ज्योतिषधार्मिक

Today Panchang आज का पंचांग बुधवार, 22 अप्रैल 2026

आचार्य श्री गोपी राम (ज्योतिषाचार्य) जिला हिसार हरियाणा मो. 9812224501

जय श्री हरि

🧾 आज का पंचांग 🧾

बुधवार 22 अप्रैल 2026ॐ एकदन्ताय विद्महे वक्रतुंडाय धीमहि तन्नो बुदि्ध प्रचोदयात ।।☄️ *दिन (वार) – बुधवार के दिन तेल का मर्दन करने से अर्थात तेल लगाने से माता लक्ष्मी प्रसन्न होती है धन लाभ मिलता है। *बुधवार का दिन विघ्नहर्ता गणेश का दिन हैं। बुधवार के दिन गणेश जी के परिवार के सदस्यों का नाम लेने से जीवन में शुभता आती है।बुधवार के दिन गणेश जी को रोली का तिलक लगाकर, दूर्वा अर्पित करके लड्डुओं का भोग लगाकर उनकी की पूजा अर्चना करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।🔮 शुभ हिन्दू नववर्ष 2026 विक्रम संवत : 2083 सिद्धार्थी विक्रम : 1969 शर्वरी🌐 रौद्र संवत्सर विक्रम संवत 2083,✡️ शक संवत 1948 (पराभव संवत्सर), चैत्र☮️ गुजराती सम्वत : 2082 पिङ्गल☸️ काली सम्वत् 5127🕉️ संवत्सर (बृहस्पति) पराभव☣️ आयन – उत्तरायण☂️ ऋतु – सौर ग्रीष्म ऋतु☀️ मास – बैशाख मास🌘 पक्ष – शुक्ल पक्ष📅 तिथि – बुधवार बैशाख माह के शुक्ल पक्ष षष्ठी तिथि 10:49 PM तक उपरांत सप्तमी🖍️ तिथी स्वामी – षष्ठी के देता हैं कार्तिकेय। इस तिथि में कार्तिकेय की पूजा करने से मनुष्य श्रेष्ठ मेधावी, रूपवान, दीर्घायु और कीर्ति को बढ़ाने वाला हो जाता है। यह यशप्रदा अर्थात सिद्धि देने वाली तिथि हैं।💫 नक्षत्र- नक्षत्र आद्रा 10:13 PM तक उपरांत पुनर्वसु🪐 नक्षत्र स्वामी – आर्द्रा नक्षत्र का स्वामी ग्रह राहु है। और इसके अधिपति देवता भगवान शिव के उग्र रूप के देवता तूफानों के स्वामी रुद्र हैं।⚜️ योग – अतिगण्ड योग 09:08 AM तक, उसके बाद सुकर्मा योग⚡ प्रथम करण : कौलव 12:01 PM तक✨ द्वितीय करण : तैतिल 10:50 PM तक, बाद गर🔥 गुलिक काल : – बुधवार को शुभ गुलिक 11:10 से 12:35 बजे तक⚜️ दिशाशूल – बुधवार को उत्तर दिशा में दिशा शूल होता है ।इस दिन कार्यों में सफलता के लिए घर से सुखा / हरा धनिया या तिल खाकर जाएँ🤖 राहुकाल : – बुधवार को राहुकाल दिन 12:35 से 2:00 तक । राहु काल में कोई भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिए🌞 सूर्योदयः – प्रातः 05:41:00🌅 सूर्यास्तः – सायं 06:28:00👸🏻 ब्रह्म मुहूर्त : प्रातः को 04:21 ए एम से 05:05 ए एम🌇 प्रातः सन्ध्या : प्रातः को 04:43 ए एम से 05:49 ए एम🌟 अभिजित मुहूर्त : कोई नहीं✡️ विजय मुहूर्त : दोपहर को 02:30 पी एम से 03:22 पी एम🐃 गोधूलि मुहूर्त : शाम को 06:50 पी एम से 07:12 पी एम🌌 सायाह्न सन्ध्या : शाम को 06:51 पी एम से 07:57 पी एम💧 अमृत काल : दोपहर को 12:57 पी एम से 02:26 पी एम🗣️ निशिता मुहूर्त : रात्रि को 11:57 पी एम से 12:41 ए एम, अप्रैल 23❄️ रवि योग : प्रातः 05:49 ए एम से 10:13 पी एम🚓 यात्रा शकुन- बुधवार को हरे फ़ल खाकर अथवा दूध पीकर यात्रा पर निकलें।