17 मार्च 2023 : दशामता व्रत, जानिए पूजा विधि और कथा
Astologar Gopi Ram : आचार्य श्री गोपी राम (ज्योतिषाचार्य) जिला हिसार हरियाणा मो. 9812224501
17 मार्च 2023 : दशामता व्रत, जानिए पूजा विधि और कथा
भगवान विष्णु की पूजा सर्वसिद्धिप्रद और सुखदाई होती है। किसी भी रूप में भगवान विष्णु की पूजा की जाए, वह सर्वत्र सफलतादायक हीं होती है।घर की बिगड़ी दशा सुधारने,सुख सम्पन्नता की प्राप्ति और अन्न धन के भंडार भरे रखने के लिए भगवान विष्णु की पूजा पीपल के रूप में करने का विधान दशामाता के दिन बताया गया है।दशामाता व्रत पूजन चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि को किया जाता है।यह व्रत आपके बिगड़े ग्रहों की दशा सुधारकर सुख समृद्धि, सौभाग्य और धन संपत्ति की पूर्ति करवाता है।
इस व्रत को दशामाता व्रत कहा जाता है।दशामाता पूजन इस वर्ष 17 मार्च 2023 शुक्रवार को किया जाएगा।यह व्रत उत्तर भारत के अधिकांश राज्यों में किया जाता है। पश्चिम भारत के गुजरात, महाराष्ट्र आदि राज्यों के भी अनेक भागों में करने की परंपरा है। इस बार दशामाता के दिन सवार्थसिद्धि योग भी बन रहा है जो प्रातः दशा माता पूजन आज : सुबह पौने 10 से 11:13 बजे तक श्रेष्ठ मुहूर्त, इस समयकाल में दशामाता का पूजन सर्व कार्यों में सिद्धि प्रदान करेगा।
दशामाता पूजन विधि
दशामाता व्रत के दिन मुख्यत: विष्णु के स्वरूप पीपल वृक्ष की पूजा की जाती है। इस दिन सौभाग्यवती महिलाएं कच्चे सूत का 10 तार का डोरा बनाकर उसमें 10 गांठ लगाती है और पीपल वृक्ष की प्रदक्षिणा करते हुए उसकी पूजा करती हैं। इसके बाद परिवार के सुख समृद्धि की कामना करते हुए डोरा गले में बांधती है। घर आकर मुख्य प्रवेश द्वार के दोनो ओर हल्दी कुमकुम के छापे लगाती है।इस दिन व्रत रखा जाता है और एक समय भोजन किया जाता है।
भोजन में नमक का प्रयोग वर्जित रहता है। इस दिन प्रातः जल्दी उठकर घर की साफ सफाई करके सारा कचरा बाहर फेंक दिया जाता है।इस दिन किसी को पैसा उधार नहीं देना चाहिए। प्रयास करें किदशामाता पूजा के पूरे दिन बाजार से कोई वस्तु ना खरीदें, जरूरत का सामान एक दिन पूर्व हीं लाकर रख लें।
दशामाता व्रत कथा:नल दमयंती की कथा
बहुत समय पहले की बात है। एक राज्य में राजा नल व उसकी रानी दमयंती रहते थे। उनके दो पुत्र थे। राजा के राज्य में किसी भी प्रकार की कोई कमी नहीं थी। वहां की प्रजा बहुत सुखी व संपन्न थी। राजा के राज्य में हर प्रकार की सुख सुविधाएं उपलब्ध थी।
एक समय की बात है। जब होली के बाद राज महल में दासी काम कर रही थी। वह रानी दमयंती को बता रही थी कि आज उसका दशा माता का व्रत है। आज मैं पीपल के वृक्ष की पूजा कर दशामाता गले में धारण करूंगी। तब रानी दमयंती ने दासी से पूछा कि ऐसा करने से क्या होता है। तब दासी ने बताया कि ऐसा करने से घर की आर्थिक आर्थिक स्थिति सुधरती है। घर में सुख समृद्धि का वास रहता हैं। यह व्रत सभी सुहागन स्त्रियों को करना चाहिए।
