दस दिवसीय संस्कृत संभाषण शिविर का शुभारंभ
रायसेन । संस्कृत को वैदिक कालीन और गुरुकुल की भाषा मानने के बजाय परिवारों के सहज संवाद का हिस्सा बनाने की पहल रायसेन में शुरू हुई है। संस्कृत भारती, मध्यप्रदेश मंडल के तत्वावधान में स्वामी विवेकानंद महाविद्यालय में दस दिवसीय संस्कृत संभाषण शिविर का शुभारंभ हुआ।
शिविर का उद्देश्य संस्कृत को जन-जन तक पहुंचाने के साथ दैनिक जीवन में उसके सहज प्रयोग का वातावरण तैयार करना है।
उद्घाटन अवसर पर मुख्य अतिथि रमनगिरि महाराज ने संस्कृत को
वर्तमान जीवन से जोड़ने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि किसी भाषा का वास्तविक विस्तार तब होता है, जब वह औपचारिक अवसरों से निकलकर घर-परिवार के सामान्य व्यवहार में प्रवेश करती है। संस्कृत के साथ भी यही दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि यदि घर में अभिवादन, बच्चों से बातचीत और सामान्य व्यवहार में संस्कृत के छोटे-छोटे शब्दों और वाक्यों का प्रयोग शुरू हो जाए तो भाषा सीखना किसी कठिन अध्ययन का विषय नहीं रहेगा, बल्कि जीवन की सहज आदत बन जाएगा।
उन्होंने बच्चों को संस्कृत से जोड़ने पर विशेष जोर देते हुए कहा कि नई पीढ़ी को संस्कृत का परिचय केवल परीक्षा और पाठ्यक्रम के माध्यम से नहीं, बल्कि संवाद और संस्कार के माध्यम से कराया जाना चाहिए। परिवार संस्कृत के प्रयोग की पहली पाठशाला बने, तभी यह भाषा समाज के व्यापक व्यवहार में अपना स्थान पुनः बना सकेगी।
अतिथि के रूप में समाजसेवी मिथलेश सोनी एवं मनोज कुशवाह उपस्थित रहे। कार्यक्रम में संस्कृत भारती जिला अध्यक्ष बृजभूषण तिवारी, शिविर संचालक सोनू शर्मा, पंकज दीक्षित, संस्कृत शिक्षक श्रवण कुमार सैनी, मोहन भदौरिया एवं मलखान सिंह, पत्रकार हरीश मिश्र एवं राजेश मालवीय सहित अन्य लोग मौजूद रहे।
कार्यक्रम का संचालन ब्रजेश पाराशर ने किया। उद्घाटन सत्र में योगिता मिश्र, सिमी लोधी एवं सुहानी मालवीय की सहभागिता से प्रस्तुत सांस्कृतिक कार्यक्रम ने वातावरण को संस्कृतमय बना दिया और उपस्थितजनों की सराहना प्राप्त की।
शिविर के माध्यम से प्रतिभागियों को संस्कृत के कठिन व्याकरण से पहले उसके सरल और व्यवहारिक स्वरूप से परिचित कराया जाएगा। रोजमर्रा के संवाद में प्रयुक्त होने वाले शब्दों और वाक्यों का अभ्यास कराया जाएगा, ताकि संस्कृत बोलना केवल सीखने का विषय न रहकर व्यवहार का हिस्सा बन सके।
इस अवसर पर संस्कृत को घर-घर और परिवार-परिवार तक पहुंचाने का संकल्प भी व्यक्त किया गया। पहल का संदेश स्पष्ट है,संस्कृत को केवल विरासत के रूप में सुरक्षित रखना पर्याप्त नहीं, उसे बोलचाल में जीवित रखना भी उतना ही जरूरी है।



