लायंस आई हॉस्पिटल परासिया पर बड़ा आरोप: बिना अनुमति और मापदंडों के 25 साल से निकाले जा रहे थे कॉर्निया

SOTTO की जाँच में खुलासा: म.प्र. राज्य अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण संगठन (SOTTO) ने माना—बिना वैधानिक अनुमति और मानकों के बिना किया गया कॉर्निया उत्सर्जन।
SOTTO ने जारी की सख्त चेतावनी: संस्था को पत्र जारी कर माँगा स्पष्टीकरण, बिना NOTTO पंजीयन कार्य करने पर लगाई रोक।
CMHO का RTI से पर्दाफाश: छिंदवाड़ा स्वास्थ्य विभाग के पास संस्था का अंग/ऊतक उत्सर्जन का कोई वैधानिक रिकॉर्ड दर्ज नहीं।
PMO के हस्तक्षेप पर जाँच: PMO शिकायत पर CIMS की 5-सदस्यीय विशेषज्ञ समिति ने अनिमितताओं की पुष्टि की।
जबलपुर हाईकोर्ट जाने की तैयारी: मामले में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (मुख्य पीठ, जबलपुर) में जनहित याचिका (PIL) दायर होगी।
बिना पंजीयन 25 वर्षों से चल रहा था नेत्रदान का बड़ा खेल
परासिया। छिंदवाड़ा जिले के परासिया स्थित लायंस आई हॉस्पिटल (लायंस क्लब) में मानव अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण अधिनियम (THOTA, 1994) के नियमों और शासकीय मापदंडों के गंभीर उल्लंघन का बड़ा मामला उजागर हुआ है।
प्राप्त साक्ष्यों और जाँच रिपोर्टों के अनुसार, संस्था द्वारा बीते 25 वर्षों से नेत्रदान प्रक्रिया के नाम पर मृत व्यक्तियों की आँखें (कॉर्निया) निकाली जा रही थीं, जबकि संस्था के पास इसके लिए जिला, राज्य या केंद्र स्तर का कोई वैधानिक पंजीयन या शासकीय अनुमति उपलब्ध ही नहीं है।
व्यक्तिगत पीड़ा से उठी न्याय और पारदर्शिता की कानूनी लड़ाई
इस पूरे मामले का खुलासा जिले के सक्रिय समाजसेवी एवं आरटीआई एक्टिविस्ट एवं सोशल एक्टिविस्ट रिंकू रितेश चौरसिया के व्यक्तिगत अनुभव से हुआ। वर्ष 2016 में उनके स्वर्गीय मामा अशोक चौरसिया के निधन के उपरांत परिजनों ने लायंस आई हॉस्पिटल परासिया को सम्मानपूर्वक नेत्रदान कराया था।
वर्ष 2018 में जब स्व. अशोक चौरसिया की धर्मपत्नी श्रीमती गीता चौरसिया ने भावनात्मक रूप से जानने का प्रयास किया कि उनके पति की आँखें किस ज़रूरतमंद मरीज को प्रत्यारोपित की गईं, तो संस्था के पदाधिकारियों ने स्पष्ट जानकारी न देते हुए टालमटोल शुरू कर दी। इस संदिग्ध रवैये के बाद समाजसेवी रिंकू रितेश चौरसिया ने आर टी आई (सूचना के अधिकार) के माध्यम से तथ्य जुटाना शुरू किया और देश के 14 प्रमुख शासकीय व संवैधानिक विभागों में शिकायत दर्ज कराई।
PMO के संज्ञान पर CIMS और SOTTO की जाँच में दोषी पाई गई संस्था
मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) ने पोर्टल शिकायत (क्रमांक PMOPG_D_2026_0061817) पर त्वरित संज्ञान लिया। PMO के निर्देश पर छिंदवाड़ा इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (CIMS) द्वारा 5-सदस्यीय विशेषज्ञ जाँच समिति गठित की गई, जिसने संस्था की गंभीर अनियमितताओं की पुष्टि की।
SOTTO (स्टेट ऑर्गन एवं टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गनाइजेशन, इंदौर) के सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी पत्र (क्रमांक 12359/ओ.डी.-सोटो/2026, 12711/ओ.डी.-सोटो/2026 एवं 13996/ओ.डी.-सोटो/2026) के अनुसार:
गैर-कानूनी कॉर्निया उत्सर्जन: संस्था द्वारा बिना विधिसम्मत अनुमति, निर्धारित मानकों का पालन किए बिना तथा सक्षम प्राधिकारी को पूर्व सूचना दिए बिना कॉर्निया निकालने का कार्य किया गया।
कारण बताओ नोटिस व चेतावनी: SOTTO म.प्र. ने लायंस आई हॉस्पिटल परासिया को कड़ी चेतावनी देते हुए तत्काल स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।
NOTTO पंजीयन अनिवार्य: SOTTO ने सख्त आदेश दिया है कि भविष्य में राष्ट्रीय स्तर के संगठन NOTTO (नई दिल्ली) में पंजीयन और सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के बिना कोई भी कॉर्निया उत्सर्जन या प्रत्यारोपण नहीं किया जाएगा।
CMHO छिंदवाड़ा का बड़ा खुलासा: 25 वर्षों का शासकीय रिकॉर्ड नदारद
सूचना के अधिकार (RTI) के तहत प्राप्त आधिकारिक पत्र (क्रमांक RTI/2026/7027, दिनांक 16.03.2026) में मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) छिंदवाड़ा ने भी लिखित में पुष्टि की है कि लायंस आई हॉस्पिटल परासिया के पास अंग या ऊतक उत्सर्जन हेतु कोई पंजीयन दर्ज नहीं है।
सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि बीते 25 वर्षों में संस्था ने कुल कितने मृतकों की आँखें निकालीं, उन्हें कहाँ स्टोर किया गया और किन मरीजों को प्रत्यारोपित किया गया—इसका कोई भी आधिकारिक रिकॉर्ड स्वास्थ्य विभाग के पास मौजूद नहीं है।
उच्च न्यायालय (जबलपुर) में जनहित याचिका (PIL) की तैयारी
रिंकू रितेश चौरसिया (समाजसेवी व RTI कार्यकर्ता का कहना है कि मामले से जुड़े सभी प्रामाणिक साक्ष्य NOTTO, SOTTO, लोकायुक्त, मानव अधिकार आयोग और पुलिस प्रशासन को सौंपे जा चुके हैं। प्रशासनिक स्तर पर कार्यवाही में हो रहे विलंब को देखते हुए अब मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (मुख्य पीठ, जबलपुर) में जनहित याचिका (PIL) दायर करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
”25 वर्षों से बिना किसी वैधानिक पंजीयन और निर्धारित मानकों के नेत्रदान के नाम पर आँखें निकालना और उनका कोई सरकारी रिकॉर्ड न रखना अत्यंत गंभीर अपराध है। SOTTO और CIMS की जाँच रिपोर्ट से हमारी आशंका पूरी तरह सच साबित हुई है। आम जनता की भावनाओं और कानूनी अधिकारों की रक्षा के लिए दोषियों पर सख्त वैधानिक कार्यवाही हेतु हम माननीय उच्च न्यायालय का रुख कर रहे हैं।”



