धार्मिक

Today Panchang आज का पंचांग बुधवार, 28 मई 2025

आचार्य श्री गोपी राम (ज्योतिषाचार्य) जिला हिसार हरियाणा मो. 9812224501
जय श्री हरि
🧾 आज का पंचांग 🧾
बुधवार 28 मई 2025
ॐ एकदन्ताय विद्महे वक्रतुंडाय धीमहि तन्नो बुदि्ध प्रचोदयात ।।
☄️ दिन (वार) – बुधवार के दिन तेल का मर्दन करने से अर्थात तेल लगाने से माता लक्ष्मी प्रसन्न होती है धन लाभ मिलता है।
बुधवार का दिन विघ्नहर्ता गणेश का दिन हैं। बुधवार के दिन गणेश जी के परिवार के सदस्यों का नाम लेने से जीवन में शुभता आती है।
बुधवार के दिन गणेश जी को रोली का तिलक लगाकर, दूर्वा अर्पित करके लड्डुओं का भोग लगाकर उनकी की पूजा अर्चना करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
🔮 शुभ हिन्दू नववर्ष 2025 विक्रम संवत : 2082 कालयक्त विक्रम : 1947 नल
🌐 कालयुक्त संवत्सर विक्रम संवत 2082,
✡️ शक संवत 1947 (विश्वावसु संवत्सर), चैत्र
☮️ गुजराती सम्वत : 2081 नल
☸️ काली सम्वत् 5126
🕉️ संवत्सर (उत्तर) क्रोधी
☣️ आयन – उत्तरायण
☂️ ऋतु – सौर ग्रीष्म ऋतु
☀️ मास – ज्यैष्ठ मास
🌘 पक्ष – कृष्ण पक्ष
📆 तिथि – बुधवार ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष द्वितीया तिथि 01:54 AM तक उपरांत तृतीया
✏️ तिथि स्वामी – द्वितीया तिथि के देवता हैं ब्रह्मा। इस तिथि में ब्रह्मा की पूजा करने से मनुष्य विद्याओं में पारंगत होता है।
💫 नक्षत्र – नक्षत्र म्रृगशीर्षा 12:29 AM तक उपरांत आद्रा
🪐 नक्षत्र स्वामी – मृगशीर्ष नक्षत्र का स्वामी ग्रह मंगल है। मृगशीर्ष के देवता सोम, चंद्र या चंद्रमा हैं। चंद्र एक युवा, सुंदर, गोरा और दो भुजाओं वाला देवता है।
⚜️ योग – धृति योग 07:08 PM तक, उसके बाद शूल योग
प्रथम करण : बालव – 03:25 पी एम तक
द्वितीय करण : कौलव – 01:54 ए एम, मई 29 तक तैतिल
🔥 गुलिक काल : – बुधवार को शुभ गुलिक 11:10 से 12:35 बजे तक ।
⚜️ दिशाशूल – बुधवार को उत्तर दिशा में दिशा शूल होता है ।इस दिन कार्यों में सफलता के लिए घर से सुखा / हरा धनिया या तिल खाकर जाएँ ।
🤖 राहुकाल : – बुधवार को राहुकाल दिन 12:35 से 2:00 तक । राहु काल में कोई भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिए |
🌞 सूर्योदयः- प्रातः 05:17:00
🌅 सूर्यास्तः- सायं 06:43:00
👸🏻 ब्रह्म मुहूर्त : 04:03 ए एम से 04:44 ए एम
🌇 प्रातः सन्ध्या : 04:23 ए एम से 05:25 ए एम
🌟 अभिजित मुहूर्त : कोई नहीं
✡️ विजय मुहूर्त : 02:37 पी एम से 03:32 पी एम
🐃 गोधूलि मुहूर्त : 07:11 पी एम से 07:32 पी एम
🏙️ सायाह्न सन्ध्या : 07:12 पी एम से 08:14 पी एम
💧 अमृत काल : 04:33 पी एम से 05:59 पी एम
🗣️ निशिता मुहूर्त : 11:58 पी एम से 12:39 ए एम, मई 29
सर्वार्थ सिद्धि योग : 05:25 ए एम से 12:29 ए एम, मई 29
🚓 यात्रा शकुन-हरे फ़ल खाकर अथवा दूध पीकर यात्रा पर निकले।
