किसान का गेहूं ग्रेडिंग पास, गरीब की थाली में सड़ा कंकड़! बाड़ी PDS में सरकारी सिस्टम का घिनौना खेल उजागर

सरकार किसानों से नमी-ग्रेडिंग देखकर खरीदती है सोना-सा गेहूं, तो PDS तक आते-आते वो सड़ा-पत्थर कैसे बन जाता है? खाद्य विभाग और जनप्रतिनिधि मौन
रिपोर्टर: विनोद कुमार साहू
बाड़ी। सरकार एक तरफ वाहवाही लूटती है कि हम किसानों से गुणवत्तापूर्ण गेहूं खरीदते हैं, तो दूसरी तरफ उसी सरकारी सिस्टम से गरीबों तक सड़ा हुआ जहर पहुंच रहा है। बाड़ी की सरकारी राशन दुकान का ये सड़ा अनाज इस पूरे सिस्टम की पोल खोल रहा है।
हाथ में जो गेहूं दिख रहा है वो अनाज नहीं, कचरा है। आधे दाने काले-सड़े, फफूंद लगे हुए, साथ में कंकड़-पत्थर और मिट्टी की भरमार। ऐसा अनाज जिसे खेत का पशु भी न खाए, वो गरीब हितग्राहियों को थमाया जा रहा है।
सबसे बड़ा सवाल – गेहूं सड़ता कहां है?
हर किसान जानता है, सरकार मंडी में गेहूं ऐसे ही नहीं खरीदती। नमी मशीन लगती है, ग्रेडिंग होती है, सड़ा-टूटा और कंकड़ वाला गेहूं रिजेक्ट कर दिया जाता है। किसान का एक-एक दाना चेक करके खरीदा जाता है।
तो फिर सवाल उठता है – जब सरकार ने किसान से चमकता हुआ, ग्रेडिंग पास गेहूं खरीदा, तो फिर गोदाम से PDS दुकान तक आते-आते वो सड़ा, बदबूदार और कंकड़-पत्थर वाला कैसे हो गया?
जवाब साफ है – बीच में घपला है। या तो गोदामों में सालों से पड़ा सड़ा स्टॉक गरीबों के नाम पर खपाया जा रहा है, या फिर अच्छे गेहूं को बाजार में बेचकर उसके बदले सड़ा गेहूं मिलावट करके दिया जा रहा है। बिना मिलीभगत के ये खेल मुमकिन ही नहीं है।
भीड़ की आड़ में लूट का फॉर्मूला
महीने भर खुलने वाली दुकान महज 2-4 दिन ही खुलती है। जानबूझकर भीड़ इकट्ठी की जाती है, अफरा-तफरी मचाई जाती है और उसी भीड़ का फायदा उठाकर संचालक ये सड़ा गेहूं थमा देता है। विरोध करो तो अगली बार अंगूठा ही नहीं लगेगा।
खाद्य सुरक्षा विभाग की निगरानी जीरो है। स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने आज तक कभी अस्पताल, स्कूल और PDS दुकान की जमीनी हकीकत जानने की कोशिश ही नहीं की। उनकी चुप्पी ही बताती है कि या तो उन्हें कोई सरोकार नहीं, या फिर अंदरखाने सबकी सहभागिता है।



