पर्यावरणमध्य प्रदेश

जल, जंगल, जमीन हमारी है, हम हर हाल में विस्थापित नहीं होंगे

ब्यूरो चीफ : भगवत सिंह लोधी
दमोह । नोरादेही अभ्यारण्य और रानी दुर्गावती अभ्यारण्य दोनों को जोड़कर सरकार ने वीरांगना रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व बना दिया है। यह सुनकर आदिवासियों या अन्य समाज के लोगों को खुश नहीं होना चाहिए कि रानी के नाम पर टाइगर रिजर्व का नाम रख दिया है। इन दोनों के एक होने से अब और ज्यादा संकट बढ़ गया है। क्योंकि दमोह, सागर, नरसिंहपुर इन तीनों जिलों के बफर जोन में 81 से ज्यादा गांव जोड़े गए हैं। जो कभी भी उठाए जा सकते हैं जबकि यह गांव राजस्व के अंतर्गत आते हैं। 52 से ज्यादा गांव कोर जोन में शामिल किए गए जो विस्थापित होने ही हैं। तो क्या ये समझा जाए कि सरकार को अब इंसानों से नहीं बल्कि जानवरों से ज्यादा लगाव हो गया है। तो फिर मतलब साफ है अब सरकार की नजरों में इंसानों की कीमत एक जंगली जानवर से भी बहुत कम हैं। यदि कीमत होती तो यूं ही नहीं पुरखों के गांव पुष्तैनी जमीनों से बेदखल किया जाता। सरकार मुआवजा के रूप में 15 लाख रुपए दे रही है। क्या विस्थापित लोगों का जीवन मात्र 15 लाख रुपए से सुधर जाएगा ? नहीं सुधरेगा। सरकार को सोचना चाहिए कि विस्थापित किए गए लोगों के बच्चों पर कितना असर पड़ेगा आखिर वो भी तो कल का हिंदुस्तान हैं, उनके साथ ये नाइंसाफी कैसे हो सकती है। सरकार ने नोरादेही अभ्यारण्य के लिए पहले जब गांव खाली करवाए तब किसी ने कुछ नहीं कहा लेकिन अब दोनों अभ्यारण मिलाकर हजारों लोगों को अपने गांव से भगाया जा रहा है। यदि सरकार भगाए गए लोगों की जिम्मेदारी लेती तब तक तो ठीक था। लेकिन इन्हें तो लावारिश की तरह छोड़ा जा रहा है। मेरा सरकार से एक मामूली सा सवाल है कि आप 15 लाख दे भी रहे हैं तो क्या दे रहे हैं ? जिनकी एकड़ो जमीन है उनको क्या मिल रहा है। यदि विस्थापित हो भी गए तो उनके बच्चे कंहा जाएंगे ? वो कंहा पढ़ेंगे ? आखिर उनका भविष्य तो गर्त में ही जा रहा हैं ना ?
आज के दौर में कम से कम हर परिवार को एक करोड़ रुपये मुआवजा मिलता तब है कि लोग अपना जीवन अच्छे से गुजार सकते हैं। लेकिन एक बार विस्थापित होने के बाद उन लोगों का हाल चाल कोई पूछने वाला नहीं है। जो गांव विस्थापित कर दिए गए हैं उन गांव के लोगों की हालत देखिए, उनके बच्चों को देखिए। आखिर उनका क्या कसूर है कि उन्हें अपनी ही जमीन से बेदखल किया जा रहा है। मैं प्रकृति, पर्यावरण और जानवरों का विरोधी नहीं हूं, लेकिन एक बार दिल से कल्पना करिए कि जब लाखों लोग भगाएं जाएंगे तो वो बसेंगे कंहा। जानवर तो जंगलों में भी बसाए जा सकते हैं उनके लिए तो नोरादेही अभ्यारण ही पर्याप्त थी। मगर जब से रानी दुर्गावती अभ्यारण्य को जोड़ा गया है तब से बहुत संकट आ गया है। मैं टाइगर रिजर्व का भी विरोधी नहीं हूं मगर इंसानों को भगाकर यदि जानवर बसाए जा रहे हैं तो बताइए ये कैसा न्याय है ? धरती पर रहने का सभी को अधिकार है मगर किसी को भगाकर किसी को बसाया जाए तो उसे विकास नहीं बल्कि आम भाषा में जबरन गुंडागर्दी भी कहते हैं। इसलिए इस विस्थापित वाली प्रक्रिया का विरोध किया जाएगा एवं आने वाले समय में बड़ा आंदोलन भी किया जाएगा।

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