👉🏼 आज का मंत्र-ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं स: बुधाय नम:।
💁🏻 आज का उपाय- गणेश मंदिर में दुर्वा की माला चढ़ाएं।
🪵 *वनस्पति तंत्र उपाय-अपामार्ग के वृक्ष में जल चढ़ाएं। ⚛️ पर्व एवं त्यौहार – चन्द्रदर्शन/ सर्वार्थ सिद्धि योग/ द्विपुष्कर योग/ स्वतंत्रता सेनानी विनायक दामोदर “वीर” सावरकर जयन्ती, राष्ट्रीय हैमबर्गर दिवस, राष्ट्रीय ब्रिस्केट दिवस, राष्ट्रीय फ्लिप फ्लॉप दिवस, विश्व भूख दिवस, मासिक धर्म स्वच्छता दिवस, अंतर्राष्ट्रीय कार्रवाई दिवस, प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी विजय सिंह पथिक स्मृति दिवस, एमनेस्टी इंटरनेशनल डे ✍🏼 तिथि विशेष – द्वितीया तिथि को कटेरी फल का तथा तृतीया तिथि को नमक का दान और भक्षण दोनों ही त्याज्य बताया गया है। द्वितीया तिथि सुमंगला और कार्य सिद्धिकारी तिथि मानी जाती है। इस द्वितीया तिथि के स्वामी भगवान ब्रह्माजी को बताया गया है। यह द्वितीया तिथि भद्रा नाम से विख्यात मानी जाती है। यह द्वितीया तिथि शुक्ल पक्ष में अशुभ तथा कृष्ण पक्ष में शुभ फलदायिनी होती है।। 🏘️ *Vastu tips* 🏚️ वास्तु के मुताबिक, सोते वक्त सिर की दिशा का बड़ा असर होता है। सिर को दक्षिण दिशा की ओर रखकर सोना सबसे शुभ माना गया है। इससे शरीर में एनर्जी का बहाव सही रहता है और नींद गहरी आती है। लेकिन सिर उत्तर की तरफ रखकर सोने से दिमाग बेचैन रहता है और नींद बार-बार टूट सकती है। इसलिए दिशा का ध्यान जरूर रखें। सिरहाने रखें ये चीज़ें रात को सोने से पहले तांबे के लोटे में पानी भरकर सिरहाने रखिए। सुबह उठकर ये पानी किसी पेड़ के नीचे डाल दें। इससे नेगेटिव एनर्जी दूर होती है और मन को शांति मिलती है। साथ ही, तकिए के नीचे एक हरी इलायची रख लें। इसकी खुशबू दिमाग को शांत करती है और अच्छी नींद आने में मदद करती है। 🎯 जीवनोपयोगी कुंजियां ⚜️
पर्यावरणीय शुद्धता की देवी तुलसी का पौधा वातावरण में ऑक्सीजन का स्तर बढ़ाता है और वायु से हानिकारक विषाणु तथा जीवाणु दूर करता है। यह प्राकृतिक एयर प्यूरीफायर की तरह काम करता है।
जहाँ तुलसी होती है, वहाँ की हवा शुद्ध, सकारात्मक और जीवनदायिनी होती है।
➡️ तुलसी का पौधा अपने आसपास के वातावरण को “पवित्र” बनाता है — बिल्कुल शाब्दिक और आध्यात्मिक दोनों अर्थों में।
🧘‍♀️ मानसिक और आध्यात्मिक शांति का स्रोत तुलसी की पत्तियों की सुगंध मन को शांत, संतुलित और सकारात्मक बनाती है। इसकी उपस्थिति से ध्यान-योग में एकाग्रता बढ़ती है और मन की चंचलता कम होती है।
तुलसी के पास बैठकर प्राणायाम या ध्यान करने से मन के विकार समाप्त होते हैं और आत्मा को शुद्धि का अनुभव होता है।
➡️ तुलसी के स्पर्श मात्र से नकारात्मक भावनाओं का क्षय हो जाता है।