👉🏼 आज का मंत्र-ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं स: बुधाय नम:।🤷🏻‍♀️ आज का उपाय-किसी बटुक को सवाकिलो साबुत मूंग परिपूरित कांस्य पात्र भेंट करें।🪵 वनस्पति तंत्र उपाय-अपामार्ग के वृक्ष में जल चढ़ाएं।⚛️ पर्व एवं त्यौहार – रामानुज जयन्ती/ स्कन्द षष्ठी/ रवि योग/ आडल योग/ विडाल योग/ आध्यात्मिक संत स्वामी सच्चिदानंद प्राकट्योत्सव/ विश्व पृथ्वी दिवस, (काकोरी कांड के क्रांतिकारी) जोगेशचंद्र चटर्जी शहादत दिवस, निर्माता एवं निर्देशक बी.आर. चोपड़ा पुण्य तिथि, अंग्रेजी साहित्यकार हेम बरुआ जन्म दिवस, विश्व चिंतन दिवस, भारतीय गायिका अंजनीबाई मालपेकर जन्म दिवस, संस्कृति विद्वान श्रीकृष्ण शास्त्री रघुनाथ शास्त्री तालेकर स्मृति दिवस, कार उद्योगपति हेनरी रॉयस स्मृति दिवस, समाज सुधारक आचार्य सुशीलमुनि महाराज स्मृति दिवस, भारत में हरित क्रांति के नायक सर गंगा राम जयन्ती, जल संसाधन दिवस✍🏼 तिथि विशेष – षष्ठी तिथि को तैल कर्म अर्थात शरीर में तेल मालिश करना या करवाना एवं सप्तमी तिथि को आँवला खाना तथा दान करना भी वर्ज्य बताया गया है। इस षष्ठी तिथि के स्वामी भगवान शिव के पुत्र स्वामी कार्तिकेय जी को बताया गया हैं। यह षष्ठी तिथि नन्दा नाम से विख्यात मानी जाती है। यह षष्ठी तिथि शुक्ल एवं कृष्ण दोनों पक्षों में मध्यम फलदायीनी मानी जाती है। इस तिथि में स्वामी कार्तिकेय जी के पूजन से सभी कामनाओं की पूर्ति होती है। विशेषकर वीरता, सम्पन्नता, शक्ति, यश और प्रतिष्ठा कि अकल्पनीय वृद्धि होती है।🏘️ Vastu tips 🏚️आचार्य श्री गोपी राम के अनुसार, चूल्हा अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि सिंक जल तत्व का। आग और पानी स्वभाव से विपरीत माने जाते हैं। जब ये दोनों एक ही स्लैब पर या बहुत करीब होते हैं, तो इसे ऊर्जा का संघर्ष माना जाता है। मान्यता है कि इससे घर में बेवजह तनाव, आपसी मतभेद और आर्थिक असंतुलन जैसी स्थितियां बन सकती हैं। साथ ही किचन में काम करने वाले व्यक्ति को मानसिक थकान या बेचैनी भी महसूस हो सकती है।हर घर में किचन का लेआउट बदल पाना आसान नहीं होता। ऐसे में कुछ सरल उपाय अपनाकर स्थिति को संतुलित किया जा सकता है।के लकड़ी का पार्टिशन चूल्हा और सिंक के बीच लकड़ी का छोटा बोर्ड या पतला पार्टिशन रखना एक आसान उपाय माना जाता है। लकड़ी को संतुलन का प्रतीक माना जाता है, जो अग्नि और जल के बीच सामंजस्य बनाने में मदद करती है। यह पार्टिशन बड़ा नहीं होना चाहिए, बस इतना कि दोनों के बीच अलगाव का संकेत दे सके। ♻️ जीवनोपयोगी कुंजियां ⚜️तुलसी में दूध चढ़ाने के लिए गुरुवार का दिन सबसे शुभ माना जाता है। इस दिन सुबह स्नान के बाद एक पात्र में जल लें और उसमें थोड़ा सा कच्चा दूध मिला लें। फिर इसे तुलसी की जड़ में अर्पित करें। दूध अर्पित करते समय ‘महाप्रसाद जननी सर्वसौभाग्यवर्धिनी, आधि व्याधि जरा मुक्तं तुलसी त्वाम् नमोस्तुते।’ इस मंत्र का जाप करें। आर्थिक तंगी से जूझ रहे लोगों को खासतौर से तुलसी पर दूध जरूर चढ़ाना चाहिए।तुलसी पर दूध चढ़ाने के फायदे*जिन लोगों की कुंडली में बृहस्पति कमजोर होता है उनके लिए ये उपाय बेहद लाभकारी साबित हो सकता है। *घर में अशांति का माहौल रहता है तो गुरुवार के दिन तुलसी पर दूध अर्पित करने से आपको लाभ मिलेगा।*मान्यतानुसार रविवार, एकादशी पर और ग्रहण वाले दिन तुलसी पर जल या दूध कुछ भी नहीं चढ़ाना चाहिए। *इस बात का ध्यान रखें कि दूध उबला हुआ नहीं होना चाहिए।🍶 आरोग्य संजीवनी 🥫शहद में कई प्रकार के विटामिन व कैल्शियम होते हैं। परंतु अगर हम इसे गलत ढंग से खाते हैं तो यही शहद हमारे लिए अमृत ना रहकर जहर बन जाती है। शहद को हम लोग कई बार सुबह- सुबह खाली पेट गर्म पानी के साथ ले लेते हैं।*परंतु जिस गर्म पानी में हम शहद डालकर पी रहे हैं वह पानी अधिक गर्म नहीं होना चाहिए। हलके गुनगुने पानी में ही हमें शहद डालकर लेनी चाहिए। चाय या कॉफी के साथ भी शहद लेना हानिकारक होता है। *क्योंकि दोनों ही चीजें अधिकतर हम गर्म ही लेते हैं और अधिक गर्म चीज में शहद लाभ की बजाय नुकसान पहुंचाती है।*घी के साथ अगर शहद को हम लेते हैं तो यह भी नुकसानदायक होती हैं। अगर लेनी भी हो तो हमें दोनों को विषम मात्रा में लेना चाहिए। अगर दोनों को सम मात्रा में ले लेते हैं तो यह शहद हमारे लिए जहर का काम करती है। इस प्रकार से ऐसी स्वादिष्ट गुणकारी और स्वास्थ्यवर्धक चीज को अगर हम सही ढंग से लेते हैं तो यह हमारे लिए अमृत का काम करती है और यही अगर हम गलत ढंग से लेते हैं तो हमारे लिए विष का काम करती है। 🌷 *गुरु भक्ति योग* 🌸 जी। निःसंदेह, भगवान गणेश ने ब्रह्मर्षि पराशर जी के द्वितीय पुत्र के रूप में जन्म धारण किया था। इसकी विस्तृत जानकारी हमको श्रीमद्मुद्गल-उपपुराण में प्राप्त होती है। जिसके बारे में विस्तृत चर्चा निम्न की गई है – ■ श्रीमद्मुद्गल-उपपुराण के अनुसार महामुनि श्री पराशर जी के पुत्रों का विस्तृत वर्णनवत्सला सुत भगवान श्री गणेश (ऋषिवृन्द श्री पराशर जी के द्वितीय पुत्र) – श्रीमद्मुद्गल-उपपुराण* सत्यवती सुत भगवान वेदव्यास श्री कृष्णद्वैपायन (ऋषिवृन्द श्री पराशर जी के प्रथम पुत्र) – श्रीमद्मुद्गल-उपपुराण*■ तथ्यों का विस्तृत विवेचन -◆ भाग १-५ में ऋषिवृन्द श्री पराशर जी के द्वितीय पुत्र भगवान गणेश के बारे में विस्तृत वर्णन दिया गया है।