धूम-धड़ाके से परिपूर्ण होगी चहल-पहल, 4 नवंबर को निद्रा से जागेंगे श्री हरि, तुलसी- शालिगराम का होगा विवाह
सिलवानी। देवउठनी एकादशी इस साल 4 नवंबर को मनाई जाएगी। इस दिन लोग घरों में भगवान सत्यनारायण की कथा और तुलसी-शालिग्राम के विवाह का आयोजन करते हैं। देवउठनी एकादशी से मंगलकार्य शुरू हो जाते हैं। माना जाता है कि देवउठनी एकादशी को भगवान श्रीहरि चार माह की गहरी निद्रा से उठते हैं। भगवान के सोकर उठने की खुशी में देवोत्थान एकादशी मनाया जाता है। इसी दिन से सृष्टि को भगवान विष्णु संभालते हैं। इसी दिन तुलसी से उनका विवाह हुआ था। चार महीनों की गहन निद्रा के बाद देवगणों के जाग उठने और लोकमंगल से जुड़े लंबित कार्यों को निपटाने का दिन नजदीक आ गया है तथा चार महीनों से मांगलिक आयोजनों पर लगे उस पारंपरिक विराम का हटना भी तय हो गया है जो देवशयन की मान्यताओं के कारण सनातन समाज को शुभ-मंगल के प्रतीक आयोजनों से दूर बनाए हुए था। समूचा जनजीवन सुदीर्घकाल से चली आ रही धार्मिक लोक-मान्यताओं से जुड़े उस दिवस विशेष को लेकर उल्लासित है जिसे अंचल भर में देवउठान एकादशी के रूप में जाना-पहचाना जाता है। यही कारण है कि समूचा आस्थावान जनजीवन 4 नवंबर को देवगणों को जगाने और लोकमंगल की कामनाओं के साथ उनकी मान-मनौतीपूर्ण अगवानी करने को लेकर तत्पर दिखाई दे रहा है। नगरीय क्षेत्र से लेकर ग्रामीण अंचलों तक देवोत्थान अर्थात देव-उठान एकादशी की धूम बनी हुई है तथा मांगलिक आयोजनों के उस नए सत्र की शानदार अगवानी को लेकर समूचा जनजीवन उत्साहित है जिसका विधिवत श्रीगणेश 4 नवबर शुक्रवार से होने जा रहा है। सर्वाधिक उल्लास उन अनगिनत परिवारों में है जो विगत एक माह से किसी न किसी मांगलिक आयोजन की तैयारियों में मनोयोग से जुटे हुए थे तथा इस आयोजन की संपन्नता के लिए देवोत्थान की प्रतीक्षा में थे। जो परिवार प्रत्यक्षतः किसी मांगलिक आयोजन से सरोकार नहीं रखते उनकेे उल्लास का कारण समाज या करीबियों के यहां आयोजित होने वाले वैवाहिक आयोजन बने हुए हैं। कुल मिलाकर समूचे जनसमाज पर लोकमंगल के महापर्व देवोत्थान का उल्लास हावी बना हुआ है।


