सहानुभूति… किसी के हिस्से की मुस्कान बन जाए!

हरीश मिश्र ‘वृक्ष मित्र’, लेखक : स्वतंत्र पत्रकार
“ एक मां जब अपने बच्चे को पढ़ने के लिए घर से दूर छात्रावास भेजती है, तो उसके मन में एक ही भरोसा होता है कि उसका बच्चा वहां भूखा नहीं सोएगा, उसे कोई तकलीफ नहीं होगी और कोई अपना बनकर उसका ख्याल रखेगा। लेकिन क्या सरकारी छात्रावासों में पल रहे बच्चों को वह अपनत्व मिल पा रहा है? उनकी सूनी थाली, आंखों में पलते सपने और एक आत्मीय स्पर्श की उम्मीद को महसूस करने की कोशिश है यह दिव्य चिंतन “
कभी-कभी पहली मुलाकात में कही गई कुछ बातें औपचारिकता की सीमाएं पार कर सीधे दिल में उतर जाती हैं और मन में एक नई उम्मीद जगा देती हैं।
हाल ही में नवागत कलेक्टर रोहित सिसोनिया से पत्रकारों की सौजन्य भेंट हुई। हमने शहर के विकास और कदंब वृक्षों के संरक्षण से जुड़े सुझाव रखे। बातचीत के दौरान एक ऐसा विषय भी सामने रखा, जो वर्षों से मन को बेचैन किए हुए था।
याद आया, 1959 की हिंदी फिल्म का खूबसूरत गीत…
किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार,
किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार,
जीना इसी का नाम है…
बात उन बच्चों की थी, जो घर-परिवार से दूर सरकारी छात्रावासों में रहकर पढ़ाई कर रहे हैं। आग्रह बस इतना था कि उन्हें अच्छा भोजन, जरूरी सुविधाएं और अपनत्व भरा वातावरण मिले।
कुछ छात्रावासों से भोजन की गुणवत्ता और सुविधाओं को लेकर शिकायतें सुनने को मिलती रही हैं। कहीं थाली में सूखी रोटी तो कहीं दाल के नाम पर पानी।
सोचता हूं, इन बच्चों ने घर से निकलते समय कितने सपने संजोए होंगे। कोई डॉक्टर बनना चाहता होगा, कोई शिक्षक तो कोई अधिकारी। उनके माता-पिता ने भी अभावों के बीच उन्हें बेहतर भविष्य की उम्मीद से छात्रावास भेजा होगा। लेकिन यदि बच्चा भूखे पेट स्कूल पहुंचे तो पढ़ाई कैसे होगी? आखिर भूखे पेट भजन भी तो नहीं होता!
ये बच्चे गरीब परिवारों में जन्मे जरूर हैं, लेकिन इनके सपने किसी अमीर के बच्चों से छोटे नहीं हैं। इन्हें भी अच्छा भोजन, शिक्षा और सम्मान के साथ जीने का पूरा संवैधानिक अधिकार है।
अच्छी बात यह रही कि कलेक्टर रोहित सिसोनिया ने इस विषय को गंभीरता से लिया और छात्रावासों की व्यवस्थाओं की निगरानी के लिए अधिकारियों को ‘पालक’ नियुक्त करने की पहल की।
मुझे इस आदेश में सबसे अच्छा लगा एक शब्द… पालक।
कितना आत्मीय शब्द है! पालक केवल निगरानी करने वाला नहीं, बल्कि वह होता है जो अपनेपन से देखभाल करे और परेशानी में साथ खड़ा हो।
जिन अधिकारियों को यह जिम्मेदारी मिली है, उनसे एक आग्रह है। छात्रावास जाएं तो बच्चों के बीच बैठें, उनकी बातें सुनें और भोजन की थाली देखकर एक बार अपने मन से पूछें—क्या यही भोजन आप अपने बच्चे को परोसना चाहेंगे? यदि मन में संकोच है तो सुधार की शुरुआत वहीं से कीजिए।
किसी बच्चे को किताब चाहिए, किसी को घर की याद सताती है और किसी को केवल दो आत्मीय शब्दों की जरूरत होती है। इसके लिए किसी अतिरिक्त बजट की नहीं, संवेदना की जरूरत है।
इस विषय को जिले के मुखिया के संज्ञान में लाया गया और महज 15 दिनों में छात्रावासों की निगरानी के लिए पालक नियुक्त करने की पहल हुई। इसके लिए कलेक्टर रोहित सिसोनिया का आभार। उन्होंने विश्वास की पहली सीढ़ी पार की है। अब जिम्मेदारी उन अधिकारियों की है, जिन्हें यह अवसर मिला है।
ओ पालनहारे!
तुम्हरे बिन इन बच्चों का कौनो नाहीं!
पद और अधिकार कुछ समय के लिए मिलते हैं, लेकिन किसी बच्चे के जीवन में लाई गई मुस्कान हमेशा याद रहती है।
किसी मां की चिंता कम हो जाए, किसी पिता का भरोसा कायम रहे और किसी बच्चे के सपनों को उड़ान मिल जाए, तो समझिए आपने इंसान होने का धर्म निभाया।
सहानुभूति केवल किसी के दुख पर दुखी होना नहीं, बल्कि उसके दुख को कम करने के लिए आगे बढ़ना है।
और सच मानिए, जब किसी बच्चे के हिस्से की रोटी, सम्मान और मुस्कान सुरक्षित हो जाती है, तब दीपावली केवल एक घर में नहीं, पूरे समाज में होती है।



