बिना कार्य योजना और घोषणा-पत्र वाली नई नगर सरकार, मुद्दे वही सिर्फ चेहरा नया

सिलवानी। पार्षदों को जीताने की खींचतान के बाद अब सभी की निगाहें अध्यक्ष की कुर्सी पर है और इसी बात के इंतजार पर है कि आखिर कौन होगा पांच साल का ‘राजा‘। हालांकि भले ही जनता ने पार्षदों को चुनकर अपनी भड़ास निकाल ली हो या यूं कहें कि मत का उपयोग कर लिया हो लेकिन यहां गठित होने वाली नई परिषद न सिर्फ बिना योजना की होगी, बल्कि ऐसा भी पहली बार ही होगा कि बिना किसी घोषणा-पत्र के ही परिषद बैठेगी।
दरअसल, घोषणा-पत्र 10 से भी ज्यादा साल पुराने पेंडिंग हैं, जो कि पूरे नहीं हो पाए हैं। ऐसे में नई परिषद का काम यह जरूर आसान हो गया है कि उन्हें ज्यादा दिमाग नए चुनावी घोषणा-पत्र में नहीं लगाना होगा। यानि पुराने ही इतने ज्यादा मुद्दे हैं कि जिनके बारे में मौखिक तौर पर लोगों को सब याद है। इसी कारण नई परिषद में बैठने वाले अध्यक्ष के सामने वे तमाम मुद्दे सामान्य और पुराने ही लगेंगे जिन्हें वे खुद सालों से झेल रहे हैं, जिन्हें लेकर जनता जूझ भी रही है। जनता ने भी यह तय मान लिया है कि मुद्दे तमाम वे ही हैं सिर्फ नाम के लिए नया चेहरा सामने आया है।
जनता सिर्फ देखेगी, पार्टी ही उन्हें थोपेंगी नया अध्यक्ष
अप्रत्यक्ष प्रणाली वाले चुनाव में जनता को सरकार ने सिर्फ पार्षद चुनने का मौका दिया है। यानि अब बची हुई पूरी प्रक्रिया पार्टी को ही करना है। बीजेपी को तय करना है कि अध्यक्ष का दावेदार उनका कौन होगा? कुल मिलाकर जनता को सिर्फ देखना है। पार्टी ही उन पर एक नया चेहरा थोपेंगी। उसी को आपको स्वीकार भी करना है, भले ही आपका मन न माने या आपके (जनता) अंदर गुस्सा ही क्यों न हो। अप्रत्यक्ष प्रणाली के चुनाव में थोपेंने वाली ही प्रक्रिया परिषदों में होती है जिसे अगले पांच साल के लिए स्वीकारना होगी।
मिशन-2023 ध्यान रख तय होंगे दावेदार
नगरीय निकाय चुनाव में भाजपा दल अपना निजी हित निश्चित तौर पर देखेंगे और देख रहे हैं। न सिर्फ प्रत्याशी चयन में बल्कि अब नगर सरकार के लिए चुने जाने वाले दावेदारों, प्रत्याशियों के लिए भी उन्हें मिशन-2023 पर ध्यान रखना है। अब बनने वाला अध्यक्ष या दावेदार ही आगामी विधानसभा चुनावों की रणनीति, दिशा तय करेगा। उसी के आधार पर आगे की कहानी कही जाएगी। इसलिए फिलहाल सब चुप हैं औैर अपनों को साधने में लगे हैं। कोई भोपाल जा रहा है तो कोई अपने आका के चक्कर लगा रहा। वरिष्ठ नेतृत्व से संपर्क कर अपने नंबर बढ़ाने में सब लगे हैं। हालांकि किसके पाले में गेंद होगी यह फिलहाल तय नहीं हो सका है।
जानिये मुद्दे जिनमें उलझकर पांच साल रहना है नए अध्यक्ष को मुद्दे चुनौतियां
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नोटः अन्य कई मुद्दे हैं जिन्हें लेकर चुनौती का सामना नई परिषद को करना है ।