यह सुनकर रानी दमयंती ने कहा कि मैं भी यह व्रत करूंगी। तो मुझे बता देना कि यह कैसे किया जाता है। तब दासी ने बताया कि यह व्रत दशमी तिथि के दिन किया जाता है। इस दिन सुबह स्नान कर कर बाल धोकर पीपल के वृक्ष की पूजा की जाती है। दशा माता के नाम का डोरा गले में धारण किया जाता है। दशा माता से घर में सुख समृद्धि की कामना की जाती है।
उसके पश्चात चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि आई। रानी दमयंती ने दसियों के साथ यह दशा माता का व्रत किया। गले में दशा माता का धागा धारण किया।पूजा करने के कुछ समय पश्चात रानी महल मे आई। राजा की नजर रानी दमयंती के गले में पहने हुए धागे पर पड़ी। राजा नल ने रानी दमयंती से पूछा कि यह क्या है। रानी दमयंती ने राजा को सारी बात बताई। कहा कि यह दशा माता का धागा है इससे हमारे महल की दशा सुधरेगी। राज्य में सुख समृद्धि का वास होगा।
राजा यह सुनकर बहुत ही क्रोधित हो गया । वह बोला ऐसा कुछ नहीं होता है। यह कहकर राजा ने रानी के गले से दशामाता का धागा तोड़कर नीचे गिरा दिया। तब रानी ने राजा से बोला कि यह आपने बहुत गलत किया है। आपको ऐसा नहीं करना चाहिए था। रानी ने दशा माता से इसके लिए माफी मांगी और रोने लगी।
कुछ दिनों बाद राजा के स्वप्न में एक बुढ़िया आई । उसने राजा से कहा कि पहले तेरे राज्य की स्थिति बहुत अच्छी थी क्योंकि तेरी दशा बहुत अच्छी चल रही थी। पर अब तेरी दशा बहुत खराब आने वाली है। तेरा राज तुझसे छिन जाएगा। ऐसा सुनकर राजा का स्वप्न टूट गया। कुछ दिनों बाद ऐसा ही हुआ जैसा उस बुढ़िया ने स्वप्न में कहा था। राजा के राज्य की हालत बहुत खराब हो गई। भूखमरी की स्थिति आ गई। राजा का खजाना खाली हो गया। राजा के पास भी अब कुछ नहीं बचा था।
तब उसने सोचा कि हमें यह राज्य छोड़कर जाना ही पड़ेगा। तब राजा ने रानी दमयंती से कहा कि तुम अपने पीहर चली जाओ। पर रानी दमयंती ने कहा कि मैं आपको ऐसी हालत में छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगी। मैं आपके साथ ही रहूंगी। अब जैसा भी होगा हम दोनों एक साथ ही गुजारा करेंगे। तब राजा ने कहा ठीक है लेकिन हमें अपने जीवन का गुजारा बसर करने के लिए कुछ ना कुछ काम करना ही पड़ेगा। इसके लिए हमें राज्य छोड़कर किसी अन्य स्थान पर जाना पड़ेगा। यह कहकर राजा और रानी महल से निकल गए।
कुछ समय तक चलने के बाद राजा व रानी को एक भील राजा का महल दिखाई दिया। तब राजा रानी ने यह निश्चय किया कि वे अपने दोनों पुत्रों को यही भील राजा के पास छोड़ देते हैं। यह सोचकर राजा रानी भील राजा के महल में गए। उन्होंने भील राजा को बोला कि हम हमारे दोनों पुत्रों को आपके पास अमानत के तौर पर छोड़कर जा रहे हैं। जब हमारी स्थिति अच्छी होगी तब हम इन्हें आकर वापस ले जाएंगे। ऐसा कहकर राजा ने अपने दोनों पुत्रों को वहीं छोड़ दिया। राजा और रानी ने अपने आगे की यात्रा प्रारंभ कर दी।
