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मासूमों की नजर पर खतरा: टीवी और मोबाइल से कमजोर हो रहीं बच्चों की आंखें, अनदेखी से कई बच्चे भेंगेपन का शिकार

रिपोर्टर : शिवलाल यादव
रायसेन।
कोरोना काल के पहले 10 फीसदी आते थे बच्चों की आंखों की समस्या से जुड़े मामले, तीन साल में 20 फीसदी हुआ इजाफा।बच्चे की आंख से आंसू आ रहे हैं, या फिर किसी भी चीज को सीधे देखने में उसे परेशानी होती है। टीवी को करीब होकर देखता है, तो सतर्क हो जाएं। तुरंत नेत्र रोग विशेषज्ञ को जरूर दिखाएं। कहीं यह बच्चों की आंखों में तिरछेपन की शुरुआत तो नहीं है। दरअसल, आंख में तिरछेपन (भेंगापन) से पीड़ित बच्चों की संख्या बढ़ रही है।
जिला अस्पताल के नेत्र रोग विभाग के आंकड़ों के अनुसार तीन साल पहले तक जहां जिला अस्पताल की कुल ओपीडी में सिर्फ 10 फीसदी बच्चे आंखों की समस्या लेकर आते थे। वहीं अब इनकी संख्या 30 फीसदी से अधिक है।वरिष्ठ नेत्र रोग स्पेशलिस्ट डॉ एसी अग्रवाल, जिला अस्पताल के नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. शरद साहू ने बताया कि पहले तो इस समस्या से पीड़ित गिने-चुने मरीज ही आते थे, लेकिन अब तो नेत्र रोग विभाग की ओपीडी में इस बीमारी से पीड़ित बच्चे लगातार आ रहे हैं। यह ऐसी बीमारी है, जिसमें बच्चे के साथ माता-पिता की भी काउंसलिंग करनी पड़ती है। ताकि वे इस समस्या को गंभीरता से लें। स्कूली स्तर पर भी जागरुकता शिविर लगाने की आवश्यकता है।
इन तीन कारणों से होती है तिरछेपन की समस्या…..
मोबाइल का ज्यादा उपयोग और पास से टीवी देखने से भी होती है परेशानी, रक्त वाहनी में ठीक से सर्कुलेशन नहीं होना, आंसू की नलिका का बंद होना।
एक आंख की ज्यादा रोशनी दूसरी की कम, इसलिए होती है समस्या।
इस रोग के यह हैं लक्षण….
नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. शरद साहू का कहना है कि आंखों में तिरछेपन के शिकार बच्चों में चीजों को पास से देखने।आंखों को छोटा करके देखने और सिरदर्द जैसी समस्याएं होती हैं। दूसरे मामले में बच्चे की एक आंख स्वस्थ होती है तो वह दूसरी आंख से देखने का प्रयास ही नहीं करता। इससे दूसरी आंख की रोशनी कम हो जाती है। दिमाग भी उस आंख को भूल दूसरी पर ही निर्भर हो जाता है। इसलिए बच्चे को देखने में समस्या नहीं होती। इसका कारण अनुवांशिक या मां को गर्भावस्था में पोषण न मिलना भी है।
आंखों की इन बीमारियों की चपेट में आ रहे बच्चे, रिफ्रेक्टिव एरर के सबसे ज्यादा 50 फीसदी केस…..
रिफ्रेक्टिव एरर- यह बच्चों में आंखों की कमजोरी, मोतियाबिंद, आई बॉल की साइज अलग-अलग होना, पुतली का अंडाकर होना और मोबाइल व कंम्प्यूटर विजन सिंड्रोम के कारण होती है। इसमें बच्चों को चश्मा लगाया जाता है। ओपीडी में इस बीमारी के करीब 50 फीसदी बच्चे होते हैं। सही समय पर चश्मा न लगने से बच्चों की आंखों में टेढ़ापन आ सकता है।
कॉन्जिनाइटल डेक्रायोसिसआइटिस- आंखों से पानी गिरने की समस्या होती है। शून्य से एक वर्ष तक के बच्चों में केवल मालिश करने से इसे काफी हद तक ठीक किया जा सकता है। उम्र बढ़ने के बाद बच्चों के आपरेशन किए जाते हैं। ओपीडी में इस बीमारी के बच्चों की संख्या 25 फीसदी होती है।
कंजेक्टिव आईटिस- वैसे तो यह बीमारी सीजनल होती है। लेकिन हाइजीन की समस्या और बार-बार आंखें रगड़ने के कारण भी यह बीमारी हो सकती है। ओपीडी में ऐसे केस लगभग 5 फीसदी आते हैं। माइक्रो ऑप्थेल्मस और कोलोगोमा- इसमें बचपन से ही बच्चों की आंखें छोटी होना, आंख ठीक से नहीं खुलना, पर्दे में विकृति और अंधापन आदि होता है। ऐसे मामले भी जिले में बढ़ रहे हैं। बचपन में इलाज न होने से बच्चों में जीवनभर अंधत्व की समस्या हो सकती है।
नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. शरद साहू का कहना है कि रेटिनो ब्लास्टोमा- बच्चों की आंखों मे ट्यूमर। इस बीमारी से ग्रस्त बच्चे भी जिले में मिले हैं। इनका इलाज कीमोथैरेपी या आपरेशन के जरिए किया जा रहा है। यह काफी गंभीर बीमारी है, जिसमें बच्चों को जान का खतरा भी हो सकता है।

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