🧴 औषधीय गुणों से भरपूर (जिससे शरीर भी शुद्ध होता है) तुलसी को आयुर्वेद में ‘राजौषधि’ कहा गया है — यानी औषधियों की रानी। इसके सेवन से शरीर के अंदर जमा विषाक्त तत्व बाहर निकल जाते हैं और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
🍒 आरोग्य संजीवनी 🍓
वामशायी द्विर्भुंजान: षण्मुत्री द्विपुरीषक: ।
व्यायामी ब्रह्मचारी च शतं वर्षाणि जीवति ।।
अर्थात् बांई करवट सोने वाला , दिन में दो बार खाने वाला , छः बार मूत्र त्याग करने वाला , दो बार मल त्याग करने वाला , नित्य प्रति व्यायाम करने वाला और सदाचार का पालन करने वाला व्यक्ति सौ वर्ष तक स्वस्थ रहते हुए जीवन यापन करता है ।
इसके साथ ही आयुर्वेद में जीवन के तीन स्तंभ माने हैं । 1- आहार ,2- निद्रा 3- ब्रह्मचर्य ( सदाचार ) । इन तीनों स्तम्भों पर जिसका शरीर टिका है वह स्वस्थ रहते हुए सम्पूर्ण आयु भोग सकता है ।
इस प्रश्न में आपने मुख्य रूप से खाने के विषय में पूछा है । इसका उत्तर भी आयुर्वेद में दिया है । आयुर्वेद का मत है कि हमें ऋतभुक् ,हितभुक् और मितभुक् होना चाहिए ।
ऋतभुक् — ऋतु के अनुसार पैदा होने वाले पदार्थों का सेवन करें । जैसे सर्दियों में पैदा होने वाली गोभी,गाजर और मटर आदि का सेवन सर्दियों में ही लाभकारी हो सकता है ।
हितभुक् — हितकारी पदार्थों का सेवन करें । मनुष्य की शरीर संरचना एक जैसी होते हुए भी वात,पित्त,कफ के अनुसार भिन्न भिन्न है । जैसे एक व्यक्ति के लिए दूध दही आदि बहुत उपयोगी हैं लेकिन कफ के दूषित होने की स्थिति में वे शरीर में उपद्रव करने वाले हो सकते हैं । ऐसे ही वात प्रकृति वाला मनुष्य यदि वातकारक पदार्थों का अधिक सेवन करेगा तो उसके शरीर में वातरोगों के बढ़ने की संभावना बन जाती है । इसलिए अपनी अपनी प्रकृति को पहचान कर तदनुरूप भोजन करना चाहिए ।
📖 गुरु भक्ति योग 🕯️
★-पहले चर्चा करते हैं ज्योतिषी व यजमान के सोच की: स्पष्ट है कि ग्रह शान्ति की स्थितियाँ अनेक हो सकती हैं और ऐसी स्थिति में कौन सा ग्रह कष्टप्रद है यह मुख्यतः विद्वान ज्योतिषी के अध्ययन और विवेक पर निर्भर है।
◆इसके अलावा ज्योतिषी की तटस्थता या संलिप्तता, ग्रहशांति से धनार्जन की लालसा या अनिच्छा का भी प्रभाव बहुधा देखा जाता है।
◆फिर यजमान की धर्म कर्म के प्रति आस्था कितनी कैसी है? यदि वह अपने इष्टदेव को अधिक महत्व देता है- इष्ट के प्रति अनन्य भाव है तो वह ग्रह शान्ति के स्थान परअपने इष्ट देव की विशेष उपासना अनुष्ठान मन्त्र जप होम-हवन पर ही जोर देगा।
●यदि ग्रह शान्ति को कुछ महत्व शास्त्र निष्ठा अथवा भय के कारण दे रहा है तो इस बात पर भी ग्रह शान्ति कर्म निर्भर है।
★इन सब से हट कर एक स्थिति और भी है: किसी यज्ञ अनुष्ठान व बड़े धर्मिक आयोजन में मातृका और नव ग्रहों की सुन्दर कलात्मक शास्त्रीय आकृतियाँ बना कर मातृका पूजन के साथ साथ नवग्रह का भी पूजन किया जाता है।