कुछ दूर चलने के बाद राजा के पुराने मित्र का महल आया। राजा नल और दमयंती ने राजा से मिलने के लिए राजा के महल पहुंचे। मित्र राजा ने उनका बहुत आदर सत्कार किया। राजा और रानी को उस ने रात में अपने शयनकक्ष में सुला दिया। रात को जब राजा की नींद खुली तो उसने देखा कि शयन कक्ष के कमरे में एक खूँटी लगी है। जिस पर एक महंगा गले हार टका है। वह खूंटी इस हार को धीरे-धीरे निकल रही है। देखते-देखते खूंटी इस हार को पूरा निकल गई। यह देखकर राजा घबरा गया और रानी को उठाया। वह रानी से बोला कि देखो यह खूंटी इस हार को निगल गई है। अब हमें हमारा मित्र चोर समझेगा। इसलिए हमे इसी समय यहां से चले जाना चाहिए। यह सोचकर राजा रानी दोनों वहां से चुपचाप निकल गए।
जब सुबह मित्र राजा की पत्नी शयनकक्ष में आकर देखती है। तो खूंटी पर हार नहीं था । वह अपने पति से जाकर कहती हैं कि आपके मित्र कैसे चोर हैं। हमने उन्हें खाना खिलाया। उनका आदर सत्कार किया। शयनकक्ष में सुलाया और वह हमारा हार लेकर चले गए। ऐसे कैसे आपके मित्र हैं।
कुछ दिनों तक चलने के पश्चात राजा की बहन का गांव आ गया। तब उसने मुखबिर से सूचना अपनी बहन को पहुंचाई और कहा कि आपके भाई और भाभी दोनों आपके गांव में हैं। बहुत ही बुरी हालत में है। उनके पास ना हाथी घोड़ा कुछ भी नहीं है। वह अकेले ही हैं वह बर्बाद हो चुके हैं। उनका राज पाठ छीन चुका है। यह सुनकर राजा की बहन सोच में पड़ गई। उसने अपने भाई भाभी के लिए सूखी रोटी में प्याज रखकर उनसे मिलने पहुंची। भाई ने तो अपने हिस्से का खाना खा लिया। लेकिन भाभी ने उसके हिस्से का खाना एक गड्ढा खोदकर उसमें दबा दिया।
फिर आगे चल दिए। चलते चलते रास्ते में एक नदी का किनारा आया। राजा और रानी बहुत थक चुके थे। राजा ने नदी में से कुछ मछलियां पकड़ी। उसने रानी को कहा कि आप इन को देखिए मैं गांव में होकर आता हूं। उस गांव में एक साहूकार था। जिसके उस दिन भोज था। राजा वहां से खाना खाकर आ गया।वह रानी के लिए भोजन लेकर लौट रहा था। लौटते समय रास्ते में एक पक्षी ने भोजन पर झपट्टा मारा। जिससे सारा खाना गिर गया।
राजा यह देखकर बहुत ही व्याकुल हो गया। वह सोचने लगा की रानी क्या सोचेगी कि वह अकेले खाना खाकर आ गए। मेरे लिए कुछ भी नहीं लाए। उधर दूसरी ओर रानी के पास जो मछलियां थी। वह जीवित होकर नदी में कूद गई। तब रानी ने सोचा कि राजा क्या सोचेंगे कि रानी ही सारी मछलियां खा गई। मेरे लिए कुछ भी नहीं बचाया। वह यह सोच कर रह गई।
