत्याग्रह की परंपरा है। बात 2011 की हो या 2026 की, प्रश्न हर बार एक ही उठता है…क्या सत्ता संवाद करेगी?
आज प्रश्न केवल सोनम वांगचुक का नहीं है। प्रश्न यह है कि सत्ता में बैठे लोग अपने असहमत नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं। क्योंकि हर असहमत आवाज़ “आतंकवादियों की बी-टीम” नहीं होती। असहमति लोकतंत्र का दोष नहीं, उसका स्वभाव है। जहाँ असहमति को संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगे, वहाँ लोकतंत्र धीरे-धीरे अपनी आत्मा खोने लगता है।
सत्ता की सबसे बड़ी शक्ति उसका बहुमत नहीं, उसकी संवेदनशीलता होती है। बहुमत सरकार बना सकता है, लेकिन संवाद ही लोकतंत्र को महान बनाता है।
इतिहास साक्षी है कि जब-जब सरकारों ने जनभावनाओं और असहमति को अनसुना किया, तब-तब जनता ने लोकतांत्रिक ढंग से अपना उत्तर दिया। मनमोहन सिंह सरकार के समय भी जनआक्रोश ने राजनीतिक परिवर्तन की पृष्ठभूमि तैयार की थी। इतिहास किसी एक दल का नहीं होता; वह हर सत्ता को समान चेतावनी देता है।
किसी भी आमरण अनशन का उद्देश्य सरकार को झुकाना नहीं, बल्कि उसके अंतःकरण को जगाना होता है। शोले का वह प्रसिद्ध दृश्य याद आता है, जब धर्मेंद्र पानी की टंकी पर चढ़कर अपनी बात मनवाने का प्रयास करता है। उसका उद्देश्य मौसी को हराना नहीं, बल्कि उसकी संवेदना जगाना था। संवाद हुआ, समाधान निकला और टकराव टल गया।
लेकिन लोकतंत्र कोई फिल्म नहीं है। यहाँ यदि संवाद की जगह मौन और संवेदनशीलता की जगह अहंकार ले ले, तो परिणाम किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहते।
आज संघर्ष किसी छात्र, सामाजिक कार्यकर्ता या सरकार के बीच नहीं है। संघर्ष संवाद और मौन के बीच है।
आज देश देख रहा है कि पहले कौन टूटेगा…एक सत्याग्रही का शरीर या सत्ता का मौन ? यदि मौन टूटा, संवाद शुरू हुआ और समाधान की दिशा बनी, तो जीत किसी व्यक्ति या संगठन की नहीं, लोकतंत्र की होगी। लेकिन यदि संवाद की जगह अहंकार ने ले ली, तो हार भी किसी एक की नहीं होगी…हार लोकतांत्रिक संस्कृति की होगी।
लोकतंत्र की आत्मा आदेशों से नहीं, संवाद से जीवित रहती है। सत्ता बदलती रहती है, लेकिन लोकतांत्रिक परंपराएँ पीढ़ियों तक राष्ट्र का चरित्र गढ़ती हैं। इसलिए समय की पुकार स्पष्ट है…मौन नहीं, संवाद; टकराव नहीं, समाधान; अहंकार नहीं, लोकतंत्र।
याद रखिए…लोकतंत्र में सबसे खतरनाक शोर विपक्ष का नहीं होता, सबसे खतरनाक मौन सत्ता का होता है।



