
आचार्य श्री गोपी राम (ज्योतिषाचार्य) जिला हिसार हरियाणा मो. 9812224501
जय श्री हरि
🧾 आज का पंचांग 🧾
बुधवार 19 नवम्बर 2025
19 नवम्बर 2025 दिन बुधवार को मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष कि चतुर्दशी तिथि है। आज श्राद्धादी की अमावस्या है। आज जम्मू के लोग मेलापुरमंडल का उत्सव मनाते हैं। आप सभी सनातनियों को “मेलापुरमंडल उत्सव” की हार्दिक शुभकामनाऐं।।
ॐ एकदन्ताय विद्महे वक्रतुंडाय धीमहि तन्नो बुदि्ध प्रचोदयात ।।
☄️ *दिन (वार) – बुधवार के दिन तेल का मर्दन करने से अर्थात तेल लगाने से माता लक्ष्मी प्रसन्न होती है धन लाभ मिलता है।
*बुधवार का दिन विघ्नहर्ता गणेश का दिन हैं। बुधवार के दिन गणेश जी के परिवार के सदस्यों का नाम लेने से जीवन में शुभता आती है। *बुधवार के दिन गणेश जी को रोली का तिलक लगाकर, दूर्वा अर्पित करके लड्डुओं का भोग लगाकर उनकी की पूजा अर्चना करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
🔮 *शुभ हिन्दू नववर्ष 2025 विक्रम संवत : 2082 कालयक्त विक्रम : 1947 नल*
🌐 कालयुक्त संवत्सर विक्रम संवत 2082,
👸🏻 शिवराज शक 352
✡️ शक संवत 1947 (विश्वावसु संवत्सर), चैत्र
☮️ गुजराती सम्वत : 2081 नल
☸️ काली सम्वत् 5126
🕉️ संवत्सर (उत्तर) क्रोधी
☣️ आयन – दक्षिणायन
🌧️ ऋतु – सौर हेमंत ऋतु
⛈️ मास – मार्गशीर्ष मास
🌒 पक्ष – कृष्ण पक्ष
📆 तिथि – बुधवार मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष चतुर्दशी तिथि 09:43 AM तक उपरांत अमावस्या
🖍️ तिथि स्वामी :- चतुर्दशी तिथि के स्वामी भगवान भोलेनाथ जी है। प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मासिक शिवरात्रि मनाई जाती है । चतुर्दशी को चौदस भी कहते हैं। चतुर्दशी तिथि के स्वामी भगवान शिव हैं।
💫 नक्षत्र – नक्षत्र स्वाति 07:59 AM तक उपरांत विशाखा
🪐 नक्षत्र स्वामी – स्वाति नक्षत्र का स्वामी राहु है।स्वाति नक्षत्र के देवता वायु देव (पवन देव) हैं, साथ ही विद्या की देवी सरस्वती का भी संबंध है।
⚜️ योग – सौभाग्य योग 09:00 AM तक, उसके बाद शोभन योग
⚡ प्रथम करण : शकुनि – 09:43 ए एम तक
✨ द्वितीय करण : चतुष्पाद – 11:00 पी एम तक नाग
🔥 गुलिक काल : – बुधवार को शुभ गुलिक 11:10 से 12:35 बजे तक ।
⚜️ दिशाशूल – बुधवार को उत्तर दिशा में दिशा शूल होता है ।इस दिन कार्यों में सफलता के लिए घर से सुखा / हरा धनिया या तिल खाकर जाएँ ।
🤖 राहुकाल : – बुधवार को राहुकाल दिन 12:35 से 2:00 तक । राहु काल में कोई भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिए |
🌞 सूर्योदयः – प्रातः 06:05:00
🌅 सूर्यास्तः – सायं 05:09:00
👸🏻 ब्रह्म मुहूर्त : 05:00 ए एम से 05:54 ए एम
🌆 प्रातः सन्ध्या : 05:27 ए एम से 06:47 ए एम
🌟 अभिजित मुहूर्त : कोई नहीं
✡️ विजय मुहूर्त : 01:53 पी एम से 02:35 पी एम
🐃 गोधूलि मुहूर्त : 05:26 पी एम से 05:53 पी एम
🌌 सायाह्न सन्ध्या : 05:26 पी एम से 06:46 पी एम
💧 अमृत काल : 01:05 ए एम, नवम्बर 20 से 02:53 ए एम, नवम्बर 20
🗣️ निशिता मुहूर्त : 11:40 पी एम से 12:34 ए एम, नवम्बर 20
🚓 यात्रा शकुन-हरे फ़ल खाकर अथवा दूध पीकर यात्रा पर निकले।
👉🏼 आज का मंत्र-ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं स: बुधाय नम:।
🤷🏻♀️ आज का उपाय-किसी बटुक को कांस्य पात्र भेंट करें।
🪵 वनस्पति तंत्र उपाय-अपामार्ग के वृक्ष में जल चढ़ाएं।
⚛️ पर्व एवं त्यौहार – दर्श अमावस्या/ अमावस्या प्रारंभ सुबह 09.43/ मेलापुरमंडल उत्सव (जम्मू)/ श्राद्धादी अमावस्या/ भारत की पहली और एकमात्र महिला प्रधानमंत्री, इंदिरा गांधी जयन्ती, राष्ट्रीय एकता दिवस, अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस, विश्व चींटीखोर दिवस, केशव चंद्र सेन जन्म दिवस, वाचस्पति पाठक पुण्य तिथि, राष्ट्रीय कैफीन युक्त कार्बोनेटेड पेय दिवस, विश्व शौचालय दिवस, पार्श्वगायक विवेक जन्म दिवस, स्वतंत्रता संग्राम की वीरांगना रानी लक्ष्मी बाई जयन्ती, विश्व प्रसिद्ध पहलवान दारा सिंह जन्म दिवस, ख्यातिप्राप्त अभिनेत्री जीनत अमान जयन्ती, प्रथम मिस यूनिवर्स सुष्मिता सेन जन्म दिवस, सर्वोदय आश्रम टडियांवा संस्थापक रमेश भाई पुण्य तिथि, राष्ट्रीय पुस्तक दिवस (सप्ताह), नवजात शिशु दिवस (सप्ताह), राष्ट्रीय औषधि दिवस (सप्ताह), राष्ट्रीय एकता दिवस (सप्ताह), अंतर्राष्ट्रीय नागरिक दिवस, राष्ट्रीय पत्रकार दिवस National Today
✍🏼 *तिथि विशेष – चतुर्दशी तिथि को शहद त्याज्य होता है। चतुर्दशी तिथि को एक क्रूरा तिथि मानी जाती है। इतना ही नहीं चतुर्दशी तिथि को उग्रा तिथि भी माना जाता है। यह चतुर्दशी तिथि रिक्ता नाम से विख्यात मानी जाती है। यह चतुर्दशी तिथि शुक्ल पक्ष में शुभ और कृष्ण पक्ष में अशुभ फलदायिनी मानी जाती है। इस चतुर्दशी तिथि के देवता भगवान शिवजी हैं।। 🌷 *_Vastu tips* 🌸
घर में खटमल होने से क्या होता है? कहते हैं जिस घर में खटमल होता है वहां हमेशा तनाव बना रहता है। ऐसे घरों में छोटी-छोटी बातों को लेकर झगड़ा होता रहता है। साथ ही घर के लोग हमेशा बीमार रहते हैं। वास्तु अनुसार घर की दक्षिण दिशा में दोष है तो भी ये कीट काफी ज्यादा आता है। इसलिए खटमल को भगाने के लिए कुछ उपाय जरूर करने चाहिए।
