पति की मौत के बाद दुकान संभाली, तीन बेटियों को बनाया इंजीनियर, आर्किटेक्ट और डॉक्टर

मदर्स डे पर मृगांचल एक्सप्रेस की ब्यूरो रिपोर्ट
सिलवानी। एक मां अपने बच्चों की खातिर किसी भी हद तक संघर्ष कर सकती है, उसी की मिसाल है यह कहानी। दीप्ति जैन गंजबासौदा निवासी हरीशचंद जैन की सुपुत्री है उनका विवाह सिलवानी निवासी संजय जैन से हुआ था। उनके पति सिलवानी में संजय जैन बर्तन एवं स्टील फर्नीचर की दुकान का संचालन करते थे। जो कि नगर के मुख्य मार्ग पर किराये के शटर में थी और क्रिकेट के अच्छे खिलाड़ी थे। केंसर की बीमारी से ग्रस्ति होने के बाद वर्ष 2009 में हार्ट अटैक आने से नियति के आगे काल के गाल में समा गये। उस वक्त वह अपने पीछे तीन बेटियां 12, 10 एवं 4 साल को मां दीप्ति की गोद मे रोता बिलखता छोड़ गये। इस हादसे के बाद दीप्ति का पूरा जीवन बदल गया। संजय जैन की मौत के बाद उनके परिवार ने तीन दिन बाद ही संजय की पत्नि दीप्ति से रिश्ते नाते तोड़ कर उन्हें अपने हाल पर छोड़ दिया, तब दीप्ति को अपने पिता हरीशचंद जैन की हिम्मत और सहारे ने जीवन जीने और बेटियों को पालने का रास्ता दिखाया और काफी सहयोग किया। इस तरह तीन बेटियों को पालने की जिम्मेदारी उनके हिस्से में आ गई। उन्होेने अपने पति का व्यवसाय को संभालने का निर्णय लिया और संजय बर्तन एवं फर्नीचर का संचालन प्रारंभ किया, शुरू में उन्हें काफी समस्याओं का सामना करना पड़ा, धीरे धीरे वह चौका चूल्हा गृहिणी का काम छोड़कर प्रतिदिन घर में बच्चों को भोजन, बनाकर मंदिर दर्शन के बाद 11 बजे दुकान खोलना और रात 9 बजे तक की दिनचर्या बना ली। और घर पहुंचकर बच्चों के लिए मां की जिम्मेदारी का निर्वाहन करने लगी मसलन भोजन और बेटियों की पढ़ाई होमवर्क पर कराने लगी, इस एक मां ने डबल रोल में अपनी जिम्मेदारी उठाई दिन में पिता की तो रात एक मां के रूप में निभाई। उनकी दिन रात की मेहनत से बड़ी बिटिया को इंजीनियर, तो दूसरी बिटिया इंटेरियर आर्किटेक्ट बनाया तो तीसरी और छोटी बिटिया मेडीकल काॅलेज में प्रवेश दिलाया।
दीप्ति बताती हैं ‘मैंने सोच लिया था कि मैं अपनी बेटियां को पढ़ाकर स्वयं के पैरों पर खड़ा करूंगी, यदि हम जो भी ठान ले तो वह पूर्ण होने में शुरू में परेशानियां तो आती परंतु एक दिन मंजिल जरूर मिलती है। मेरे पति की मौत के दिन बाद ही ससुराल पक्ष ने रिश्ते नाते तोड़ कर हमें हमारे हाल पर छोड़ दिया, इसके बाद पिताजी की सहयोग और हिम्मत ने हमें इस मुकाम पर पहुंचाया। मैं सभी महिलाओं से यही कहूंगी, मुसीबत में हिम्मत नहीं हारे, कुछ कर गुजरने की ठान ले तो कोई कार्य अंसंभव नहीं है। इस परिवार पर दो आंखों के बिना जग अंधियारा वाली कहावत चरितार्थ होती है।



