जयना रे चरणा रे के भावों में डूबा चैत्यालय, बसंतजी महाराज ने बताया जिनवाणी का मर्म

सिलवानी । नगर के तारण तरण जैन चैत्यालय में रविवार को आयोजित आध्यात्मिक प्रवचन एवं भक्ति कार्यक्रम श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा से ओत-प्रोत रहा। इतिहास रत्नाकर, अध्यात्म रत्न, बाल ब्रह्मचारी बसंतजी महाराज ने हारमोनियम, झांझ और मंजीरों की मधुर स्वर लहरियों के बीच मंदिर विधि की फूलनाओं एवं गाथाओं का सस्वर उच्चारण कराया। उनके साथ उपस्थित समाजजनों ने भी पूरे भाव और श्रद्धा के साथ इनका सामूहिक पाठ किया, जिससे चैत्यालय का वातावरण भक्तिमय हो उठा।
प्रवचन के दौरान बसंतजी महाराज ने जयना रे – चरणा रे शब्दों का व्यापक आध्यात्मिक अर्थ समझाते हुए कहा कि यह केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि आत्मा को सत्य,संयम और सम्यक मार्ग की ओर अग्रसर करने का संदेश है। उन्होंने कहा कि जब श्रद्धा, ज्ञान और भक्ति का समन्वय होता है, तभी जीवन में वास्तविक शांति और आत्मिक आनंद की अनुभूति होती है।
महाराज जी ने आध्यात्मिक भजनों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भजन केवल संगीत नहीं, बल्कि आत्मा को जागृत करने का सशक्त माध्यम हैं। भक्ति भाव से गाए गए भजन मन की चंचलता को समाप्त कर व्यक्ति को आत्म चिंतन और आत्म कल्याण की दिशा में प्रेरित करते हैं। उनके प्रेरक उद्बोधन के दौरान उपस्थित समाजजन बार-बार तालियों की गड़गड़ाहट से अपनी श्रद्धा व्यक्त करते रहे, जिससे पूरा चैत्यालय परिसर गूंजायमान हो उठा।
उन्होंने महान आध्यात्मिक संत श्रीमद् जिन तारण तरण स्वामी द्वारा रचित ग्रंथों का अभिप्राय समझाते हुए बताया कि इन ग्रंथों की रचना मानव जीवन को आत्म बोध, सम्यक ज्ञान और मोक्षमार्ग की ओर प्रेरित करने के उद्देश्य से की गई है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक ग्रंथ में आध्यात्मिक जीवन का गहन संदेश निहित है, जिसे समझकर जीवन में उतारना ही वास्तविक साधना है। बसंतजी महाराज ने विशेष रूप से मंथन नामक पुस्तक का उल्लेख करते हुए कहा कि इसमें फूलनाओं का महत्व अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रतिपादित किया गया है। अनेक गाथाएं छंदबद्ध रूप में लिखी गई हैं, जिनका नियमित अध्ययन और भावपूर्वक चिंतन आत्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है कार्यक्रम में बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे।