*खटमल भगाने के वास्तु उपाय आचार्य श्री गोपी राम के अनुसार खटमल से छुटकारा पाने के लिए नीम की सूखी पत्तियां और कपूर का धुआं नियमित रूप से घर में करना चाहिए। इससे घर से नकारात्मक ऊर्जा बाहर चली जाती है। इसके अलावा घर के मुख्य द्वार पर समुद्री नमक एक कटोरी में डालकर रखें इससे नकारात्मकता और कीट दोनों दूर रहते हैं। इस नमक को हर सप्ताह बदलते भी रहें। घर में नियमित पूजा करें। ❇️ *जीवनोपयोगी कुंजियां* ⚜️ क्या होता है सुबह बासी मुंह गर्म पानी पीने से, जानकर हैरानी होगी आपको? पानी हमारे स्वास्थ्य का एक खास हिस्सा है। स्वास्थ्य की दृष्टि से देखा जाए, तो रोजाना 8 से 10 गिलास पानी पीना अति आवश्यक है, क्योंकि पानी पीने से हमारे शरीर में हड्डियों में चिकनाहट रहती है और जिससे हमें चलने-फिरने में आसानी होती है। *और थकावट कभी महसूस नहीं होती है। गर्मी के अंदर पानी अधिक पीते हैं, परंतु ठंड के अंदर कम पानी पीते हैं परंतु आवश्यकता तो उतनी ही होती है, जितनी गर्मी में पानी पीते हैं, इसलिए आज हम आपको बताते हैं कि ठंड के अंदर पानी को थोड़ा गुनगुना करके पीना चाहिए, जिससे पानी की भरपूर मात्रा की पूर्ति होती है और इससे सर्दी भी नहीं लगती है। रोज सुबह जल्दी उठकर थोड़ा गुनगुना गर्म पानी पीना चाहिए, जिससे हमारा पेट भी साफ होता है।
*पानी को अमृत कहा गया है वास्तव में पानी का कोई भी विकल्प नहीं है इस धरती पर और हमारे शरीर में 70 प्रतिशत पानी है। पानी शरीर के लिए अति अनिवार्य है। पानी हमारे शरीर को बहुत सी खतरनाक बीमारियों से बचाता है। पानी हमारी त्वचा को मुलायम और चमकदार बनता है। अगर हमें यह मालूम हो कि हमें किस समय कितना पानी पीना है, कैसे पानी पीना है तो हममे से किसी को भी सामान्य परिस्तिथि में डाक्टर के पास जाना ही ना पड़े। यदि आप लगातार 7 दिन तक सुबह खाली पेट, खाना खाने के बाद गर्म पानी पीते है तो आपको इसके फायदे महसूस होने लगेंगे जिसके कारण आप इसको हमेशा पियेंगे। 🩸 आरोग्य संजीवनी 💊
कुटज की छाल कड़वी, अग्निदीपक, पाचक, दस्तनाशक, बुखार नाशक और रक्त स्राव को रोकती है।
*छाल को विसर्प (हर्पीस) आदि त्वचा विकार, खुनी बवासीर, दस्त, पेट के कृमि, रक्त शुद्धि, हृदय रोग, गठिया, अपचन में उपयोग में लाया जाता है। Escherichia coli के विभिन्न प्रकरों में छाल में स्थित कार्यकारी तत्व उपयोगी पाये गए है।