*◆ भाग-७ में मुनिश्रेष्ठ श्री पराशर जी के प्रथम पुत्र वेदव्यास श्री कृष्णद्वैपायन जी के बारे में बताया गया है। इसके अतिरिक्त भाग-२ श्लोक संख्या २१, भाग-६ श्लोक संख्या ३४ में भी भगवान गणेश के अग्रज भगवान वेदव्यास श्री कृष्णद्वैपायन जी के बारे में बताया गया है।■ कथा के विभिन्न भागों की सूची -◆ भूमिकाभाग-१ – मुनि शक्ति तथा ऋषि पराशर के जन्म का वर्णन।* मुनि वसिष्ठ द्वारा पौत्र श्री पराशर जी को शान्तियोग के विषय में ज्ञान प्रदान करना। भाग-२ – महामुनि श्री पराशर द्वारा भगवान गणेश को पुत्र रूप में प्राप्ति हेतु पत्नी वत्सला सहित दस हजार वर्षों तक अत्यन्त कठोर तपस्या करना तथा भगवान गणेश से वर प्राप्त करना। भाग-३ – दुष्ट दैत्यराज गजासुर द्वारा भगवान शिव की कठोर तपस्या करना तथा उनसे अभीष्ट वर प्राप्त कर स्वर्ग पर आक्रमण करना। भाग-४ – महिषासुर के पुत्र गजासुर से भयभीत हुए देवताओं का भगवान गणेश की शरण में जाना तथा स्तोत्र द्वारा प्रसन्न करके उनसे गजासुर के वध हेतु प्रार्थना करना। भगवान गणेश का देवताओं के स्तोत्र से प्रसन्न होकर उन्हें गजासुर वध का आश्वासन देना और माता वत्सला के गर्भ से ऋषिवृन्द श्री पराशर जी के पुत्र रूप में अवतरित होना। ऋषिश्रेष्ठ पराशर द्वारा अपने पुत्र गणेश के जातकर्मादि तथा व्रतबन्ध (यग्योपवित) इत्यादि संस्कार सम्पन्न करना और सभी अङ्गों सहित वेदों की शिक्षा प्रदान करना। महर्षि मरीचि की पुत्री बुद्धि और सिद्धि से श्री गणेश जी का विवाह होना।*भाग-५ – नारद मुनि द्वारा गजासुर को भगवान श्री गणेश जी का ऋषि पराशर के पुत्र रूप में अवतरित होने के विषय में बताना तथा दैत्यगणों सहित क्रोधित गजासुर का मुनि पराशर के आश्रम के लिए प्रस्थान करना। गणेश की माया से मोहित होकर उन सबके द्वारा श्री गणेश जी का स्तवन करना।भाग-६ – भगवान गणेश का गजासुर की सेना से युद्ध करना। तथा गजासुर की सेना का हार कर युद्धक्षेत्र से पलायन करना। अन्त में गणेश और गजासुर के युद्ध में गजासुर के वध का वर्णन किया गया है।गजासुर के वधोपरान्त देवताओं द्वारा गणेश को स्तोत्र द्वारा प्रसन्न करना। तथा भगवान गणेश के अवतार के उद्देश्य के पूर्ण हो जाने के बारे में जानकर उनके पिता श्री पराशर और माता वत्सला का शोक के सागर में डूब कर मूर्छित हो जाना।भगवान गणेश द्वारा अपने माता-पिता को मूर्छित अवस्था से निकालना तथा शान्तियोग का ज्ञान देकर उन्हें समझाना।अन्त में भगवान गणेश का इस भूलोक से अंतर्ध्यान हो जाना तथा अपने लोक में पुनः विराजमान होना।◆ भाग-७ – मुनिश्रेष्ठ श्री मुद्गल जी के द्वारा दक्ष को भगवान गणेश के अग्रज वेदव्यास श्री कृष्णद्वैपायन जी के बारे में बताना।अपने ज्ञान के अहंकार में भगवान वेदव्यास का श्री गणेश जी को स्मरण न करना तथा इस प्रकार उनके द्वारा सम्पूर्ण वेदों के ज्ञान खो देना।