पागल कर दे इंसान को जो पैसे की अजब कहानी है
पत्रकार लेखक : राहुल पाण्डेय
उमरियापान | है लोभ बढ़ गया दुनिया में, मैं जो बात करूं नादानी है। पागल कर दे इंसान को जो, पैसे की अजब कहानी है।जहां रुतबा पहले ज्ञान का था, प्रश्न आत्म सम्मान का था। इज्जत इंसान की होती थी, राज धर्म ईमान का था। आज की पीढ़ी इन सब से, एकदम ही अनजानी है। पागल कर दे इंसान को जो, पैसे की अजब कहानी है। पैसा है तो सब कुछ है, ये बात सिखाई जाती है। दूर करे इंसान से जो, वो किताब पढ़ाई जाती है। है रिश्तेदारी पैसे की, प्यार कहां रूहानी है। पागल कर दे इंसान को जो, पैसे की अजब कहानी है।गरीब को मिलता न्याय कहां, कानून तो अभी अंधा है। पैसों से मिलता न्याय यहां, जुर्म बन गया धंधा है। अन्याय देख खामोश है सब, खून बन गया पानी है। पागल कर दे इंसान को जो, पैसे की अजब कहानी है। घर बड़े और दिल अब छोटे हैं, इंसान नीयत के खोटे हैं। भ्रष्ट हो रहे हैं अब सब, नौकरियों के कोटे हैं। हो कैसे उन्नति देश की, सबके मन में बेइमानी है। पागल कर दे इंसान को जो पैसे की अजब कहानी है।राहुल पैसा राखियो, बिन पैसे सब बेकार पैसे बिन तो जम न पाए गद्दी पर सरकार। जीत उसी की होती जिस पर पैसा विकट अपार, बिन पैसे के खानी पड़ती कदम-कदम पे हार। ये ख़ुश हो तो दुनिया-भर में होवे जय-जयकार, पैसा रूठे तो ये समझो, रूठ गया संसार। पैसे की महिमा देखो जी जाकर बीच बाज़ार, पैसे से है शानो-शौकत, पैसे से मनुहार। बिन पैसे के कैसी खुशियां, कैसी मौज-बहार? पैसा है तो फूल खरीदो, या ले लो तलवार। पेट्रोल से गाड़ी चलती, कहते लोग हज़ार, पर सच्चाई है, पैसे से चलती मोटरकार। पैसे से है रोज़ी-रोटी, पैसे से व्यापार, पैसे की दीवार पे टिकता है सबका घर-बार। पैसे से ही आदर मिलता, पैसे से सत्कार, पैसे से ही अपनापन है, पैसे से ही प्यार। तड़प-तड़पकर मर जाता है, बिन पैसे बीमार, ज़हर को भी मोहताज़ हुआ है, पैसे से लाचार। पैसा है तो खुल जाता है अब रब का दरबार, यकीं नहीं तो जाकर देखो, मंदिर और मज़ार। जूझ रही जीवन की नैय्या, फंसी बीच मझधार,पैसा है तो पार उतर जा, पैसा है पतवार। पैसे की ख़ातिर हम अपनें, भूल गए संस्कार,नंगे होकर घूम रहें हैं, कपड़े दिए उतार। शर्म-हया काहे की, ये तो जन्मसिद्ध अधिकार,क्या मज़ाल कोई चूँ भी कर दे, पैसा है हथियार।



