मध्य प्रदेश

कर्मचारी हित मे नही है, नई पेंशन स्कीम : सूर्यकांत त्रिपाठी

अपने बुढ़ापे को लेकर चिंतित कर्मचारियों के समग्र विकास को ध्यान मे रखकर सरकार को वरिष्ठता सह पुरानी पेंशन पर अविलंब विचार करने की आवश्यकता है।
रिपोर्टर : सतीश चौरसिया
उमरियापान । प्रदेश के गांव गली मजरो टोलों तक शिक्षा पहुंचाने एवं पेड़ कि छाव के नीचे जमीन पर बैठकर शिक्षा की अलख जगाने पच्चीस वर्ष पूर्व से नियुक्त शिक्षक अपनी बेबसी लाचारी मजबूरी आवश्यकता को ध्यान मे रख स्वर्णिम भविष्य कि प्रत्याशा मे अपनी जवानी को न्योछावर कर दिया, और अबअपने बुढ़ापे को लेकर वही शिक्षाकर्मी गुरुजी एवं नवीन संवर्ग के कर्मचारियों के दिल दिमाग़ मे निराशा एवं हताशा के भाव स्पष्टता दिखाई दे रहे है ।
गुणवक्ता युक्त शिक्षा मे अमूलचूक परिवर्तन की बजाय साल 1995 मे नियुक्त शिक्षाकर्मियों, गुरुजियों, संविदा शिक्षकों, अध्यापकों और अब प्राथमिक, माध्यमिक उच्च माध्यमिक का महज पदनाम देकर उसकी हर बार वरिष्ठता को खत्म कर नया नवेला कर्मचारी बनाती गई, परिणाम यह हुआ की आज प्रदेश का शिक्षक पेंशन कर्मोन्नति, पदोन्नति सहित अन्य आर्थिक लाभों से वंचित होता गया ।
मात्र पांच सौ रुपये की मासिक पगार से नियुक्त होने वाला शिक्षक आज हजार से पंद्रह सौ रुपये की मासिक पेंशन पर सेवानिवत्त हो रहा है। खुशहाल बुढ़ापा जीने का सपना संजोये ये कर्मचारी क्या इन चंद रुपियों की मासिक पेंशन से अपना आखिरी जीवन खुशहाली से जी सकेगें ?
एक जनवरी 2005 से बंद पुरानी पेंशन नियम 1976 का लाभ देने की बजाय सरकार नई पेंशन के नाम पर कर्मचारियों कि बिन मर्जी के वेतन का दस प्रतिशत अंशदान शेयर मार्केट में क्यो लगा रही है ?
शिक्षा जैसे पवित्र मंदिर के पुजारी जिनको अपने मंदिर मे कर्तव्य पालन कर नौनिहालों को देश सेवा के लिए तैयार करने का जिम्मा है । वही पुजारी अपनी दशा दुर्दशा से ग्रसित हो,दुखी हो और आये दिन अपने जायज हक के लिए सड़को पर आंदोलित हो तो हम स्वर्णिम मप्र की कल्पना कैसे कर सकते है ।
शासन के तय नियमों के अनुसार कर्मचारियों को पांच वर्ष की सेवा पर ग्रेज्यूटी एवं बारह वर्ष की सेवा उपरांत कर्मोन्नति देने का विधान है, किन्तु विगत चार बरस से सरकार अपने ही नियमों का पालन ना करते हुए इस लाभ पर भी कुंडली मारे बैठी है । परिणाम आज हमारे साथी इन लाभों से भी वंचित होकर सेवानिवत्त हो रहे है, यह सरकार और समाज दोनो के लिए यह सोचनीय बिषय नही है ।
अनुकम्पा नियुक्ति एक सहज सरल प्रक्रिया थी, किन्तु अब यह अमृत निकालने जैसे समुद्र मंथन से भी ज्यादा कठिन हो गई है ।
कोरोना काल या उसके आगे पीछे असमय दिवंगत हो चुके शिक्षकों जिनके परिवार को अनुकम्पा नियुक्ति की तत्काल आवश्यकता थी, किन्तु आदेश के इंतजार मे सालों बीत गये, आज वो मजदूरी करने को मजबूर है ।
शिक्षा समाज के उत्थान और देश के नव निर्माण की महत्वपूर्ण कड़ी है, विद्या, विद्धार्थी और विद्यालय को सत्य निष्ठा ईमानदारी से अव्वल दर्जे तक पहुंचाने मे शिक्षक कि महत्वपूर्ण भूमिका होती है। अतः सरकार को चाहिए कि शिक्षक भय मुक्त और चिंता मुक्त होकर अपने कर्तव्यपथ पर हो ।

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