धार्मिक

जीवन के अंत समय में भगवान का स्मरण हो जाये, तो सीधे मोक्ष : पंडित रेवाशंकर शास्त्री

सिलवानी । समीप में स्थित ग्राम सिवनी में आयोजित श्रीमद् भागवत महापुराण के द्वितीय दिवस पर व्यासपीठ पंडित रेवाशंकर शास्त्री ने कहा कि जीवन का अंतिम सत्य तो मृत्यु है, अतः हमको जीवन रहते अपने आत्मकल्याण का प्रयास पूर्ण कर लेना चाहिए, यह संसार मिथ्या है, जबकि सत्य परमात्मा है,जिनको प्राप्त करने का प्रयास हमें निरंतर करते रहना चाहिए, संसार के आदि मूल में परमात्मा ही है, जब कुछ नहीं था तव वह शक्ति थी, भौतिक व्यामोह को त्यागकर हमें यह प्रयास करना चाहिए कि वह अंतिम समय में भगवान का स्मरण कर पाता है, उनमें चित्त लग पाता है, यह अनेक पुण्यो का प्रतिफल होता है, जिस कुल में भगवान का भक्त जन्म ले लेता है, उस कुल का सहज ही उद्धार हो जाता है, सत्य आचरण से मन सदा परमात्मा में लगा रहे।
शास्त्री जी ने कहा कि राजा उत्तानपाद की कथा सुनाते हुए कहा कि बालक ध्रुव के मन में पिता के स्नेह का अभाव आ गया तो वह अपनी माता से कहते हैं कि मुझे पिता के गोद में बैठने की इच्छा है, मुझे वह स्नेह करें, लेकिन उनकी सौतेली माता सुरुचि ने उनको दूर कर दिया, तो ध्रुव के बाल मन पर विपरीत प्रभाव पड़ा तो ध्रुव की माता सुनिति ने उस बालक से कहा कि तुम जगत पिता की गोद में जाकर बैठना, जाकर तपस्या करो जिससे तुमको उनकी कृपा प्राप्त हो सके, ध्रुव ने माता की आज्ञा से तपस्या से परमात्मा को प्राप्त किया,bभगवान नारायण ने धुव को अक्षय पद प्रदान किया, हमारे जीवन का भी लक्ष्य यही होना चाहिए कि हम परमात्मा को प्राप्त करें, ध्रुव को पांच वर्ष की अवस्था में भगवान की प्राप्ती हुई। कलिकाल में काम, कोध्र, तमोगुण आदि का आधिक्य है, इनसे मुक्ति परमात्मा की कृपा से ही प्राप्त हो सकती है, आत्म शुद्धि के लिए चित्तशुद्धि,भाव शुद्धि आवश्यक है। मन, वचन, कर्म से प्रवृत्ति को पवित्र रखकर जीवन यापन करना चाहिए। जीवन यापन ऐसा हो कि अंत काल सुधर जाये , और श्रेष्ठ गति हमे प्राप्त हो जाये। जड़भरत ने मृग योनि को शांत चित्त से पूर्वजन्म की स्मृति को धारण करके, कालांतर में अपने पूर्व जन्म के तपस्या स्थल पर जाकर निवास किया और पवित्रमन से अपना जीवन त्याग दिया। अगले जन्म में उनको मनुष्य शरीर मिला, जिसे उन्होंने मोक्ष का साधन बना लिया। इसी भाँति हम जगत के मोह को त्याग कर, परमात्मा का चिंतन करके, अपने आत्मकल्याण के लिए, तत्पर होना हमारा ध्येय होना चाहिए। संसार में सर्वत्र दुखरुप मोह व्याप्त है, यही मोह परमात्मा की माया है, जिसमें सभी प्राणी मोहित हो जाते हैं, और उनको संसार सत्य जान पड़ता है,जबकि संसार सत्य नहीं है,परमात्मा ही सत्य हैं। उन सत्य स्वरुप ईश्वर का आश्रय लेकर जीवन जीना चाहिए।
पंडित रेवाशंकर शास्त्री ने कहा कि जीवन में धर्म का प्रत्यक्ष आश्रय हमारा कल्याण करता है, वह व्यक्ति जो धर्ममय आचरण करते हुए, अपना जीवन यापन करता है, उसका कल्याण अवश्य होता है, जीवन में पुण्य कर्म करते हुए,अपने कर्तव्यों का निर्वाह करना ही धर्म है । जीवन में पवित्र कार्य से पवित्र धन कमाना और उस धन से धर्म के कार्य करना चाहिए।

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