मध्य प्रदेश

जीवनदायिनी बेलकुंड नदी बनी रेत का मैदान, दर्जनों गांवों में गहराया जल संकट

पेयजल के लिए भटक रहे ग्रामीण पशु-पक्षी और वन्यजीव भी पानी की तलाश में
रिपोर्टर : सतीश चौरसिया
उमरियापान।  उमरियापान- ढीमरखेड़ा क्षेत्र की जीवनरेखा मानी जाने वाली बेलकुंड नदी इस भीषण गर्मी में पूरी तरह सूख चुकी है। नदी का अधिकांश हिस्सा अब रेत के मैदान में बदल गया है, जिससे क्षेत्र के पांच दर्जन से अधिक गांवों में पेयजल संकट गहरा गया है। ग्रामीणों के साथ-साथ मवेशियों और वन्यजीवों के सामने भी पानी की गंभीर समस्या खड़ी हो गई है।
बता दें पोंडी खुर्द, शुक्ल पिपरिया, बरही, कछार गांव छोटा, घुघरी, घुघरा, बिछिया, बरौदा, धनवाही सहित कई गांवों के लोग वर्षों से इस नदी पर घरेलू उपयोग और सिंचाई के लिए निर्भर रहे हैं। लेकिन इस बार नदी में पानी पूरी तरह समाप्त होने से आसपास का भू-जल स्तर भी तेजी से गिर गया है। इसका असर हैंडपंपों और कुओं पर साफ दिखाई दे रहा है, जहां कई हैंडपंप पानी की जगह हवा उगल रहे हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि पहले गर्मी के मौसम में नदी का जलस्तर कम होता था, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। अब नदी में पानी के स्थान पर केवल रेत दिखाई देती है, जिससे खेती-किसानी भी प्रभावित हो रही है।
*अवैध रेत खनन पर उठे सवाल, संरक्षण प्रयासों की प्रभावशीलता पर चर्चा*
स्थानीय लोगों का आरोप है कि नदी के सूखने का फायदा उठाकर अवैध रूप से रेत निकाली जा रही है, जिससे नदी का प्राकृतिक स्वरूप और अधिक प्रभावित हो रहा है। उनका मानना है कि लगातार रेत दोहन भी जल संरक्षण की क्षमता को कम कर सकता है और इस पर प्रभावी निगरानी की आवश्यकता है।
*खेती और आजीविका पर बढ़ा संकट*
पेयजल के लिए महिलाओं और बच्चों को दूर-दूर तक जाना पड़ रहा है, जबकि पशुपालकों को मवेशियों के लिए पानी जुटाने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। दूसरी ओर, नदी और नालों के सूखने से वन्यजीव भी पानी की तलाश में आबादी वाले क्षेत्रों की ओर पहुंच रहे हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि हर वर्ष जल संरक्षण के लिए विभिन्न योजनाएं और अभियान चलाए जाते हैं, लेकिन गर्मी के मौसम में अधिकांश जलस्रोत सूख जाते हैं। नदी में पानी नहीं रहने से फल और सब्जियों की खेती प्रभावित हुई है तथा कई किसान मूंग और उड़द जैसी फसलों की बुआई से भी दूरी बना रहे हैं। क्षेत्रवासियों ने प्रशासन से स्थायी जल संरक्षण उपायों और पेयजल व्यवस्था को मजबूत करने की मांग की है।

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