हवन-पूजन एवं भंडारे के साथ सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा का समापन

सिलवानी। नगर के अंबेडकर मंगल भवन में आयोजित सात दिवसीय संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा का शनिवार को हवन-पूजन एवं पूर्णाहुति के साथ समापन हुआ। कथा व्यास पंडित बलराम दीक्षित ने सात दिनों तक भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं, भक्तों की महिमा, धर्म-अधर्म, गुरु के महत्व और मानव जीवन के आदर्शों का भावपूर्ण वर्णन किया। कथा के अंतिम दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने कथा श्रवण कर धर्मलाभ प्राप्त किया। समापन अवसर पर नगर भंडारे का आयोजन किया गया, जिसमें श्रद्धालुओं ने प्रसादी ग्रहण की।
भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं और सुदामा चरित्र का वर्णन
कथा व्यास पंडित बलराम दीक्षित ने भगवान श्रीकृष्ण के 16 हजार 108 विवाहों का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि भगवान सामर्थ्यवान हैं और उनकी लीलाएं सामान्य मानवीय दृष्टि से नहीं समझी जा सकतीं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि सूर्य संसार के समस्त विकारों को अपने भीतर समाहित करने के बावजूद अपनी पवित्रता बनाए रखता है, वहीं अग्नि प्रत्येक वस्तु को भस्म कर देती है। इसी प्रकार परमात्मा की लीलाएं उनकी दिव्य सामर्थ्य को प्रकट करती हैं।
कथा के विश्राम दिवस पर उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता का भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने कहा कि सच्ची मित्रता निस्वार्थ भाव पर आधारित होती है। भगवान श्रीकृष्ण ने अपने आचरण से संसार को सिखाया कि मित्रता में ऊंच-नीच, धन-दौलत और पद-प्रतिष्ठा का कोई स्थान नहीं होता। सच्चा मित्र वही है, जो विपरीत परिस्थितियों में भी साथ निभाए।
कलियुग में सदाचार और धर्म का महत्व
पंडित दीक्षित ने कलियुग के स्वरूप का वर्णन करते हुए कहा कि समय के साथ अधर्म बढ़ेगा, रिश्तों का महत्व कम होगा और मानवीय मूल्यों का पतन होगा। ऐसी परिस्थितियों में भी जो व्यक्ति सदाचार अपनाएगा, धर्म के मार्ग पर चलेगा और भगवान का स्मरण करेगा, वही अपने जीवन को सार्थक बना सकेगा।
उन्होंने भगवान विष्णु के कल्कि अवतार का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कलियुग के अंत में भगवान विष्णु कल्कि अवतार लेकर अधर्म का नाश करेंगे और धर्म की पुनः स्थापना करेंगे।
गुरु ही अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है
कथा व्यास ने गुरु की महिमा का वर्णन करते हुए भगवान दत्तात्रेय के 24 गुरुओं का प्रसंग सुनाया। उन्होंने कहा कि मनुष्य प्रकृति और जीवन के प्रत्येक अनुभव से शिक्षा ग्रहण कर सकता है। भगवान दत्तात्रेय ने चींटी सहित अनेक जीवों और प्राकृतिक तत्वों से भी सीख लेकर उन्हें अपना गुरु माना।
उन्होंने कहा कि सच्चा गुरु वही है, जो अपने शिष्य को अज्ञान रूपी अंधकार से निकालकर ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाए। गुरु ही शिष्य को गोविंद तक पहुंचने का मार्ग दिखाता है। इसलिए जीवन में सद्गुरु का विशेष महत्व है।
भागवत कथा श्रवण से होता है कल्याण
पंडित बलराम दीक्षित ने राजा परीक्षित और शुकदेव जी के प्रसंग के माध्यम से मोक्ष का महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि श्रीमद्भागवत केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि वेदों का सार है, जो मनुष्य को जीवन जीने की सही दिशा प्रदान करता है। भागवत कथा के श्रवण से मनुष्य के विचारों में पवित्रता आती है और उसे धर्म, भक्ति तथा सदाचार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है।
उन्होंने पितरों की शांति एवं सद्गति के लिए भी भागवत कथा के महत्व पर प्रकाश डाला और श्रद्धालुओं से धर्म-कर्म, सेवा तथा सदाचार को अपने जीवन में अपनाने का आह्वान किया।
हवन-पूजन के बाद हुआ नगर भंडारा
सात दिवसीय कथा के समापन अवसर पर विधि-विधान से हवन-पूजन एवं पूर्णाहुति की गई। इसके पश्चात समस्त सनातन समाज के सहयोग से नगर भंडारे का आयोजन हुआ। श्रद्धालुओं ने प्रसादी ग्रहण कर पुण्यलाभ प्राप्त किया।
कथा के आयोजकों में तुलाराम कुशवाहा, छोटेलाल कुशवाहा, धन्नूलाल कुशवाहा, हरिप्रसाद कुशवाहा, हल्कन कुशवाहा, कालूराम कुशवाहा, गणेश प्रसाद कुशवाहा, मूलचंद कुशवाहा एवं रवि मेहरा सहित अन्य श्रद्धालुओं का सहयोग रहा।