★-अब चर्चा करते हैं जन्मपत्रिका में ग्रह शान्ति का निर्णय कैसे किस आधार पर किया जाता है इसे आप के प्रश्न में कथित – किन हालात या जन्मपत्रिकागत परिस्थितियाँ -ऐसा कहेंगे:
● जब कोई ग्रह लग्न से या दशा स्वामी से 6 8 12 स्थान पर हो, दूसरे सातवें स्थान में स्थित हो या उसका स्वामी हो;
पाप ग्रह से युक्त दृष्ट या हीन बली हो (षडवर्ग सप्तवर्ग दशवर्ग षोडशवर्ग में अथवा षड्बल में ) साथ ही शुभ दृष्ट /युक्त भीनहीं हो और ऐसे ग्रह की दशा अथवा अन्तर्दशा चल रही हो तो ऐसी स्थिति में ऐसा ग्रह अपने भाव का व अन्य ग्रह से युक्त दृष्ट या जिस ग्रह के नक्षत्र में स्थित है उसके भाव का प्रतिकूल फल दे रहा हो या भविष्य में देने की संभावना हो तो ऐसे ग्रह की शान्ति का विधान विविध होरा ग्रन्थों में किया गया है।
होरा ग्रन्थों के इस विधान में अधिकतर किसी देव की उपासना ही बताई गई है।जैसे कि बृहत पाराशरी में गुरु अरिष्ट शमन के लिए वैष्णव या शैव मत की उपासना अर्थात मृत्युंजय जप शिव सहस्त्रनाम पाठ या विष्णु सहस्रनाम पाठ बताया गया है। अथवा राहु के लिए दुर्गा जप बताया गया है।
◆आप कहेंगे कि इसमें ग्रह या नव ग्रह शान्ति कहाँ है? आपकी जिज्ञासा उचित है।वस्तुतः ग्रह से संकेतित देव की उपासना ही सबसे पहले बताई जाती है।
◆परवर्ती ज्योतिष साहित्य में क्लेशप्रद ग्रहों के शमन के लिए तांत्रिक पौराणिक और वैदिक तीन तरह के मन्त्र से ग्रह शान्ति उनकी मन्त्र संख्या व होम हवन के लिए निर्धारित समिधा निर्धारित की गई है।पर ये बहुत बाद का चलन है। आजकल यजमान और ज्योतिषी दोनों को यही आसान लगता है, समय धन साधन की दृष्टि से।
◆ सभी नवग्रह की पूजा कब बताते हैं ज्योतिषी:
◆जब ज्योतिषी अपने सीमित ज्योतिषीय ज्ञान के कारण टेक्निकल विवेचना में अक्षम होते हैं तो वे सरल कर्मकाण्ड में, कथावाचन, और ग्रह पूजा में अधिक संलग्न हो जाते हैं तथा
◆ऐसे ज्योतिषी जो कर्मकांडके पुरोहित हैं व थोड़ा कम चलाऊ पत्रा देख लेते हैं व अंदाज से जन्मपत्री भी बना देते हैं या किसी से बनवा लेते हैं और जन्मपत्रिका को केवल सामान्यपुरोहत वाले दृष्टि कोण से देखते हैं और जो ज्योतिष के कामचलाऊ ज्ञान से फैसला करते हैं व ठीक से निर्णय नहीं ले पाते तो
◆ऐसे कर्मकाण्ड दक्ष पुरोहित पर ज्योतिष में अल्पज्ञ व परिश्रम न करने वाले ज्योतिषी एकसाथ सभी नवग्रहों की शांति एक उपाय के रूप में तुरन्त ही बता देते हैं।
समस्त नवग्रह की शान्ति का सुझाव एकतरह का एनासिन एस्प्रो की ऐलोपैथिक टेबलेटके सुझाव जैसा ही समझिए;
अथवा इसे नर्सिंग होम के डॉक्टर या अल्पज्ञ डॉक्टर का हर रोग चिकित्सा में बात में ग्लूकोज की बोतल चढ़ाने जैसा समझिए। ( सीधे सादे ग्रामीण इसे ही महत्वपूर्ण मानते हैं )।
जबकि जानकार व संयमी डॉक्टर होगा तो रोग को अच्छे से समझ कर केवल उसी व्याधि की कम से कम औषधि लिखेगा।
