कभी ऑनलाइन तो कभी स्कूल, इससे कम हो गया बच्चों का आईक्यू लेवल, मोबाइल बन गए गेम उपकरण
फिर से खुले स्कूल: बच्चे स्थिर नहीं हो पा रहे, कोर्स पूरे होने को लेकिन समझ नहीं आ रहे
सिलवानी। कोरोना वायरस ने जन हानि के बाद सर्वाधिक नुकसान देश के भविष्य यानी बच्चों का किया है। कोरोना के कारण शिक्षा व्यवस्था लगभग चौपट हो गई है। बढ़ते संक्रमण से कभी ऑनलाइन तो कभी सामान्य हालात में आफ़लाइन के भंवर में फंसे स्कूली छात्रों का आईक्यू लेवल बिगड़ रहा है। कभी वे मोबाइल के भरोसे पढ़ाई करने को मजबूर हैं तो कभी स्कूलों में जाने को । इससे उनमें स्थिरता नहीं रह पा रही है। साथ ही सर्वाधिक मोबाइल के उपयोग से भी उन्हें नुकसान ही हो रहा है। मोबाइल उनके लिए एक तरह से गेम का उपकरण बन गया है। हालात ये है कि बच्चे पढ़ाई से ज्यादा उपयोग गेम में कर रहे हैं। माता-पिता भी उन पर पूरा ध्यान नहीं दे पा रहे हैं। बच्चे विभिन्न प्रकार के गेम के आदि हो गए हैं जो कि उनके लिए खतरनाक भी साबित हो रहे हैं।
तीन साल से हर बार बदल रहा पढ़ाई का तरीका
2020 की शुरूआत से शुरू हुए कोविड दौर के बाद से लगातार पढ़ाई का तरीका बदल रहा है। बच्चे घर पर रहकर पूरी क्लासेस ऑनलाइन पढ़ रहे हैं। वहीं बीच-बीच में हालात सुधरने के बाद बच्चे स्कूल पहुंच रहे हैं लेकिन वहां भी 50 फीसदी क्षमता के साथ पहुंच रहे हैं। इससे बच्चों की निरंतरता प्रभावित हुई है। उन्हें सैद्धांतिक पढ़ाई भी स्कूलों से नहीं मिल पा रही है। बच्चे अपने आईक्यू लेवल के आधार पर स्वयं ही पढ़़ाई कर रहे हैं जिससे कइयों के बेसिक्स क्लीयर नहीं हो रहे है।
सरकारी वैसे ही फेल, कोरोना ने पूरा बिगाड़ डाला
तहसील के निजी स्कूलों में जैसे-तैसे ऑनलाइन क्लासेस के जरिए कोर्स पूरे कराने की कोशिश स्टाॅफ ने की है लेकिन पहले से बिगड़े हुए ढर्रे के साथ संचालित सरकारी स्कूलों की हालत और बिगड़ गई। गांवों में रहने वाले कई बच्चों के पास न मोबाइल है न ही उन्हें ऑनलाइन क्लास का कंसेप्ट समझ आता। इसलिए उनके भविष्य के साथ ज्यादा खिलवाड़ हुआ है। महज मध्यान्ह्र भोजन पर आधारित पढ़ाई वाले गांव के बच्चों का बौद्धिक स्तर भी काफी प्रभावित हुआ है। इससे खासा नुकसान सरकार स्कूलों के बच्चों का हुआ है, उन्हें पढ़ाई के लिए दो गुना चुनौती झेलना पड़ रही है।
पालक शिवकुमार साहू का कहना है कि शिक्षा या पढ़ाई वह है जो कि गंभीरता के साथ की जाए। दो से तीन साल से ढर्रा बिल्कुल बिगड़ चुका है। जिस दौर में रेग्यूलर क्लासेस में भी बच्चे ढंग से नहीं पढ़ पाते थे उसी दौर में अब आॅनलाइन कंसेप्ट आया है लेकिन यह सभी की समझ से परे है। सरकारी स्कूलों में अतिरिक्त मेहनत की जरूरत है। अन्यथा बच्चों का भविष्य अंधकार में जाएगा।
इस संबंध में शैलेन्द्र यादव, बीआरसीसी का कहना है कि कुछ दिन के अंतराल के बाद सभी क्लासेस खुली है जिसमें बच्चे पहुंच रहे हैं। पहले दिन काफी कम संख्या था लेकिन अब धीरे-धीरे बच्चे आने लगे हैं। उम्मीद हैं कि आने वाले दिनों में परीक्षा के समय तक बेहतर संख्या बच्चों की हो जाएगी।



