किसानों की राहत राशि वितरण में किये गये घोटाले के दोषियों पर अभी तक नहीं हुई कार्यवाही
ट्रेजरी अधिकारी और पटवारियों की मिलीभगत से हुआ था घोटाला
कलेक्टर ने जांच तो कराई, दो बार जांच दल बदला, परंतु तीन माह बाद भी वही ढाक के तीन पात
किसानों को राहत राशि 18 करोड़ में हुई थी बंदरबाट
सिलवानी। वर्ष 2020-21 में कीट व्याधी, ओलावृष्टि, किसानो की फसलो के हुये नुकसान को लेकर राहत राशि वितरण में किये गये घोटाले की जांच की मांग को मई माह में बजरंग चौराहे पर राष्ट्रीय किसान मजदूर महासंघ ने एक दिवसीय धरना देकर मुख्यमंत्री के नाम तहसीलदार रामजीलाल वर्मा को ज्ञापन सौंपकर जांच की मांग की थी। कलेक्टर ने उक्त प्रकरण की जांच के लिए एक दल घटित कर जांच कराई जा रही है। सवाल यह उठता है सिलवानी के तत्कालीन तहसीलदार ब्रजेशसिंह को जांच दल का प्रभारी बनाया गया था। जबकि उनके कार्यकाल के दौरान उक्त घोटाला हुआ था। इसके बाद मीडिया में मामला उजागर होने पर अन्य दल बनाकर जांच की कराई गई परंतु कार्यवाही आज तक तीन माह बाद भी नही हुई है।
राष्ट्रीय किसान मजदूर महासंघ ने ज्ञापन में मांग की थी कि वर्ष 2020-21 में कीट व्याधी, ओलावृष्टि, किसानो की फसलो के हुये नुकसान को लेकर सरकार द्वारा लगभग 18 करोड की राशि स्वीकृत कर किसानो को राशि वितरण किया जाना थी लेकिन सिलवानी ट्रेजरी अधिकारी चन्द्रभान राजपूत, पटवारी शशांक दुबे एवं अन्य पटवारियो द्वारा बड़े पैमाने पर किसानो को मिलने वाली राहत राशि में घोटाला किया गया है किसानो के कुछ सूचियों में नाम सही लिखे है, कुछ सूचियों में नाम, रकवा तथा ग्राम सही लिखे है लेकिन खाता नम्बर एवं आई.एफ.सी. कोड अन्य लोगो के है जो इस तहसील के निवासी नहीं है, वही दूसरी ओर कुछ किसानो के फर्जी नाम राहत राशि सूची में जोड़कर अनेको बैंको के खातो में किसानो को मिलने वाली राहत राशि डालकर, पटवारी एवं अधिकारियो से सांठ-गांठ करके मिली भगत से करोड़ों रूपयों का घोटाला किया गया है।
वही कुछ किसानो को राहत राशि तो मिली है परन्तु पूरी राशि किसानो को नहीं मिली है। पटवारियो के साथ सिलवानी ट्रेजरी प्रभारी चंद्रभान राजपूत की भूमिका भी संदिग्ध है। पटवारी हल्का जुनिया, नीगरी, आदि सहित अन्य हल्को में व्यापक पैमाने पर भ्रष्टाचार करके घोटला किया गया है। इन सभी की राज्य स्तरीय एवं जिला स्तरीय टीम गठित कर एक सप्ताह के अंदर जांच कराकर, जांच में दोषी पाये जाने पर कर्मचारी एवं अधिकारियों के खिलाफ एफ.आई.आर. दर्ज कराने की मांग की गई थी। परंतु तीन माह बाद प्रषासन कोई कार्यवाही करने की स्थिति में नहीं है।


