मध्य प्रदेश

हे दीनदयाल के वंशजों ! न्याय करो !!

दिव्य चिंतन : हरीश मिश्र, लेखक, स्वतंत्र पत्रकार
मृत्यु अटल है! उसे कोई नहीं टाल सकता। पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेई ने लिखा था…
ठन गई!
मौत से ठन गई!
जूझने का मेरा इरादा न था,
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था ।
रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,
यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई।
कल हरदा में रिहायशी इलाके में बनी एक पटाखा फैक्ट्री में धमाके होने से साठ से अधिक घरों में भीषण आग लग गई , नगर जलता रहा। मौत ने आत्मघाती हमला किया।
सड़कों पर लाशें पड़ी थी, धमाके इतने भीषण थे कि लोग बचाओ ! बचाओ !! चीखते हुए भाग रहे थे। चीख से कोहराम मच गया। हरदा की चीख वल्लभ भवन तक सुनाई दे रही थी। दमकलों का दम निकल रहा था। एंबुलेंस के सायरन की आवाज कमजोर दिलों को झकझोर रही थी। मृतकों की आत्मा, परिजनों के मौत पर बहते हुए आंसू और मौत से संघर्ष कर रहे प्राण बार बार दीनदयाल के वंशजों से यह प्रश्न पूछ रहे हैं कि हमारा क्या कसूर।
किसी की मांग का सिंदूर, किसी का बेटा, किसी की मां, किसी के बाप की मौत से ठन गई! उनका जूझने का इरादा नहीं था ! घर से निकले, तब इस मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था! मौत रास्ता रोक कर खड़ी हो गई , ज़िन्दगी से बड़ी हो गई ! कुछ झुलस गए , कुछ मूर्च्छित हो गए, कुछ के प्राण चले गए। प्रलय जल से ही नहीं, अग्नि से भी आती है यह अनुभव हुआ। मौत की अट्टहास का बवंडर देखा। परिवार जनों को दाह संस्कार और कपाल क्रिया का अवसर भी न मिल सका।
जिला प्रशासन के भ्रष्ट आचरण के संरक्षण में अग्रवाल बंधुओं द्वारा पैसे की हवस में निर्मित लाक्षागृह में ग्यारह लोगों ( सरकारी आंकड़े अनुसार ) ने अग्नि समाधि ली। जो बच गए जिंदगी और मौत से अभी भी लड़ रहे हैं।
सारा देश-प्रदेश हरदा में मौत के तांडव से दहशतज़दा है। इन धमाकों ने जहां प्रदेश के संवेदनशील नागरिकों के दिलों को दहलाया है वहीं सरकार और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर प्रश्न चिन्ह खड़े किए हैं । राजनैतिक संरक्षण में घनी आबादी के क्षेत्र में पटाखे निर्माण की फेक्ट्री खोलने की अनुमति कैसे दी गई? दो मौतों पर दस साल की सजा के बाद अपराधी को हाइकोर्ट का जमानती आदेश हमारी न्यायिक प्रणाली पर सवाल खड़े करता है। सवाल तो संभाग आयुक्त के द्वारा दिए स्टे पर भी है। रिहाइशी इलाके में चल रही इस फेक्ट्री में एस डी एम को जांच के दौरान ढेरों गड़बड़ियों मिलीं थीं। उस जांच प्रतिवेदन को प्रशासन ने गंभीरता से क्यों नहीं लिया?अग्रवाल बंधुओं ने प्रशासनिक अधिकारियों के अग्रमुख बंद रखने की कीमत अदा की होगी तभी अवैध कारोबार पर प्रशासन की नज़र नहीं गई।
शिवराज सरकार में बंदूक के लाइसेंस बनवाने में पांच लाख की दलाली नरों में उत्तम पुरुष के दरबार में लगती थी। सोचिए! एक बंदूक लाइसेंस की दलाली पांच लाख और बेगुनाहों की मौत की कीमत चार लाख ? वैसे तो जिंदगी की कीमत नहीं चुकाई जा सकती लेकिन इतना तो दीजिए श्रीमान कि परिवार पांव पर खड़ा हो सके।
मोहन सरकार ने चीख और चीत्कार पर संवेदना का जल छिड़का है। आक्रोश को ठंडा करने के लिए, सरकार की असफलताओं को छुपाने के लिए, किसी की तो कपाल क्रिया करनी ही होगी। इसलिए जिलाधीश और पुलिस अधीक्षक की कपाल क्रिया कर ( स्थानांतरण कर ) श्रद्धांजलि अर्पित कर दी गई।
सरकारें धर्म और नीति की बातें करतीं हैं और उस पथ पर चलती नही हैं। सरकार ने अपने निकम्मेपन और नाकारापन को छुपाने के लिए जांच आदेश दिए गए हैं। जांच का निष्कर्ष कुछ नहीं निकलेगा।
हे मोहन ! हे दीनदयाल के वंशजों !! हे चौकीदर !!! तुम्हारे राज में मूर्ख प्राणी प्रशासन में बैठे अधिकारियों को पैसे देकर मनुष्यभक्षी बन गया। निर्दोषों को काल के हवाले कर दिया। यह भ्रष्टाचार के फल का परिणाम था। अग्रवाल बंधुओं ने आई ए एस और आई पी एस, अधिकारी , कर्मचारियों को ऐशो आराम की जिंदगी देकर ना जाने कितनों की ज़िंदगी ले ली और कितनों को दर्द भरी जिंदगी देकर, कितनों के घर उजाड़ दिए। अग्रवाल बंधुओं को कानून का भय नहीं था ।अग्रवाल बंधु भस्मासुर बन गए तो वरदान नौकरशाही और सरकार का ही था। ऐसा दुस्साहस करने का संरक्षण किसने दिया? कैसे ये इतने शक्तिशाली बने यह भी जांच का विषय है। जो तथ्य सामने आए हैं वे बताते हैं कि विस्फोट के पीछे नौकरशाही की सांठगांठ है।
हर सहानुभूतिपूर्ण और दयालु व्यक्ति की एक आंख में आंसू और दूसरी में हरदा प्रशासन के प्रति आक्रोश है। आंसू उनके प्रति जो लापरवाही के कारण अग्निदाह में विसर्जित हो गए और आक्रोश उन अधिकारियों के प्रति जिन्होंने इस श्मशान घाट निर्माण की अनुमति दी थी। मोहन सरकार को ऐसे भ्रष्टाचारियों से सख्ती से निपटना होगा। सिर्फ गाल बजाने से कुछ नहीं होगा।

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