राजा और रानी एक दूसरे की आंखों में देख रहे थे। पर उन्हें कहने की कोई आवश्यकता नहीं पड़ी है। वह दोनों एक दूसरे के भाव समझ गए। वे वहां से चल दिए। चलते चलते रानी का पीहर आ गया। अब उन दोनों ने यह निश्चय किया कि हम दोनों यहीं रह कर कुछ काम करेंगे।यही अपना जीवन यापन करेंगे।रानी तो अपने पिता के राज महल में दासी का काम करने लगी। राजा उसी गांव के तेली की घानी में काम करने लगा। दोनों मन लगा कर मेहनत से खूब काम करते हैं।
कुछ दिनों पश्चात दशा माता का व्रत फिर आया। राज्य की सभी रानियां और दासिया के साथ रानी दमयन्ती ने भी दशा माता का व्रत रखा था। इसलिए सभी सुबह जल्दी ही स्नान कर रही थी। तब रानी दमयन्ती ने सभी रानियों के बाल गुंथे। राजमाता ने दासी (दमयन्ती) से कहा कि आओ मैं तुम्हारा सिर गुंथ दूँ। राजमाता दासी का सिर गूँथने लगी। तब दासी के सिर में राजमाता को एक राज चिन्ह दिखाई दिया। यह देखकर राजमाता की आंखों से आंसू आ गए। आंसू जाकर दासी की पीठ पर गिर गए।
दासी ने पूछा कि आप रो क्यों रही है। तब राजमाता ने बताया कि मेरे एक पुत्री है। उसके सिर पर भी एक ऐसा ही निशान है। यह सुनकर दासी रोने लगी। उसने राजमाता को पूरी बात बताई कि मैं ही आप की पुत्री हूं। हमारे राज्य में विपदा आ गई थी। इसलिए मैं यहां पर दासी का काम कर रही हूं। यह सुनकर राजमाता भावुक हो गई और बेटी को गले से लगा लिया। तब रानी दमयंती ने कहा कि मां मैं भी दशा माता का व्रत करूंगी। दशा माता की कृपा से ही मेरे राज्य की स्थिति वापस सुधर जाएगा। यह कहकर रानी दमयंती ने भी दशा माता का व्रत का संकल्प लिया।
राजमाता ने रानी दमयंती से राजा नल के बारे में पूछा कि वे कहां पर है। तब रानी दमयंती ने बताया कि वह तो एक तेली की घानी में काम करते हैं। राजमाता ने राजा नल को लेने के लिए सैनिक भेजें। उन्हें राज्य में बुलवाया गया। उनका खूब आदर सत्कार किया गया।
समय बीतता गया। कुछ दिनों पश्चात राजा के स्वप्न में फिर वही बुढ़िया आई।राजा से बोली कि तेरी दशा खराब थी। इसलिए तेरे राज्य का यह हाल हुआ। लेकिन अब तेरी दशा अच्छी आने वाली है। वापस तेरा राज्य खुशहाल हो जाएगा। यह सुनकर राजा का स्वप्न टूट गया। कुछ दिनों बाद राजा नल और रानी दमयंती अपने राज्य के लिए निकल गए।चलते चलते राजा नल रानी दमयंती उसी गांव में पहुंचे। जहां राजा की बहन का ससुराल था।
राजा नल ने सैनिकों से बहन को सूचना पहुंचाई कि आपके भैया भाभी आप से मिलने आए हैं। वे बहुत अच्छी हालत में हाथी, घोड़ा, हीरे, जवाहरात आदि अपने साथ लेकर आए हैं।यह सुनकर बहन बहुत खुश हुई। वह भाई भाभी से मिलने के लिए अच्छे-अच्छे पकवान खाना लेकर आई। यह देख कर रानी दमयंती ने कहा बाईसा उस समय हमारी दशा बहुत खराब थी। इसीलिए आपने हमें सूखी रोटी और खाना खिलाया। लेकिन आज हमारी बहुत अच्छी दशा है। इसीलिए आप हमारे लिए पकवान लेकर आई है। लेकिन कोई बात नहीं मैं आपको आपका खाना वापस देना चाहती हूं।
