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सावन माह की कालाष्टमी आज, जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, कथा

Astologar Gopi Ram : आचार्य श्री गोपी राम (ज्योतिषाचार्य) जिला हिसार हरियाणा मो. 9812224501
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👺 सावन माह की कालाष्टमी आज, जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, कथा
🔘 HIGHLIGHTS
◾ मासिक कालाष्टमी का व्रत अपने आप में विशेष माना गया है।
◾ इस माह यह पर्व 28 जुलाई को मनाया जाएगा।
◾ कालाष्टमी को सबसे महत्वपूर्ण दिनों में से एक माना जाता है।
हिंदू मान्यताओं के अनुसार सावन का पूरा महीना ही काफी शुभ और पवन माना गया है। सावन की सभी तिथियां और व्रत का बहुत ही विशेष महत्व होता है। सावन माह में पड़ने वाला कालाष्टमी का व्रत करना बहुत ही फलदाई माना जाता है। इस दिन काल भैरव की विधि विधान से पूजा की जाती है। काल भैरव बाबा खुश होकर व्यक्ति के जीवन में चल रही सभी परेशानियों और दुखों को दूर करते हैं। ऐसा करने से हमारे ग्रह दोष भी ठीक होते हैं किसी भी नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव काम करने के लिए कालाष्टमी का व्रत रखना बहुत शुभ माना जाता है।
🌦️ सावन में कालाष्टमी 28 जुलाई को ?
महीने कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को कालाष्टमी मनाया जाता है। इस दिन भगवान काल भैरव की पूजा करने से दुख दरिद्रता से छुटकारा मिलता है। 2024 में सावन के महीने में कालाष्टमी 28 जुलाई 2024 रविवार को मनाई जाएगी। 27 जुलाई को रात 9:20 से का लास्ट में शुरू होगी और 28 जुलाई को रात 7:27 पर या समाप्त होगी। आचार्य श्री गोपी राम के अनुसार 28 जुलाई को ही कालाष्टमी का व्रत रखा जाएगा क्योंकि पूजा का मुहूर्त 28 जुलाई को ही है।
⚛️ सावन कालाष्टमी का शुभ मुहूर्त
इस वर्ष सावन माह के कालाष्टमी पर रवि योग बन रहा है। रवि योग में सूर्य का प्रभाव बहुत अधिक होता है। 28 जुलाई को प्रातः काल में 5:40 से दोपहर 1:00 तक रवि योग है। सूर्य के अधिक प्रभाव होने के कारण सभी प्रकार के दोष दूर होते हैं। 2024 के सावन माह में कालाष्टमी के दिन भद्रा और पंचक लग रहा है। सुबह 5:40 से 10:22 तक भद्रा लगा रहेगा। इस समय पर भद्रा का पृथ्वी लोक पर वास होगा और कोई भी शुभ काम इस समय पर ना करें। कालाष्टमी के दिन सुबह 5:40 से 1:00 तक पंचक लग रहा है। कालाष्टमी के व्रत की पूजा के लिए निशिता मुहूर्त शुभ माना जाता है। निष्ठा मुहूर्त देर रात 12:07 से 12:49 तक है। इस समय ही कालाष्टमी की पूजा कर लेनी चाहिए।
🌧️ सावन में ऐसे करें भैरव बाबा को प्रसन्न
काल भैरव बाबा को मदिरा या शराब बहुत प्रिय है। इस दिन बूटुक भैरव महाराज को शराब और कच्चा दूध अर्पित करें। मदिरा पूरी और और हलवा का भोग लगाएं। पांच मिठाइयों को अर्पित करें और भगवान से अपनी अर्जी लगाएं। विधि विधान से बाबा काल भैरव की आराधना करने से वह आपकी सारी मनोकामनाएं पूरी करते हैं।
🙇🏻 मासिक कालाष्टमी की पूजा विधि
▪️ कालाष्टमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ कपड़े धारण करें।
▪️ पूजा के स्थान को अच्छी तरह से साफ करें और फिर एक वेदी पर भैरव बाबा की प्रतिमा स्थापित करें।
▪️ फिर पंचामृत से कालभैरव की प्रतिमा का अभिषेक करें और इत्र लगाएं।
▪️ इसके बाद फूलों की माला अर्पित करें, साथ ही चंदन का तिलक लगाएं।
▪️ भगवान काल भैरव को फल, मिठाई, घर पर बने प्रसाद का भोग लगाएं।
▪️ भगवान के समक्ष सरसों के तेल का दीपक जलाएं और काल भैरव अष्टक करें।
▪️ आखिर में आरती से पूजा को समाप्त करें और अंत में पूजा में हुई गलतियों के लिए क्षमायाचना करें।
▪️ अगले दिन व्रती इसी प्रसाद से अपना व्रत खोल सकते हैं और जरूरतमंदों को भोजन खिलाएं और उनकी सहायता करें।
💁🏻 कालाष्टमी के दिन इन बातों का रखें विशेष ध्यान_
काल भैरव को दही में काले उड़द ही मिलाकर भोग लगाएं।
प्रसाद के पतासे को काले कुत्ते को खिलाए जाते हैं, ऐसा करने से भैरव शीघ्र ही प्रसन्न होकर साधक की मन वांछित इच्छा को पूर्ण करते हैं।
पूजा के दौरान कुछ विघ्न आते हैं हमें उनसे सावधान रहने की आवश्यकता है। अतः किसी पंडित जी के सानिध्य में यह पूजा संपन्न करें।
🗣️ भैरव अष्टमी व्रत कथा
एक बार भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश यानि त्रिदेवों के बीच इस बात को लेकर विवाद हो गया है कि उनमें से कौन सर्वश्रेष्ठ है। विवाद को सुलझाने के लिये समस्त देवी-देवताओं की सभा बुलाई गई। सभा ने काफी मंथन करने के पश्चात जो निष्कर्ष दिया उससे भगवान शिव और विष्णु तो सहमत हो गए, लेकिन ब्रह्मा जी संतुष्ट नहीं हुए। यहां तक कि भगवान शिव को अपमानित करने का भी प्रयास किया जिससे भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हो गये। भगवान शंकर के इस भयंकर रूप से ही काल भैरव की उत्पत्ति हुई। सभा में उपस्थित समस्त देवी देवता शिव के इस रूप को देखकर थर्राने लगे।
कालभैरव जो कि काले कुत्ते पर सवार होकर हाथों में दंड लिये अवतरित हुए थे ने ब्रह्मा जी पर प्रहार कर उनके एक सिर को अलग कर दिया। ब्रह्मा जी के पास अब केवल चार शीश ही बचे उन्होंने क्षमा मांगकर काल भैरव के कोप से स्वयं को बचाया।
ब्रह्मा जी के माफी मांगने पर भगवान शिव पुन: अपने रूप में आ गए, लेकिन काल भैरव पर ब्रह्म हत्या का दोष चढ़ चुका था जिससे मुक्ति के लिये वे कई वर्षों तक यत्र तत्र भटकते हुए वाराणसी में पंहुचे जहां उन्हें इस पाप से मुक्ति मिली। भगवान काल भैरव को महाकालेश्वर, डंडाधिपति भी कहा जाता है। वाराणसी में दंड से मुक्ति मिलने के कारण इन्हें दंडपाणी भी कहा जाता है।

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