इसे प्रवाहिका (अमीबायसिस), अतीसार (दस्त), ज्वरातिसार (बुखार में होनेवाले दस्त), रक्त या रक्त से संबंधित विकार, कुष्ठ (त्वचा विकार) और तृष्णा (प्यास) के इलाज के लिए जाना जाता है।
*कुटज से बनी कुटज घन वटी या डॉ वैद्याज की ग्राह्य वटी, दस्त, पेचिश में फायदेमंद होती है। *इसके अलावा, ज्वर (बुखार), पीलिया, पाण्डु (खून की कमी), मधुमेह में भी कुटज का इस्तेमाल होता है।
*इसके बीज, जिन्हें इन्द्रजव कहते है, और छाल का चूर्ण, क्वाथ के रूप में प्रयोग किया जाता है। 📖 गुरु भक्ति योग 🕯️
आइये इस बात को और ज्यादा अच्छे से एक कहानी के जरिए समझे।
भारत वर्ष के एक बहुत बड़े राजा थे। जिनका नाम था जड़भरत। अपने जीवन के अन्तिम समय में वे सब कुछ छोड़कर पुलहाश्रम में चले गये और भगवान् के भजन-स्मरण में लग गये।
एक दिन जब वो नहाने के लिये गण्डकी नदी में गये तो उन्होंने देखा -कि एक गर्भवती हिरणी पानी पीनेके लिये नदीके तट पर आयी। जैसे ही वो पानी पीने लगी, वैसे ही पीछे से एक शेर की भयंकर गर्जना सुनायी पड़ी। जिससे बेचारी हिरणी डर गयी और उसने नदी पार करने के लिये छलाँग मारी।
छलाँग मारते ही उसका गर्भ नदीमें गिर गया। और वह हिरणी आगे जाकर मर गयी।
भरत जी ने देखा कि हिरणी का बच्चा बिना माँ का हो गया , अब उसकी रक्षा कौन करे ? उनके मन में दया आ गयी और उन्होंने उस बच्चे को उठा लिया तथा अपने आश्रम पर ले आये।
पहले तो उन्होंने उस बच्चे को फलों आदिका रस दिया। फिर धीरे-धीरे उसे घास खाना सिखा दिया और हरदम उसका पालन-पोषण करने लगे। जैसे माँ-बाप का अपने बच्चे में मोह होता है, ठीक ऐसे ही जड़भरत जी का भी उस बच्चे में मोह हो गया।
हिरणी का वह बच्चा जब खेलता, फुदकता, सींग मारता, खुजली करता तो भरतजी को बड़ा आनन्द आता। वे रात-दिन उसके पालन-पोषण की चिन्ता में ही डूबे रहते। जब कभी वह दिखायी नहीं देता तो वे उसके लिये बड़े व्याकुल हो जाते।
इस प्रकार दिन बीतते गये और एक दिन जड़भरत जी का अन्तसमय आ पहुँचा। अन्तकालमें भी वे उस हिरणी का चिन्तन करते रहें। मन में हिरणी का चिंतन होने से वे मरकर हिरण बन गये।
अब ऐसा क्यों हुआ ?जड़भरत जी हिरण क्यों बने ?-ऐसा इसलिए की –जिसका स्वभाव शुद्ध बन जाता है, वह नीची गति में नहीं जा सकता ।
तो मित्रों, अब यहां ये प्रश्न मन मे उठ सकता है कि भरतजी का स्वभाव तो शुद्ध ही था, वे सब भोगों का त्याग करके वन में रहते थे और तपस्या करते थे, तो फिर वे अधोगति में कैसे गये?