इसलिए मननशील ज्योतिषी होगा तो कभी भी नवग्रह शान्ति नहीं बताएगा,ग्रह संकेतित देवोपासना ही बताएगा।या बहुत हुआ तो किसी विशिष्ट ग्रह के देव के अतिरिक्त उसी एक ग्रह के मन्त्र जप की सलाह देगा।
निष्कर्ष: मेंरे विनम्र विचार में आपके प्रश्न- नवग्रह की शांति पूजा किन परिस्थितियों की जाती है- का यही उत्तर है।
◆चलते चलते इस प्रश्न से जुड़े अन्य प्रश्न पर भी चर्चा कर ली जाए कि-ग्रह तो जड़ हैं वे कैसे हमारे कर्म को प्रभावित कर सकते हैं और- कैसे उनकी शांति से व्यक्ति के कर्मफल शांत हो सकते हैं।
संक्षिप्त उत्तर या है कि
◆1-ग्रहव्यक्ति के कर्म नहीं बनाते, कर्म व्यक्ति करता है, ग्रह तो कृतकर्म का संकेत मात्र करते हैं जैसे कि कम्पास दिशा बताता है बनाता नहीं।
*
सभी क्लासिकल पुस्तकों के आरम्भ में भी यही लिखा है कि जैसे अंधेरे में पहले से रखी हुई वस्तु को दीपक का प्रकाश दिखा देता है कुछ वैसे ही जन्मपत्रिका रूपी दीपक व्यक्ति के कृत कर्म को “दिखा” देता है।
◆2 “जड़ चेतन मँह रहा लुकाई”-तुलसी का कथन है कि जड़ से लेकर चैतन्य तक सभी में एक ही सत्ता है।इसलिए “मानो तो देव नहीं तो पत्थर” इस उक्ति के अनुसार जब व्यक्ति किसी मूर्ति या ग्रह में चैतन्य का भाव रखकर उपासना करता है तो इसमें उसकी श्रद्धा ही कार्य करती है और फल दायक भी होती है इसमें किसी को शंका नहीं करना चाहिए।
◆”श्रद्धामयः अयं पुरुषः” ( गीता १७-३ ) व्यक्ति को अपनी श्रद्धा के अनुसार ही उपासना का फल मिलता है। इसलिए ग्रह की उपासना में भी यही तर्क लगता है।
◆त्रिविधा भवति श्रद्धा- (गीता१७-२ ) के अनुसार व्यक्ति की श्रद्धा सात्विक राजसिक तामसिक तीन तरह की होती है।इसलिए ज्योतिषी कुछ भी सुझाए , व्यक्ति अपने त्रिगुणात्मक स्वभाव के अनुसार ही देव ग्रह उपासना चयन करने को प्रवृत्त होगा।
●यदि कोई आत्म विश्वासी व्यक्ति होगा जिसे अपने पुरुषार्थ पराक्रम पर अधिक भरोसा है तो वह ग्रहशांति की सलाह मानेगा ही नहीं बल्कि बाधा की संभावना को देख कर और सावधान हो कर कार्य करेगा तथा असफलता व कष्टकलेश होने पर भी संघर्षशील बना रहेगा।
★गोस्वामी तुलसी दास जी कहते हैं:
जब जानकी नाथ सहाय करें तो कौन बिगार करे नर तोरो ।
सूरज मङ्गल सोम भृगुसुत बुध और गुरु वरदायक तेरो,
राहु केतु की नहीं गम्यता संग शनीचर होत हुचेरो।
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⚜️ प्रजापति व्रत दूज को ही किया जाता है तथा किसी भी नये कार्य की शुरुआत से पहले एवं ज्ञान प्राप्ति हेतु ब्रह्माजी का पूजन अवश्य करना चाहिये। वैसे तो मुहूर्त चिंतामणि आदि ग्रन्थों के अनुसार द्वितीया तिथि अत्यन्त शुभ फलदायिनी तिथि मानी जाती है। परन्तु श्रावण और भाद्रपद मास में इस द्वितीया तिथि का प्रभाव शून्य हो जाता है। इसलिये श्रावण और भाद्रपद मास कि द्वितीया तिथि को कोई भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिये।।

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