वेदव्यास कृष्णद्वैपायन जी द्वारा भगवान ब्रह्मा से पुनः पुराणों का श्रवण करना और गाणपत्य बन जाना।◆ परिशिष्ट – भगवान श्री पराशर ने जिस स्थान पर अपने पितामह मुनिश्रेष्ठ श्री वसिष्ठ जी से शान्तियोग को प्राप्त किया था उस पवित्र ‘योगभूमि’ का लिङ्गपुराण में वर्णन।■ भूमिका -🌻ॐ पराशरं वेदनीधिं नमस्ये।🌻ज्ञानावतारस्य च जन्महेतुं सत्कर्म सद्धर्मविदां वरिष्ठम् ।पराशरं सत्त्वनिधिं विधिज्ञं नमामि भक्त्या परमं महर्षिम् ॥८॥_अर्थात – जो ज्ञान के अवतार हैं तथा सत्कर्म ही जिनके जन्म (के ऐश्वर्य, वैभव तथा सुख) – के कारण है, तथा जो सद्धर्म जानने वालों में श्रेष्ठ हैं, ऐसे सत्वनिधि (सत्वगुण से युक्त), विधिज्ञ (विधि को जानने वालों में श्रेष्ठ), परम् महर्षि पराशर को मैं भक्तिपूर्वक प्रणाम करता हूँ।सात भागों में विभक्त यह पोस्ट उन लोगों के लिए है जो देव श्री चंडोही (भगवान श्री गणेश) जी को कभी महर्षि पराशर का भाई तो कभी पोता बना देते हैं। और कभी-कभी तो श्री शुकदेव मुनि को देव चंडोही (श्री गणेश भगवान) का भाई बना देते हैं। मतलब कुछ भी, जो उनकी समझ में आता है, वो सम्बन्ध किसी भी देवता का दूसरे देवता के साथ जोड़ लेते हैं। श्रीमद्मुद्गल-उपपुराण में स्पष्टतया यह बताया गया है कि भगवान गजानन (गजवक्त्र स्वरूप को धारण करने वाले श्री गणेश जी) ने महर्षि पराशर के संयोग से देवी वत्सला के गर्भ से जन्म लिया था।श्रीमद् मुद्गल-उपपुराण में यह भी बताया गया है कि भगवान गजानन को पुत्र रूप में प्राप्त करने के लिए महर्षि पराशर दस हज़ार वर्षों तक उनकी उग्र तपस्या करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप भगवान गजानन (गजवक्त्र गणेश) उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें यह वरदान देते हैं कि वे भविष्य में उनके पुत्र रूप में जन्म लेंगे। इस प्रकार कहकर भगवान गजवक्त्र (गणेश) अन्तर्ध्यान हो जाते हैं। श्रीमद्मुद्गल-उपपुराण के अध्याय ३३ में वर्णित देवताओं द्वारा रचित श्रीगजाननस्तोत्रम् के निम्न दो श्लोक इस तथ्य को प्रमाणित भी करते हैं।═══════◄••❀••►═══════⚜️ षष्ठी तिथि आपके उपर यदि मंगल कि दशा चल रही हो और आप किसी प्रकार के मुकदमे में फंस गये हों तो षष्ठी तिथि को भगवान कार्तिकेय स्वामी का पूजन करें। मुकदमे में अथवा राजकार्य से सम्बन्धित किसी भी कार्य में सफलता प्राप्ति के लिये षष्ठी तिथि को सायंकाल के समय में किसी भी शिवमन्दिर में षण्मुख के नाम से छः दीप दान करें। कहा जाता है, कि स्वामी कार्तिकेय को एक नीला रेशमी धागा चढ़ाकर उसे अपने भुजा पर बाँधने से शत्रु परास्त हो जाते हैं। साथ ही सर्वत्र विजय कि प्राप्ति होती है।।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button