यह कहकर रानी दमयंती ने उस खड्डे को खुदवाया। जिसके अंदर उसने सूखी रोटी वह प्याज दबाया था। जब खड्डे को खोदा गया। तब उसमें से हीरे जवाहरात निकले। हीरे जवाहरात राजा नल ने अपनी बहन को तोहफे के स्वरूप दे दिए और आगे चल दिए।
कुछ दिनों तक चलने के पश्चात राजा के मित्र का गांव आया। फिर वापस वह दोबारा राजा अपने मित्र से मिलने के लिए उसके महल में पहुंचा। राजा ने उसका आदर सत्कार किया। उन्हें वापस उसी शयनकक्ष में सुला दिया। जहां से वह गले का हार गायब हुआ था। जब राजा रात को सो रहा था। तब उसकी नींद खुली, तो उसने देखा कि जिस खूंटी ने हार निकला था। वह वही खूंटी वापस उस हार को उगल रही है। वह हार उसकी खूंटी पर टिका है।
सुबह राजा ने मित्र राजा व उसकी पत्नी को कक्ष में बुलाया। उन्हें यह बताया कि उस समय हमारी दशा बहुत खराब थी। इसीलिए यह हार खूँटी ने निगल लिया था। पर अब दशा माता की कृपा से हमारी दशा बहुत अच्छी व पहले जैसी हो गई है। इसीलिए यह हार खूँटी ने वापस निकाल दिया है। यह रहा आपका हार हम चोर नहीं थे। यह सुनकर मित्र राजा व उसकी पत्नी बहुत शर्मिंदा हुए। वह उनसे माफी मांगने लगे।
अगले दिन राजा नल दमयंती वहां से आगे की यात्रा के लिए निकल गए। चलते-चलते भील राजा का महल आया। तब रानी ने कहा कि हम हमारे दोनों पुत्रों को भी साथ लेकर चलते हैं। जब राजा रानी भील राजा के महल पहुंचे। राजा ने भील राजा से कहा कि हमने हमारे पुत्रों को आपके पास अमानत के तौर पर छोड़ा था। अब हम वापस आ गए हैं। आप हमें हमारे पुत्र वापस दे दीजिए।भील राजा ने उनसे कहा कि आपके कोई पुत्र यहा पर नहीं है। यहां से तो वे भाग गए हैं । रानी ने वहां पर दो सुन्दर बालक देखे। उन्हें देखकर बोली कि यह दोनों तो मेरे पुत्र है। लेकिन भील राजा ने रानी को उसके पुत्र देने से मना कर दिया।
तब रानी दमयंती ने कहा कि अगर ये मेरे पुत्र होंगे तो मेरे सीने से दूध निकल कर इनके मुंह में चल जाएगा। अगर यह आपके पुत्र होंगे तो मेरे सीने से दूध नहीं निकलेगा। यह कहकर उन दोनों पुत्रों को सामने खड़ा कर दिया गया। रानी के सीने से दूध निकल कर उनके मुंह में चला गया। तो रानी ने कहा कि यह मेरे पुत्र है। ऐसा कहकर वह अपने पुत्रों को लेकर वापस अपने राज्य को चले गए। राज्य पहले जैसा खुशहाल और सुख समृद्ध हो चुका था। सभी प्रजा ने राजा और रानी का स्वागत किया।
उसके पश्चात राजा नल रानी दमयंती ने प्रजा में ढिंढोरा पिटवाया की सभी सुहागिन स्त्रियां चैत्र माह की कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि को दशा माता का व्रत करेंगी।जिससे हमारे राज्य में खुशहाली आएगी। उसके पश्चात सभी राज्य की सुहागन महिलाएं दशा माता का व्रत करने लगी है। दशामाता जैसा राजा नल और रानी दमयंती के साथ किया वैसा किसी के साथ मत करना। जैसा राजा नल रानी दमयंती की स्थिति सुधारी। उनको सुख समृद्धि प्रदान की वैसे सबकी करना ।
बोलो दशा माता की जय