इसका उत्तर यह है कि हिरण का शरीर मिलना अधोगति (दुर्दशा )नहीं है। अधोगति है-भीतर के भावों का गिरना। इसलिये हिरन का जन्म मिलने पर भी भरतजी को पूर्वजन्मकी याद रही। वे कुछ भी नही भूले। इसलिए
वे हरी घास न खाकर सूखे पत्ते खाते रहे। वैराग्य के कारण वे अपनी माता हिरणी के भी साथ नहीं रहे कि कहीं मोह हो गया तो पुनः हिरणी के गर्भ से जन्म लेना पड़ेगा।
हिरण के जन्म में भी उनमें इतनी सावधानी रही, जो मनुष्यों में भी बहुत कम रहती है। उनमें त्याग का शुद्ध भाव रहा। शुद्ध भाव रहने से हिरण का शरीर मिलने पर भी उनकी दुर्दशा नहीं हुई। वहाँ से मरकर उन्होंने श्रेष्ठ ब्राह्मण के घरमें जन्म लिया।
वहाँ उनका नाम जड़ भरत हुआ। किसीका संग, मोह न हो जाय, कहीं फँस न जायँ-ऐसी सावधानी रखनेके कारण वे जड़ कहलाये।कहने का मतलब है कि — मनुष्य का किया हुआ भजन, स्मरण, तपश्चर्या व्यर्थ नहीं जाती और अंत समय की सोच के अनुसार गति का कानून भी व्यर्थ नहीं जाता। अतः हमें कर्म करते हुए भी सावधान रहना है और सोच में भी भगवान् का स्मरण करते रहना है।
यह मनुष्य के लिये बड़ी खास बात है। क्योकि अन्य किसी भी योनियों में हम कर्म और चिन्तन को नहीं बदल सकते। पशु-पक्षियों के स्वभाव को बदलकर उनको अध्यात्म-मार्ग में नहीं ला सकते। हाँ, इतना जरूर कर सकते है की हम -उनके स्वभाव के अनुसार उनको शिक्षा दे सकते हैं।
पर तुम ऐसे कर्म करो, ऐसा चिन्तन करो जिससे मुक्ति हो जाये, ऐसी शिक्षा हम नहीं दे सकते। यह अधिकार केवल मानव जन्म में ही सम्भव है।
अगर हमने अपना स्वभाव अशुद्ध बना लिया, अपनी आदत बिगाड़ ली, तो फिर अधोगति असम्भव नहीं है! इसलिये-*
डरते रहो यह जिन्दगी बेकार न हो जाय,* सपने में किसी जीवका अपकार न हो जाय।*
अधोगति से बचने के लिये दो खास बातें हैं* दूसरों की निःस्वार्थ सेवा करना और
भगवान् को याद करना* यह काम मनुष्य ही कर सकता है और इसी में उसकी मनुष्यता सिद्ध होती है। जो व्यक्ति दूसरों का अनिष्ट करता है, वह वास्तव में अपना ही महान् अनिष्ट करता है और जो दूसरों को सुख पहुँचाता है, वह वास्तवमें अपनेको ही सुखी बनाता है। *अपना बिगाड़ किये बिना कोई दूसरे का बिगाड़ कर ही नहीं सकता। जैसे, मनुष्य पहले चोर बनता है, पीछे चोरी करता है। चोरी करने पर माल हाथ लगे अथवा न लगे,पर वह खुद चोर बन ही जाता है अर्थात् उसके भीतर चोरपने का भाव (मैं चोर हूँ) आ ही जाता है।
*मृत्यु अवश्यम्भावी (अनिवार्य) है। थोड़ी भी असावधानी परलोक में हमारी दुर्गति का कारण बन सकती है। अभी मनुष्य शरीर हमें प्राप्त है। अतः शरीर के रहते-रहते ऐसा काम कर लेना चाहिये, जिससे कोई जोखिम न रहे अर्थात् कभी भी मृत्यु आ जाय तो कम-से-कम अधोगति में न जाना पड़े। *हरदम सावधान रहने वाला दुर्गति में कैसे जा सकता है इसलिये हमें बड़ी सावधानी से अपना जीवन बिताना चाहिये और दूसरोंके हितके लिये कर्तव्य कर्म करते हुए हर समय भगवान का स्मरण-चिन्तन करते रहना चाहिये।
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⚜️ चतुर्दशी तिथि को भगवान शिव का ज्यादा से-ज्यादा पूजन, अर्चन एवं अभिषेक करना करवाना चाहिये। सामर्थ्य हो तो विशेषकर कृष्ण पक्ष कि चतुर्दशी तिथि को विद्वान् वैदिक ब्राह्मणों से विधिवत भगवान शिव का रुद्राभिषेक करवाना चाहिये। आज चतुर्दशी तिथि में भगवान् शिव का रुद्राभिषेक यदि शहद से किया करवाया जाय तो इससे मारकेश कि दशा भी शुभ फलदायिनी बन जाती है। जातक के जीवन कि सभी बाधायें निवृत्त हो जाती है और जीवन में सभी सुखों कि प्राप्ति सजह ही हो जाती है।



